ज्ञान प्राप्ति के अनेक माध्यम हैं, कुछ भौतिक और कुछ अभौतिक। भौतिक माध्यमों में किसी गुरू के यहां जाकर शिक्षा ग्रहण करना अर्थात वर्तमान स्वरूप में स्कूल-कॉलेज जाकर ज्ञान अर्जित करना, इसी के समानांतर स्वाध्याय भी ज्ञान का एक माध्यम है, भौतिक स्वरूप में ही यह भी आता है कि हम किसी से प्रेरणा लेकर कुछ सीखते हैं, किसी से जानकर कुछ सीखते हैं। यहां ज्ञान प्राप्ति का एक अभौतिक स्वरूप भी है और वह है विश्वास या विचार। विश्वास के मायने यह होता है कि जो कुछ होता है, दिखता है हम उस पर भरोसा कर लेते हैं, पूरी खुशी से इच्छा के साथ अर्थात अनिच्छा से नहीं। दूसरा अभौतिक माध्यम है विचार। बहरहाल अपना-अपना दृष्टिकोण और अपना-अपना सोच है, लेकिन एक सच है और वह यह कि विचार से जो चलता है वह ज्ञान तक पहुंच जाता है और विश्वास से जो चलता है, वह अज्ञान में सदा के लिए ठहर जाता है। इसलिए कि विश्वास चलाता नहीं है, क्योंकि उसमें गति नहीं होती। गति होती है विचार में और सही ज्ञान तक पहुंचने का सषक्त माध्यम है। यहां एक बात विश्वास को लेकर भी है, वह यह कि जिस व्यक्ति को अपने में जितना कम विश्वास होता है, उतना वह दूसरों में अधिक विश्वास करता है। इसी तरह जो व्यक्ति खुद में पूरा विश्वास करता है, उसे दूसरे में विश्वास की जरूरत ही नहीं रह जाती। गंगा नदी गंगोत्री से निकलती है और उत्तर भारत के अनेक राज्यों-नगरों को टच करते हुए बंगाल की खाड़ी में जाकर मिल जाती है। वह बंगाल की खाड़ी में जाकर इसलिए नहीं मिलती कि उसे बंगाल की खाड़ी पर विश्वास है, बल्कि इसलिए मिलती है कि खुद गंगा में इतनी शक्ति है, प्रवाह है और अति बल है जो उसे बंगाल की खाड़ी तक पहुंचा कर सागर में विलीन कर देता है। छोटे-मोटे नदी नालों में अगर विश्वास होता तो वे भी बंगाल की खाड़ी तक पहुंच सकते थे, लेकिन वे अल्प मार्ग उपरांत ही विलीन हो जाते हैं। इस तरह जाहिर है कि गंगा या कोई भी नदी सागर में इसी लिए मिल पाती है कि खुद उनकी अपनी शक्ति उनके लिए सहारा बनती है। उनके भीतर अतिरेक में बहती हुई शक्ति हो तभी सागर तक पहुंचा जाता है। ऐसे में एक बात यह भी है कि सागर की कृपा से नदियां उसमें नहीं मिलती, बल्कि अतिरेक और बहाव ही नदियों को सागर में ले जाता है।
किसी भी व्यक्ति को देखें, तो उसमें दो बातें होती हैं, एक तो विश्वास और दूसरा उसकी अपनी कार्य-क्षमता अर्थात शक्ति। ओशो कहते हैं कि जो आदमी विश्वास करता है, इसके मायने है कि वह कुछ अधूरा है। दूसरे में वही विश्वास करता है, जिसमें खुद पर भरोसा नहीं हो। अपने पर विश्वास करना और बात है और दूसरे पर विश्वास करना और बात। हम खुद पर तभी विश्वास करते हैं, जबकि हम सामथ्र्यवान हों और सकने में सक्षम हैं यह सोच हो। इसके विपरीत जो लोग दूसरों पर विश्वास करते हैं, उनकी कमजोरी यह है कि खुद को वे सक्षम नहीं मानते बल्कि किसी अन्य पर विश्वास कर उस पर आश्रित हो जाते हैं। यहां मैं धर्म या आस्था के विपरीत बात नहीं कह रहा या कर रहा, बल्कि बहुत से लोग देवी-देवताओं पर धर्म पर विष्वास करते हैं। इनमें अधिकतर लोग वे होते हैं, जिनका खुद पर भरोसा नहीं होता, इसलिए वे अपने धर्म के देवी-देवता पर आश्रित हो जाते हैं। यहां आस्था अलग बात है, क्योंकि आस्था के पीछे ईमानदारी व सच्चाई होती है। जो लोग ईमानदार व सच्चे होते हैं, तो ईश्वर उनका सदैव साथ देते हैं, क्योंकि ईश्वर को भी सच्चाई व ईमानदारी ही प्रिय है। जो लोग ईमानदार व सच्चे नहीं होते, उनके मन में एक भय होता है और इस भय का असर न आ जाये, इसलिए ईश्वर की शरण में जाते हैं। जो सच्चाई व ईमानदारी से ईश्वर की शरण में जाता है, उसके लिए यह एक सामान्य सी बात है क्योंकि उसे अपनी सच्चाई व ईमानदारी अर्थात खुद पर भरोसा होता है। जबकि जो लोग सच्चे व ईमानदार नहीं होते, वे ईश्वर की शरण में भले ही चले जायें, लेकिन कर्मफल का विधान तो विद्यमान रहता ही है। ऐसे लोग ईश्वर की शरण में जाकर या उस पर विश्वास करने के बाद भी अपने कर्मफल से बच नहीं सकते। जीवन नदियों जैसा होना चाहिये, रेल के डिब्बों जैसा नहीं। रेल के डिब्बे इंजन जिधर ले जाये उधर चलते हैं और गार्ड जब झंडी दिखाये तब चलते हैं। जबकि नदी स्वयं अपना रास्ता बनाती है और बिंदास चलती रहती है।