भारत में परिवारों का आकार लगातार छोटा हो रहा है। इसका असर सिर्फ जनसंख्या के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि लोगों की खरीदारी, घरों, खाने की आदतों और एनर्जी डिमांड पर भी पडऩे वाला है। छोटे परिवारों के बढ़ते चलन से उपभोक्ता सामान, रियल एस्टेट और रेडी-टू-ईट फूड की डिमांड तेज हो सकती है। 2000 के दशक में भारत में एक महिला के जीवनकाल में औसतन 3.3 बच्चे होते थे। अब देश में जनसंख्या बदलाव की रफ्तार अनुमान से भी तेज हो गई है। हाल में जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कुल प्रजनन दर (ञ्जस्नक्र) 1.9 तक पहुंच गई है। यह 2.1 के उस स्तर से नीचे है, जिसे जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए जरूरी माना जाता है। शहरी इलाकों में टोटल फर्टीलिटी रेट घटकर 1.5 और ग्रामीण इलाकों में 2.1 रह गई है। इसका असर समाज के लगभग सभी वर्गों में दिखाई दे रहा है। इस बदलाव का सबसे सीधा असर परिवारों के आकार पर पड़ रहा है। बड़े संयुक्त परिवारों की जगह अब छोटे परिवार ले रहे हैं, जिनमें आमतौर पर चार या उससे कम सदस्य होते हैं। जहां पहले एक घर में औसतन सात लोग रहते थे, वहीं अब छोटे परिवारों में खर्च, सुविधा और बेहतर जीवनशैली को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। परिवार छोटा होने पर सामान की जरूरत कम होने के बजाय कई मामलों में बढ़ जाती है। मसलन, दो लोगों के परिवार को भी दो फ्रिज, दो वॉशिंग मशीन, दो एयर कंडीशनर और रसोई के कई उपकरणों की जरूरत हो सकती है। यानी चार लोगों के परिवार की तुलना में प्रति व्यक्ति उपकरणों की संख्या ज्यादा हो सकती है। इसे ही परिवारों के बंटने या छोटे होने का असर कहा जा सकता है। छोटे-छोटे घरों की संख्या बढऩे से हर परिवार के लिए अलग-अलग सामान की जरूरत बढ़ती है। इससे सीमेंट, स्टील और ग्लास जैसे ऊर्जा खपत वाले उत्पादों की मांग को भी सहारा मिल सकता है। घरों में फ्रिज, एयर कंडीशनर और दूसरे बिजली वाले उपकरणों की संख्या बढऩे से बिजली की मांग भी बढ़ेगी। छोटे परिवारों में सार्वजनिक परिवहन पर निर्भरता कम और अपनी कार या दोपहिया वाहन का इस्तेमाल ज्यादा हो सकता है। इससे ट्रांसपोर्ट से जुड़ी ऊर्जा खपत भी बढ़ सकती है। छोटे परिवारों के साथ खाना बनाने और खाने का तरीका भी बदल रहा है। बड़े परिवारों में एक बार खाना बनाकर छह-सात लोगों का भोजन तैयार हो जाता था। इससे प्रति व्यक्ति खाना बनाने की ऊर्जा खपत कम रहती थी। इसके उलट छोटे परिवार सुविधा के लिए बाहर का खाना, डिलीवरी और रेडी-टू-ईट फूड ज्यादा पसंद कर रहे हैं। खासकर दोहरी आय वाले परिवारों में समय की कमी के कारण यह ट्रेंड और तेज हो रहा है। इसका सीधा असर ऊर्जा खपत पर पड़ता है। कमर्शियल फूड सेक्टर को कोल्ड चेन, कई स्तर की प्रोसेसिंग, रेफ्रिजरेशन, हाई-टेम्परेचर इंडस्ट्रियल हीटिंग, सिंगल-यूज पैकेजिंग और लास्ट-माइल डिलीवरी की जरूरत होती है। इसके अलावा कमर्शियल फूड सप्लाई चेन में खाने की बर्बादी भी ज्यादा होती है। छिपी हुई ऊर्जा खपत को जोडऩे पर फ्रोजन फूड और रेस्तरां के खाने में इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा पारंपरिक घर के बने खाने की तुलना में कई गुना ज्यादा हो सकती है। दुनिया के दूसरे देशों में भी परिवारों के छोटे होने से खपत का पैटर्न बदला है। दक्षिण कोरिया में 1980 से 2000 के बीच औसत परिवार का आकार करीब 2.8 से घटकर 1.2 तक आ गया था। जापान में भी छोटे परिवारों का चलन भारत से काफी पहले शुरू हो गया था। जापान में 1970 से 1990 के बीच प्रति व्यक्ति बिजली खपत में हर साल 7 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। छोटे परिवारों और एक या दो सदस्यों वाले घरों की संख्या बढऩे से कंज्यूमर रिटेल, प्रोसेस्ड फूड मैन्युफैक्चरिंग और रिहायशी बिजली खपत को बढ़ावा मिला। छोटे घरों की बढ़ती संख्या ने 24&7 सुविधा वाले स्टोर, ऑनलाइन डिलीवरी और रेडी-टू-ईट फूड सप्लाई चेन को भी तेजी से बढ़ाया। इससे फूड प्रोसेसिंग और सिंचाई में ऊर्जा की जरूरत बढ़ी। भारत में छोटे परिवारों की बढ़ती संख्या से रियल एस्टेट, कंज्यूमर गुड्स, पर्सनल मोबिलिटी और रेडी-टू-ईट फूड जैसे सेक्टरों को फायदा मिल सकता है। तेजी से बढ़ते शहरों और बदलती लाइफस्टाइल के साथ यह ट्रेंड खपत को और तेज कर सकता है। इस पूरे बदलाव में ऊर्जा सबसे अहम कड़ी है। चाहे घरों में बिजली की मांग हो, पावर ग्रिड की क्षमता हो या पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक की जरूरत—छोटे परिवारों की बढ़ती संख्या भारत की ऊर्जा मांग को लंबे समय तक ऊपर बनाए रख सकती है।