जयपुर। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में अमेरिकी टैरिफ रिलेटेड डिसरप्शंस के बाद अमरीका-इजरायल-ईरान वॉर के कारण फाइनेंशियल मार्केट्स के लिहाज से अनिश्चितता का लेवल काफी अधिक रहा। यही कारण रहा कि इंडियन स्टॉक मार्केट्स से फॉरेन इंवेस्टरों ने बड़े स्तर पर अपना इंवेस्टमेंट बाहर निकाला। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 34 वर्ष की अवधि में 2025-26 में फॉरेन पोर्टफोलियो इंवेस्टरों (FPI) का रुख इंडियन मार्केट्स के प्रति सर्वाधिक Bearish रहा व इस दौरान FPI की नेट सेलिंग सालाना आधार पर 42 प्रतिशत बढक़र 1.8 लाख करोड़ रुपये दर्ज की गई। सेलिंग का यह लेवल वर्ष 1992 को बाद से अब तक का सर्वाधिक है। 2025-26 की बात करें तो इस वर्ष फॉरेन इंवेस्टरों की सेलिंग का लेवल 2008-09 (2008 के फाइनेंशियल क्राइसिस) में की गई सेलिंग का करीब 4 गुना है। ईरान वॉर के कारण अकेले मार्च 2026 में फॉरेन इंवेस्टरों ने इंडियन मार्केट्स में 1.18 लाख करोड़ रुपये की नेट सेलिंग की है। दिसंबर 2025 क्वार्टर के बाद निफ्टी-50 के लिए 16 प्रतिशत की ईपीएस ग्रोथ के अनुमान लगाए जा रहे थे पर क्रूड ऑयल की प्राइस में आई बढ़ोतरी व कमजोर जीडीपी ग्रोथ की आशंका के चलते ईपीएस ग्रोथ के अनुमानों में बड़ी गिरावट आई है। गोल्टमेन सॉक्स ने तो निफ्टी-50 की ईपीएस ग्रोथ के अनुमानों को घटाकर मात्र 8 प्रतिशत ही कर दिया है। एक्सपटर््स का कहना है कि अधिकतर फॉरेन इंवेस्टर हैडलाइन ईपीएस ग्रोथ पर पैनी नजर रखते हैं व इसी के आधार पर फंड फ्लो भी तय होते हैं। पेास्ट-कोविड मजबूत ईपीएस ग्रोथ के कारण फॉरेन इंवेस्टरों ने इंडियन स्टॉक मार्केट्स में बड़ा निवेश किया था पर पिछले 18 महिनों में ग्रोथ मोमेंटम कमजोर पड़ गया है। यही नहीं डॉलर के मुकाबले रुपया भी पिछले 1 वर्ष में 10.5 प्रतिशत कमजोर हो चुका है जिससे फॉरेन इंवस्टरों का डॉलर टर्म में रिटर्न बड़े लेवल पर इंपैक्ट हुआ है।
