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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

07-05-2026

‘परिश्रम ही सफलता की कुंजी है’

  • ऋगवेद में कहा है- न ऋते श्रमस्य सख्याय देवा, अर्थात् देवता भी उसी के मित्र होते हैं जो परिश्रम करता है, बिना परिश्रम के कोई भी सफलता प्राप्त नहीं होती। महाभारत में भी कहा है- पुरुषार्थ बिना दैवं न सिद्धयति कदाचन, अर्थात् पुरुषार्थ के बिना भाग्य फल नहीं देता। सफलता के लिये कर्म आवश्यक है। उपरोक्त श्लोकों व वर्णित शास्त्रों का एक ही सार है- परिश्रम ही मनुष्य के जीवन की उन्नति और सफलता का आधार है। परिश्रम ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है, आलस्य को त्यागकर यदि कोई मनुष्य निरंतर परिश्रम करता है तो उसको निश्चित रूप से सफलता प्राप्त होती है। ज्ञातव्य है कि परिश्रम और पुरुषार्थ दोनों शब्द प्रथम दृष्टया समान प्रतीत होते हैं, परंतु इनके अर्थ पृथक-पृथक हैं। परिश्रम का आशय शारीरिक और मानसिक श्रम करने से है। जबकि सही दिशा में बुद्धि और विवेक के साथ किया गया प्रयास पुरुषार्थ कहलाता है। परिश्रम केवल मेहनत है जबकि सही दिशा में किश गया विवेकपूर्ण प्रयास पुरुषार्थ है। परिश्रम का दायरा सीमित है जबकि पुरुषार्थ का दायरा व्यापाक है।

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‘परिश्रम ही सफलता की कुंजी है’

ऋगवेद में कहा है- न ऋते श्रमस्य सख्याय देवा, अर्थात् देवता भी उसी के मित्र होते हैं जो परिश्रम करता है, बिना परिश्रम के कोई भी सफलता प्राप्त नहीं होती। महाभारत में भी कहा है- पुरुषार्थ बिना दैवं न सिद्धयति कदाचन, अर्थात् पुरुषार्थ के बिना भाग्य फल नहीं देता। सफलता के लिये कर्म आवश्यक है। उपरोक्त श्लोकों व वर्णित शास्त्रों का एक ही सार है- परिश्रम ही मनुष्य के जीवन की उन्नति और सफलता का आधार है। परिश्रम ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है, आलस्य को त्यागकर यदि कोई मनुष्य निरंतर परिश्रम करता है तो उसको निश्चित रूप से सफलता प्राप्त होती है। ज्ञातव्य है कि परिश्रम और पुरुषार्थ दोनों शब्द प्रथम दृष्टया समान प्रतीत होते हैं, परंतु इनके अर्थ पृथक-पृथक हैं। परिश्रम का आशय शारीरिक और मानसिक श्रम करने से है। जबकि सही दिशा में बुद्धि और विवेक के साथ किया गया प्रयास पुरुषार्थ कहलाता है। परिश्रम केवल मेहनत है जबकि सही दिशा में किश गया विवेकपूर्ण प्रयास पुरुषार्थ है। परिश्रम का दायरा सीमित है जबकि पुरुषार्थ का दायरा व्यापाक है।


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