देश के कंज्यूमर मार्केट में इन दिनों एक नया बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। अब कंपनियां सिर्फ अपने प्रोडक्ट की क्वालिटी या कीमत पर ही ध्यान नहीं दे रहीं, बल्कि ग्राहकों की भावनाओं और यादों को भी अपने साथ जोड़ रही हैं। यही वजह है कि हैरी पॉटर, पिकाचू और मार्वल जैसे लोकप्रिय किरदार अब बिस्किट, चॉकलेट और कॉफी जैसे रोजमर्रा के उत्पादों में नजर आने लगे हैं। दरअसल, यह बदलाव मार्केटिंग स्टे्रटेजी में बड़े परिवर्तन का संकेत है। पहले जहां कंपनियां मुख्य रूप से बच्चों को ध्यान में रखकर ऐसे किरदारों का इस्तेमाल करती थीं, वहीं अब उनका फोकस युवाओं और वयस्कों पर भी है। इस वर्ग को ‘किडल्ट’ कहा जाता है, यानी वे लोग जो बड़े हो चुके हैं लेकिन अपने बचपन के पसंदीदा किरदारों से अब भी भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, शहरी भारत में इस तरह के कैंपेन में 40 से 60 प्रतिशत भागीदारी इसी वर्ग की होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वर्ग कंपनियों के लिए खासा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनके पास खर्च करने की क्षमता भी होती है और ये भावनात्मक रूप से ब्रांड से जुडऩे की प्रवृत्ति रखते हैं। यही कारण है कि कंपनियां अब ऐसे प्रोडक्ट तैयार कर रही हैं, जो केवल उपयोग के लिए नहीं बल्कि अनुभव और जुड़ाव का माध्यम बन सकें। हाल के समय में कई बड़े ब्रांड्स ने इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। किटकैट ने ‘वन पीस’ थीम पर लिमिटेड एडिशन उत्पाद लॉन्च किया, वहीं स्टारबक्स इंडिया ने ‘हैरी पॉटर’ आधारित कैफे अनुभव पेश किया। इसके अलावा ओरिओ ने ‘पोकेमॉन’ थीम वाले पैक बाजार में उतारे और ब्रिटानिया ने मार्वल किरदारों के साथ अपने बिस्किट पेश किए। इन सभी उदाहरणों से साफ है कि कंपनियां अब केवल उत्पाद नहीं, बल्कि एक कहानी और अनुभव बेचने की कोशिश कर रही हैं।
मार्केटिंग विशेषज्ञ इसे ‘हेलो इफेक्ट’ के रूप में समझाते हैं। जब किसी प्रोडक्ट के साथ कोई लोकप्रिय और पहले से पसंद किया जाने वाला किरदार जुड़ता है, तो कंज्यूमर का भरोसा और उत्साह अपने आप बढ़ जाता है। इससे न केवल उत्पाद की पहचान मजबूत होती है, बल्कि ग्राहक उसे आजमाने के लिए भी प्रेरित होता है। यही कारण है कि ऐसे कैंपेन के दौरान बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिलती है। आंकड़ों के अनुसार, लिमिटेड एडिशन और कैरेक्टर-आधारित प्रोडक्ट शुरुआती हफ्तों में 15 से 30 प्रतिशत तक अधिक बिकते हैं। इस पूरे ट्रेंड में पैकेजिंग की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण हो गई है। अब पैकेजिंग केवल उत्पाद को सुरक्षित रखने का माध्यम नहीं रह गई, बल्कि यह खुद एक मार्केटिंग टूल बन चुकी है। आकर्षक डिजाइन, फेमस किरदारों की मौजूदगी और सीमित संस्करण का टैग कंज्यूमर का ध्यान तुरंत खींचता है। खासतौर पर युवा वर्ग ऐसे उत्पादों को सोशल मीडिया पर साझा करना पसंद करता है, जिससे इनकी लोकप्रियता और तेजी से बढ़ती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने इस ट्रेंड को और मजबूती दी है। आज के समय में कोई भी नया और अलग दिखने वाला प्रोडक्ट आसानी से वायरल हो सकता है। लोग इन प्रोडक्ट्स के साथ फोटो और वीडियो बनाकर साझा करते हैं, जिससे कंपनियों को मुफ्त में व्यापक प्रचार मिलता है। इस तरह मार्केटिंग अब केवल विज्ञापनों तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि कंज्यूमर खुद इसका हिस्सा बन गए हैं। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारत में कैरेक्टर लाइसेंसिंग का बाजार अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन इसमें तेजी से वृद्धि की संभावना है। खासकर एफएमसीजी और फूड एंड बेवरेज क्षेत्र में यह मॉडल आगे और विस्तार पा सकता है, क्योंकि यह सीधे कंज्यूमर की भावनाओं को छूता है और उन्हें एक अलग अनुभव प्रदान करता है। कुल मिलाकर, बाजार में यह बदलाव इस बात का संकेत है कि कंज्यूमर की पसंद और व्यवहार तेजी से बदल रहे हैं। आज ग्राहक केवल स्वाद, गुणवत्ता या कीमत के आधार पर ही निर्णय नहीं लेता, बल्कि वह उस उत्पाद से मिलने वाले अनुभव और भावनात्मक जुड़ाव को भी महत्व देता है। यही वजह है कि कंपनियां अब अपने प्रोडक्ट्स के साथ कहानियां, यादें और भावनाएं जोडक़र उन्हें और अधिक आकर्षक बना रही हैं। बचपन के ये किरदार अब केवल यादों का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि आधुनिक मार्केटिंग स्टे्रटेजी के केंद्र में आ गए हैं।