म्यूजिक टेलीविजन नेटवर्क (एमटीवी) ने अपने पांच डेडीकेटेड म्यूजिक चैनल्स को ग्लोबली शटडाउन कर दिया है। भारत में भी प्योर म्यूजिक से यूथ ड्रिवन प्रोग्राम्स, अरबन प्रोग्रामिंग और लाइव एंटरटेंमेंट एक्सपीरियंस पर फोकस किया जा रहा है। यंग इन्डिया जिस प्रकार से टेलीविजन व्यूइंग से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट हो रहा है, उसे देखते हुए यूथ फोकस्ड ब्राण्ड्स भी शिफ्ट हो रहे हैं। मीडिया स्ट्रेटजी को रीएसेस किया जा रहा है। इन्फ्लूएंसर लैड एक्टीवेशन, शॉर्ट फॉर्म वीडियो स्टोरी टेलिंग आदि पर फोकस किया जा रहा है। अंग्रेजी भाषा के चैनल्स ओवरऑल टेलीविजन एडवरटाइजिंग में केवल 3 से 5 प्रतिशत का शेयर रखते हैं। यह जिस दर्शक वर्ग को लक्ष्य करते हैं, वे आसानी से एक्सेसेबल नहीं है, ऐसे में प्रीमियम ब्राण्ड बिल्डिंग एन्वायरमेंट को डिजिटल लेवल पर और ओवर द टॉप इको-सिस्टम पर बेहतर बनाने की जरूरत है। उपरोक्त प्रकार के चैनल्स का क्लोजर यूथ मार्केटिंग के एक स्टेज का लॉस कहा जा सकता है। एक समय यूथ ब्राण्ड्स एमटीवी कंटेंट इको सिस्टम का उपयोग करते थे। उनके रियलिटी शो, म्यूजिक प्रॉपर्टीज और कैम्पस इवेंट्स में ब्राण्ड एडवरटाइजिंग शामिल की जाती थी लेकिन अब डिजिटल फस्र्ट प्लेटफॉर्म जैसे यूट्यूब, इन्स्टाग्राम और ओटीटी नेटवर्क पर स्पेंड किया जा रहा है। डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी बीसी वेबवाइज के वाइस पे्रसीडेंट के अनुसार लार्ज लीनियर स्पांसरशिप के बजाय फोकस क्रिएटर कोलेबोरेशंस, शॉर्ट फॉर्म वीडियो स्टोरी टेलिंग, इन्फ्लूएंसर लैड एक्टीवेशंस पर है। जो ब्राण्ड्स पहले एमटीवी पर उपस्थित होते थे, वे अब ओटीटी, यूट्यूब आदि पर इन्वेस्ट कर रहे हैं। टीवी स्पॉट्स के बजाय क्रिएटर्स, इन्फ्लूएंसर्स का यूज बढ़ रहा है। बड़े वर्ग तक बात पहुंचाने के बजाय जीनाइन कनैक्शंस पर ध्यान आ गया है। अब बात कन्ज्यूमर फोकस्ड हो रही है, पहले भी होती थी लेकिन उसमें बढ़ा दर्शक वर्ग शामिल होता था। अब बात जिससे कहनी है, वही माध्यम पकड़ा जाता है।