भारत में क्विक-कॉमर्स का अगला मुकाबला अब सिर्फ 10 मिनट की डिलीवरी का नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा प्रोडक्ट्स एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराने का बनता जा रहा है। यूबीएस के टेलीकॉम, मीडिया और इंटरनेट एनालिस्ट नविन किल्ला के मुताबिक 10-15 मिनट की डिलीवरी अब कंपनियों के लिए अलग पहचान बनाने वाला फैक्टर नहीं रह गई है, बल्कि यह धीरे-धीरे एक सामान्य सुविधा यानी हाइजीन फैक्टर बन रही है। अब असली मुकाबला असॉर्टमेंट यानी ग्राहकों को कितनी बड़ी रेंज में प्रोडक्ट्स उपलब्ध कराई जा सकती है, इस पर होगा। किल्ला के मुताबिक ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स के बीच की सीमा तेजी से खत्म हो रही है। अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म क्विक डिलीवरी स्पेस में उतर चुके हैं, वहीं क्विक-कॉमर्स कंपनियां भी सिर्फ ग्रॉसरी तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। ऐसे में आने वाले समय में बाजार को क्विक-कॉमर्स और ई-कॉमर्स के दो अलग हिस्सों के रूप में देखना मुश्किल होगा। भविष्य में ऑनलाइन रिटेल का मॉडल अलग-अलग डिलीवरी स्पीड के विकल्पों पर आधारित हो सकता है। एक तरफ 60 मिनट से कम समय में डिलीवरी होगी, वहीं दूसरी तरफ कुछ घंटे से दो दिन तक की डिलीवरी और वैल्यू-कॉमर्स में पांच से सात दिन तक इंतजार के बदले कम कीमत का विकल्प रहेगा। यानी ग्राहक अपनी जरूरत और कीमत के हिसाब से डिलीवरी का विकल्प चुन सकेगा। इस बदलाव के साथ कंपनियों का डार्क स्टोर नेटवर्क भी ज्यादा स्पेशलाइज्ड होता जा रहा है। ग्रॉसरी के लिए अलग सेंटर, बड़े असॉर्टमेंट के लिए बड़े वेयरहाउस, फार्मा के लिए अलग फैसिलिटी और गॉरमेट प्रोडक्ट्स के लिए स्पेशलाइज्ड लोकेशन तैयार की जा रही हैं। आगे इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे कैटेगरी-स्पेसिफिक वेयरहाउस भी बढ़ सकते हैं। ऐसे में हर तरह के प्रोडक्ट को सिर्फ 10 मिनट में पहुंचाने का मॉडल ज्यादा मुश्किल और महंगा हो सकता है। ग्रोथ के मौके भी सिर्फ क्विक-कॉमर्स तक सीमित नहीं हैं। क्विक-कॉमर्स करीब 40-45 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, पारंपरिक ई-कॉमर्स की ग्रोथ करीब 10-15 प्रतिशत और वैल्यू-कॉमर्स की ग्रोथ करीब 25-30 प्रतिशत रह सकती है। कुल मिलाकर भारत का ऑनलाइन रिटेल बाजार करीब 25-30 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। इसके बावजूद कुल रिटेल सेल्स में ऑनलाइन रिटेल की हिस्सेदारी करीब 10 प्रतिशत ही है, जिससे आगे ग्रोथ की बड़ी गुंजाइश बनी हुई है। हालांकि छोटे शहरों के विस्तार को लेकर भी आकलन महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक फिलहाल टॉप 15-20 शहर ऑनलाइन कंपनियों के कुल टॉपलाइन में करीब 70 प्रतिशत योगदान देते हैं। इसलिए निकट भविष्य में बड़े शहर ही यह तय करने में सबसे अहम रहेंगे कि किसी इंटरनेट बिजनेस का प्रदर्शन कैसा रहता है। छोटे शहरों की भूमिका जरूर बढ़ रही है, खासकर उन ग्राहकों के लिए जिन्हें मॉडर्न रिटेल स्टोर्स में सीमित प्रोडक्ट्स मिलते हैं। यानी क्विक-कॉमर्स की कहानी अब सिर्फ ‘10 मिनट में सामान’ तक सीमित नहीं रह गई है। बाजार का अगला चरण स्पीड के साथ असॉर्टमेंट, कीमत, उपलब्धता और डिलीवरी विकल्पों के कॉम्बिनेशन पर निर्भर करेगा। जिस प्लेटफॉर्म पर ग्राहक ग्रॉसरी से लेकर फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे रोजमर्रा के प्रोडक्ट्स तक अपनी जरूरत की ज्यादा चीजें खोज सकेगा, उसके लिए डिलीवरी 10 मिनट में हो या दो दिन में, प्लेटफॉर्म की उपयोगिता ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।
