भारतीय उपभोक्ता बाजार ने आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच भी मजबूती दिखाई है। मार्च क्वार्टर और जून क्वार्टर में रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले सामानों के साथ एसी, रेफ्रिजरेटर और वॉशिंग मशीन जैसे ड्यूरेबल्स की डिमांड बनी रही। पश्चिम एशिया संकट के कारण पैकेजिंग, माल ढुलाई और अन्य इनपुट लागत बढऩे के बावजूद कंपनियों ने ग्राहकों पर पूरा बोझ डालने के बजाय सीमित कीमत बढ़ोतरी, छोटे पैक और लागत प्रबंधन का सहारा लिया।अप्रैल-जून तिमाही में एफएमसीजी की वैल्यू ग्रोथ बढक़र 6.8 प्रतिशत हो गई, जबकि जनवरी-मार्च क्वार्टर में यह 3.6 प्रतिशत थी। हालांकि एफएमसीजी की वॉल्यूम ग्रोथ हाल में 4.5-5 प्रतिशत के आसपास रही है। अनुमान है कि अगर ईरान युद्ध लंबा खिंचता है तो फाइनेंशियल ईयर 2026 के अंत तक वॉल्यूम ग्रोथ घटकर करीब 4 प्रतिशत रह सकती है। बिजोम के आंकड़ों के अनुसार, देश में 8 लाख से ज्यादा रिटेल आउटलेट्स में एफएमसीजी कैटेगरी की वैल्यू ग्रोथ देखी गई है। कंपनियों की लागत पर दबाव भी बढ़ा है। कई एफएमसीजी कंपनियों के कच्चे माल की लागत में 8-10 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। पैकेजिंग, खाद्य तेल और पाम ऑयल की कीमतों ने कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बनाया है। गर्मी ने एसी बाजार को किया गर्म : मार्च से जून के दौरान तेज गर्मी ने घरेलू उपकरणों की मांग को जबरदस्त बढ़ावा दिया। इस दौरान एसी की बिक्री सालाना आधार पर करीब 20-25 प्रतिशत बढ़ी। रेफ्रिजरेटर की बिक्री में करीब 10-12 प्रतिशत और वॉशिंग मशीन में 8-10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया की एसी सेल्स में मार्च-जून अवधि के दौरान करीब 25 प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी हुई। कंपनी के अनुसार, गर्मी के कारण एयर-कंडीशनर की डिमांड मजबूत रही। टाटा समूह की वोल्टास ने भी फस्र्ट क्वार्टर में एसी बिक्री में करीब 19 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर्ज की और एक करोड़ यूनिट की बिक्री का आंकड़ा पार किया। रूरल मार्केट अब बन रहा ग्रोथ इंजन:- ग्रामीण मांग में लगातार मजबूती देखने को मिल रही है। ग्रामीण उपभोग का आधार बढ़ा है और क्विक कॉमर्स जैसे नए बिक्री माध्यमों ने अरबन कन्जम्पशन को भी सपोर्ट किया है। जून क्वार्टर में ग्रामीण डिमांड की ग्रोथ शहरी बाजार से करीब 1.7 प्रतिशत अंक ज्यादा रही। ग्रामीण खपत की ग्रोथ 6.2 प्रतिशत रही, जबकि शहरी बाजार की ग्रोथ 4.6 प्रतिशत रही। यानी अब ग्रामीण बाजार सिर्फ एफएमसीजी कंपनियों के लिए सहारा नहीं है, बल्कि ग्रोथ का बड़ा इंजन बनता जा रहा है। हालांकि मानसून कमजोर रहने की स्थिति में आने वाले महीनों में ग्रामीण डिमांड पर दबाव पड़ सकता है। कंपनियों ने कीमत बढ़ाने के बजाय बदली रणनीति : महंगाई और इनपुट लागत बढऩे के बावजूद कंपनियों ने ग्राहकों पर पूरा बोझ नहीं डाला। कई कंपनियों ने एंट्री-लेवल कीमतों को बचाए रखा और छोटे पैक, प्रमोशन तथा प्रीमियम उत्पादों के जरिए बिक्री बढ़ाने की कोशिश की। ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज ने भी इसी रणनीति को अपनाया। कंपनी ने कीमतों में सीमित बढ़ोतरी की, खासकर ग्रैमीज कटौती के साथ पैक्स की कीमतें बढ़ाई गईं। साथ ही कुछ कंपनियों ने अस्थिर शिपिंग रूट के कारण बढ़ी लागत के बीच निर्यात का हिस्सा भी बदला। क्विक कॉमर्स ने अरबन कन्जम्पशन को दिया नया पुश : क्विक कॉमर्स और आधुनिक रिटेल के विस्तार ने शहरी बाजार को नया सपोर्ट दिया है। ग्राहक अब सिर्फ जरूरी सामान खरीदने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रीमियम और सुविधाजनक उत्पादों पर भी खर्च कर रहे हैं। कंपनियों ने भी प्रीमियम उत्पादों को बढ़ावा देकर बढ़ती लागत की भरपाई करने की कोशिश की है। बाजार में यह बदलाव साफ दिख रहा है कि उपभोक्ता महंगाई को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर रहे, बल्कि अपने खर्च का तरीका बदल रहे हैं। कीमत के साथ-साथ गुणवत्ता, सुविधा, तकनीक और बेहतर अनुभव को भी महत्व दिया जा रहा है। एलजी इंडिया के अधिकारियों के मुताबिक भारतीय उपभोक्ता पहले की तुलना में ज्यादा स्थिर स्थिति में हैं। उनकी मांग अन्य उभरते बाजारों की तुलना में महंगाई के झटकों से अपेक्षाकृत कम प्रभावित हुई है। बड़े शहरों के साथ-साथ दूसरे और तीसरे स्तर के शहरों में भी प्रीमियम उत्पादों की मांग दिखाई दे रही है। यानी भारतीय उपभोक्ता अब सिर्फ सस्ता उत्पाद नहीं तलाश रहा। वह बेहतर गुणवत्ता, सुविधा, तकनीक और अनुभव के लिए ज्यादा भुगतान करने को तैयार है। यही बदलाव एफएमसीजी और टिकाऊ उपभोक्ता सामान कंपनियों के लिए बड़ा अवसर बन रहा है। कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि भारतीय कंजम्पशन स्टोरी अभी कमजोर नहीं पड़ी है। ग्रामीण बाजार तेजी से पकड़ बना रहा है, शहरी उपभोक्ता प्रीमियम उत्पादों की तरफ बढ़ रहा है और क्विक कॉमर्स नए डिमांड चैनल खोल रहा है। लेकिन ईरान युद्ध, महंगाई और मानसून जैसे फैक्टर आने वाले महीनों में इस ग्रोथ की असली परीक्षा लेंगे।