हमारे यहां एक कहावत है कि बिना रोये तो मां भी दूध नहीं पिलाती, ठीक उसी तरह जीवन में सफलता हासिल करने के लिए उसके द्वार को खटखटाना होता है। यहां द्वार खटखटाने का अर्थ है कि उसे प्राप्त करने के लिए प्रबल इच्छा शक्ति हो और पूरी शक्ति के साथ लगन से उसे हासिल करने में जुट जाना। सफलता भौतिक हो या आध्यात्मिक, उन्हें हासिल करने के लिए मूल आवश्यकता तो अपनी आंतरिक शक्तियों को जागृत कर उन्हें सक्रिय बनाने की होती है। हालांकि बाहरी साधन और उपकरण भी आवश्यक होते है, पर उनकी एक सीमा होती है। मनुष्य जिस प्रकार की इच्छा करता है, उसी के अनुरूप परिस्थितियां उसके निकट एकत्र होने लगती है। इस तरह से इच्छा एक चुंबक की तरह होती है, पर यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि इच्छा तो सभी करते हैं, प्रत्येक व्यक्ति ही उन्नति करना और आगे बढऩा चाहता है, फिर सभी की इच्छाएं पूरी क्यों नहीं होती। इस सवाल का समाधान एक उदाहरण में है। पैर में कांटा चुभता है और पीड़ा होती है, तो मनुष्य अपना काम छोडक़र पूरा ध्यान उस कांटे को निकालने में लगा देता है। उसे तब तक चैन नहीं आता, जब तक कि पैर से कांटा निकल नहीं जाता। इच्छा या आकांक्षा का यही स्वरूप है। सुख शांति से तो सभी रहना चाहते हैं, प्रगति की आकांक्षा भी सभी में होती है, पर कितने व्यक्ति हैं, जो इन इच्छाओं को पूरा करने के लिए समग्र तत्परता से प्रयास करते हैं। स्पष्ट है कि जिन्हें इच्छा या आकांक्षा कहा जाता है, वे सतही स्तर पर होती हैं। यदि पूरे मन और प्राण से इच्छा की जाती है, तो उसे पाने के लिए भी उसी स्तर की तत्परता भी होनी चाहिये। इस स्तर की इच्छा जहां भी रहेगी वहां अभिरूचि, मनोयोग और आवश्यक साधन जुटाने के लिए समस्त शक्तियां सक्रिय होने लगती है। इसके विपरीत सतही इच्छा रखने पर लक्ष्य कभी हासिल नहीं होता। जिस प्रकार एक चुंबक को कूड़े कचरे पर फिराया जाता है, तो वहां मौजूद धातुओं के टुकड़े उससे चिपक जाते हैं, उसी प्रकार जब विषेष तरह की आकांक्षा मन में उत्पन्न होती है, तो व्यक्ति की जागृत शक्ति उन सभी तथ्यों को तलाश और प्राप्त कर लेती है, जो सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक हो। उत्कृष्ट आकांक्षा व्यक्ति में तत्परता उत्पन्न करती है, जो प्रत्येक क्षेत्र में अवरोधों को चीर कर अभीष्ट दिशा की ओर अग्रसर कर देती है। जब सक्रियता होती है तो बल पैदा होता है। उदाहरण के तौर पर एक लुहार को ही देख लीजिये, उसका दाहिना हाथ अपेक्षाकृत मजबूत होता है, क्योंकि वह लगातार गतिशील रहता है। पैदल चलने वाले लोगों की रगें मजबूत होती हैं, तो शहनाई बजाने वालों के फेफड़े मजबूत होते हैं, क्योंकि उन अंगों का वे लगातार उपयोग करते हैं।
आकांक्षा उत्कट हो तो बहुत कुछ संभव हो जाता है। हम जब युवा थे, उन दिनों में पहलवान चंदगी राम का नाम अखबारों में पढ़ते थे, उन्हें मास्टर चंदगीराम कहा जाता था। बताया जाता था कि जब वे युवावस्था में थे, तो बहुत कमजोर थे, शरीर सूखकर कांटा हो गया था, चलते-चलते चक्कर आने लगते थे। पर उन्होंने अपना ध्यान शारीरिक बल बढ़ाने पर केंद्रित किया और व्यायाम आदि करने लगे तो फिर शरीर का कायाकल्प हो गया। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। एक ही विषय पर अपनी शक्तियों को एकाग्र करने से कमजोर व्यक्ति भी चमत्कार दिखा सकता है, जबकि बलवान व्यक्ति यदि अपनी शक्तियों को कई दिशा में बिखेर दे तो वह किसी काम में नहीं आती। एक उदाहरण और देखिये, एक एक बूंद पानी यदि कहीं लगातार गिरता रहे तो पत्थर में भी खड्डा कर देता है और पानी का बड़ा बहाव हो तो वह शीघ्रता से उपर से निकल जाता है और उसका नाम निशान भी नहीं रहता। यह उदाहरण इस बात को इंगित करता है कि कोई भी काम हो वह उत्तम रीति से होना चाहिये। अगर अपनी शक्ति या क्षमता से अधिक काम कर लिया, तो थकान आ जायेगी, तब थोड़ा सा भी काम ठीक से नहीं हो पायेगा। वही काम यदि सहज भाव से निरंतर किया जाये तो काम भी हो जायेगा तथा थकान भी नहीं होगी। हालांकि जीवन में सुख-दुख, भली बुरी परिस्थितियां सभी के साथ आती हैं, पर उत्थान व पतन का मुख्य कारण मनुष्य के कर्म को समझा जाता है। इच्छा से प्रेरणा और प्रेरणा से कर्म गतिशील होता है। यहां विधि का विधान महत्वपूर्ण है और वह यह कि मनुष्य जैसा सोचता है, उसके अनुसार उसे साधन उपलब्ध होने लगते हें, जैसे साधन उपलब्ध होते हैं वैसा कर्म भी मनुष्य करने लगता है, जैसे कर्म किये जाते हें, वैसी ही परिस्थितियां सामने आ जाती हैं और उसी तरह के परिणाम फिर मिलने लगते हैं। अब इसे भाग्य या कर्म चाहे जो नाम दें, पर सच्चाई यह है कि यह इच्छाओं की परिणति है। जो चाहा वह प्राप्त कर लिया जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता व तकदीर का लेखक स्वयं है। संसार में जितने भी व्यक्तियों ने सफलता प्राप्त की है, उन्होंने उसके लिए पहले अभिलाषा की है और इस बात के लिए बेचैन रहे कि किसी भी तरह हो वह अभीष्ट प्राप्ति हो जाये। इस आकांक्षा ने उन्हें क्रियाशील बनाया तथा समस्त बाधाओं से जूझते हुए, विफलता की घड़ी में भी आशान्वित रहते हुए पराजय के बाद भी नये प्रयास कर अंत में अपने लक्ष्य को प्राप्त किया।