TOP

ई - पेपर Subscribe Now!

ePaper
Subscribe Now!

Download
Android Mobile App

Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

03-04-2026

कंपनी ने नहीं दिया पीएफ रिकॉर्ड फिर भी कोर्ट ने दिलाई पेंशन

  •  कर्मचारी पेंशन से जुड़े एक मामले में हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला किया हैं। एक रिटायर्ड कर्मचारी की उच्च पेंशन की मांग को ईपीएफओ ने इस वजह से खारिज कर दिया था कि कंपनी (नियोक्ता) के पास जरूरी रिकॉर्ड  मौजूद नहीं थे। इस पर अदालत ने कहा कि नियोक्ता की कमी का असर कर्मचारी के अधिकारों पर नहीं पडऩा चाहिए। जस्टिस अमित बोरकर ने अपने फैसले में साफ किया कि पेंशन किसी तरह की सुविधा नहीं, बल्कि लंबे समय की सेवा के बदले मिलने वाला अधिकार है। इसी सोच के साथ अदालत ने ईपीएफओ के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि दस्तावेजों की कमी के कारण कर्मचारी को उसका हक नहीं छीना जा सकता। करीब 37 साल तक सेवा देने के बाद भी एक कर्मचारी को पेंशन के लिए हो रही दिक्कत पर कोर्ट ने यह टिप्पणी की हैं। मामला यह है कि कर्मचारी ने 1987 से 2024 तक हाफकिन बायो-फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड में फार्मासिस्ट के रूप में काम किया था। इस दौरान उनकी सैलरी से नियमित रूप से प्रोविडेंट फंड की कटौती होती रही। सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले के बाद उन्होंने ज्यादा पेंशन के विकल्प के लिए आवेदन किया। इसके बावजूद मार्च 2025 में ईपीएफओ ने उनका आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि नियोक्ता ने 2010 से पहले के जरूरी रिकॉर्ड, जैसे मासिक चालान और फॉर्म 6ए उपलब्ध नहीं कराए है। विभाग के अनुसार इन दस्तावेजों के बिना उनकी मांग को पूरा करना संभव नहीं था। इसके बाद यह मामला कोर्ट तक पहुंचा। इस मामले में अदालत ने साफ कहा कि ईपीएफओ ने जानकारी की जांच करते समय बहुत सीमित तरीका अपनाया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कर्मचारी की 37 साल की सेवा और लगातार ईपीएफओ में किए गए योगदान पर कोई सवाल नहीं था। ऐसे में सिर्फ कुछ दस्तावेजों के कमी को आधार बनाकर उसका दावा खारिज करना उचित नहीं माना जा सकता है।

Share
कंपनी ने नहीं दिया पीएफ रिकॉर्ड फिर भी कोर्ट ने दिलाई पेंशन

 कर्मचारी पेंशन से जुड़े एक मामले में हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला किया हैं। एक रिटायर्ड कर्मचारी की उच्च पेंशन की मांग को ईपीएफओ ने इस वजह से खारिज कर दिया था कि कंपनी (नियोक्ता) के पास जरूरी रिकॉर्ड  मौजूद नहीं थे। इस पर अदालत ने कहा कि नियोक्ता की कमी का असर कर्मचारी के अधिकारों पर नहीं पडऩा चाहिए। जस्टिस अमित बोरकर ने अपने फैसले में साफ किया कि पेंशन किसी तरह की सुविधा नहीं, बल्कि लंबे समय की सेवा के बदले मिलने वाला अधिकार है। इसी सोच के साथ अदालत ने ईपीएफओ के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि दस्तावेजों की कमी के कारण कर्मचारी को उसका हक नहीं छीना जा सकता। करीब 37 साल तक सेवा देने के बाद भी एक कर्मचारी को पेंशन के लिए हो रही दिक्कत पर कोर्ट ने यह टिप्पणी की हैं। मामला यह है कि कर्मचारी ने 1987 से 2024 तक हाफकिन बायो-फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड में फार्मासिस्ट के रूप में काम किया था। इस दौरान उनकी सैलरी से नियमित रूप से प्रोविडेंट फंड की कटौती होती रही। सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले के बाद उन्होंने ज्यादा पेंशन के विकल्प के लिए आवेदन किया। इसके बावजूद मार्च 2025 में ईपीएफओ ने उनका आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि नियोक्ता ने 2010 से पहले के जरूरी रिकॉर्ड, जैसे मासिक चालान और फॉर्म 6ए उपलब्ध नहीं कराए है। विभाग के अनुसार इन दस्तावेजों के बिना उनकी मांग को पूरा करना संभव नहीं था। इसके बाद यह मामला कोर्ट तक पहुंचा। इस मामले में अदालत ने साफ कहा कि ईपीएफओ ने जानकारी की जांच करते समय बहुत सीमित तरीका अपनाया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कर्मचारी की 37 साल की सेवा और लगातार ईपीएफओ में किए गए योगदान पर कोई सवाल नहीं था। ऐसे में सिर्फ कुछ दस्तावेजों के कमी को आधार बनाकर उसका दावा खारिज करना उचित नहीं माना जा सकता है।


Label

PREMIUM

CONNECT WITH US

X
Login
X

Login

X

Click here to make payment and subscribe
X

Please subscribe to view this section.

X

Please become paid subscriber to read complete news