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15-04-2026

‘रिटायरमेंट हो रहा है प्रीमियम: सीनियर लिविंग में बड़ा बूम’

  • भारत में अब रिटायरमेंट का मतलब सिर्फ आराम और सादगी भरी जिंदगी नहीं रह गया है, बल्कि यह एक नए तरह की प्रीमियम लाइफस्टाइल में बदलता जा रहा है। सीनियर लिविंग यानी 55 साल से ऊपर के लोगों के लिए खास बनाए गए रेसिडेंशियल प्रोजेक्ट्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं और रियल एस्टेट सेक्टर का एक नया बड़ा ट्रेंड बन चुके हैं। इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह है देश में तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी। साल 2000 में भारत में करीब 7.3 करोड़ सीनियर सिटीजन थे, जो 2024 तक बढक़र 15.9 करोड़ हो चुके हैं। अनुमान है कि 2030 तक यह संख्या 19.5 करोड़ और 2050 तक 34 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी।   इसका मतलब है कि आने वाले समय में हर छठा व्यक्ति सीनियर सिटीजन हो सकता है, जिससे इस सेक्टर की मांग और तेजी से बढ़ेगी। फिलहाल, मांग और सप्लाई के बीच बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। देश में करीब 4 लाख सीनियर हाउसिंग यूनिट्स की जरूरत है, लेकिन संगठित सेक्टर में सिर्फ 20-22 हजार यूनिट्स ही उपलब्ध हैं।   यही कारण है कि डेवलपर्स और ऑपरेटर्स इस सेक्टर में तेजी से निवेश कर रहे हैं और नए शहरों में विस्तार कर रहे हैं। बेंगलुरु, पुणे, चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई और गुरुग्राम जैसे बड़े शहर सीनियर लिविंग के प्रमुख केंद्र बनते जा रहे हैं। कई कंपनियां नए प्रोजेक्ट लॉन्च कर रही हैं, जमीन खरीद रही हैं और अलग-अलग शहरों में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं। इसके साथ ही डेवलपर्स अब ऑपरेटर्स के साथ साझेदारी कर रहे हैं ताकि डिजाइन, सर्विस और मैनेजमेंट बेहतर हो सके। आज के सीनियर लिविंग प्रोजेक्ट्स सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि एक पूरा लाइफस्टाइल ऑफर करते हैं। इनमें क्लब हाउस, कैफे, जिम, हेल्थकेयर सुविधाएं, 24&7 मेडिकल सपोर्ट और केयर सेवाएं शामिल होती हैं। यही वजह है कि इसे रियल एस्टेट, हेल्थकेयर और हॉस्पिटैलिटी का मिला-जुला मॉडल माना जा रहा है। इस सेक्टर में प्रीमियमाइजेशन का ट्रेंड भी तेजी से बढ़ रहा है। जहां पहले ऐसे घर 50-70 लाख रुपये के बीच मिलते थे, वहीं अब कई प्रोजेक्ट्स में कीमत 2-4 करोड़ तक पहुंच चुकी है। कुछ हाई-एंड प्रोजेक्ट्स में कीमत 10-12 करोड़ रुपये तक जा रही है, जो दिखाता है कि ग्राहक बेहतर सुविधाओं के लिए ज्यादा कीमत चुकाने को तैयार हैं। आंकड़ों के मुताबिक, यह सेक्टर 2030 तक करीब 300' की ग्रोथ के साथ 7.7 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसके बावजूद भारत में सीनियर लिविंग की पहुंच अभी सिर्फ 1.3' है, जबकि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में यह 6' से ज्यादा है। इससे साफ है कि इस क्षेत्र में अभी भी काफी बड़ा मौका मौजूद है। सरकार की नीतियों में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। कुछ राज्यों में सीनियर हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के लिए नियम आसान किए जा रहे हैं, जिससे डेवलपर्स को ज्यादा निर्माण करने की अनुमति मिल रही है और इस सेक्टर को बढ़ावा मिल रहा है। कुल मिलाकर, सीनियर लिविंग अब भारत में तेजी से उभरता हुआ और संभावनाओं से भरा सेक्टर बन चुका है। बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ती उम्रदराज आबादी और बेहतर सुविधाओं की मांग इसे आगे बढ़ा रही है। आने वाले वर्षों में यह सेक्टर न सिर्फ रियल एस्टेट, बल्कि हेल्थकेयर और सर्विस इंडस्ट्री के लिए भी एक बड़ा गेमचेंजर साबित हो सकता है।

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‘रिटायरमेंट हो रहा है प्रीमियम: सीनियर लिविंग में बड़ा बूम’

भारत में अब रिटायरमेंट का मतलब सिर्फ आराम और सादगी भरी जिंदगी नहीं रह गया है, बल्कि यह एक नए तरह की प्रीमियम लाइफस्टाइल में बदलता जा रहा है। सीनियर लिविंग यानी 55 साल से ऊपर के लोगों के लिए खास बनाए गए रेसिडेंशियल प्रोजेक्ट्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं और रियल एस्टेट सेक्टर का एक नया बड़ा ट्रेंड बन चुके हैं। इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह है देश में तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी। साल 2000 में भारत में करीब 7.3 करोड़ सीनियर सिटीजन थे, जो 2024 तक बढक़र 15.9 करोड़ हो चुके हैं। अनुमान है कि 2030 तक यह संख्या 19.5 करोड़ और 2050 तक 34 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी।   इसका मतलब है कि आने वाले समय में हर छठा व्यक्ति सीनियर सिटीजन हो सकता है, जिससे इस सेक्टर की मांग और तेजी से बढ़ेगी। फिलहाल, मांग और सप्लाई के बीच बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। देश में करीब 4 लाख सीनियर हाउसिंग यूनिट्स की जरूरत है, लेकिन संगठित सेक्टर में सिर्फ 20-22 हजार यूनिट्स ही उपलब्ध हैं।   यही कारण है कि डेवलपर्स और ऑपरेटर्स इस सेक्टर में तेजी से निवेश कर रहे हैं और नए शहरों में विस्तार कर रहे हैं। बेंगलुरु, पुणे, चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई और गुरुग्राम जैसे बड़े शहर सीनियर लिविंग के प्रमुख केंद्र बनते जा रहे हैं। कई कंपनियां नए प्रोजेक्ट लॉन्च कर रही हैं, जमीन खरीद रही हैं और अलग-अलग शहरों में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं। इसके साथ ही डेवलपर्स अब ऑपरेटर्स के साथ साझेदारी कर रहे हैं ताकि डिजाइन, सर्विस और मैनेजमेंट बेहतर हो सके। आज के सीनियर लिविंग प्रोजेक्ट्स सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि एक पूरा लाइफस्टाइल ऑफर करते हैं। इनमें क्लब हाउस, कैफे, जिम, हेल्थकेयर सुविधाएं, 24&7 मेडिकल सपोर्ट और केयर सेवाएं शामिल होती हैं। यही वजह है कि इसे रियल एस्टेट, हेल्थकेयर और हॉस्पिटैलिटी का मिला-जुला मॉडल माना जा रहा है। इस सेक्टर में प्रीमियमाइजेशन का ट्रेंड भी तेजी से बढ़ रहा है। जहां पहले ऐसे घर 50-70 लाख रुपये के बीच मिलते थे, वहीं अब कई प्रोजेक्ट्स में कीमत 2-4 करोड़ तक पहुंच चुकी है। कुछ हाई-एंड प्रोजेक्ट्स में कीमत 10-12 करोड़ रुपये तक जा रही है, जो दिखाता है कि ग्राहक बेहतर सुविधाओं के लिए ज्यादा कीमत चुकाने को तैयार हैं। आंकड़ों के मुताबिक, यह सेक्टर 2030 तक करीब 300' की ग्रोथ के साथ 7.7 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसके बावजूद भारत में सीनियर लिविंग की पहुंच अभी सिर्फ 1.3' है, जबकि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में यह 6' से ज्यादा है। इससे साफ है कि इस क्षेत्र में अभी भी काफी बड़ा मौका मौजूद है। सरकार की नीतियों में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। कुछ राज्यों में सीनियर हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के लिए नियम आसान किए जा रहे हैं, जिससे डेवलपर्स को ज्यादा निर्माण करने की अनुमति मिल रही है और इस सेक्टर को बढ़ावा मिल रहा है। कुल मिलाकर, सीनियर लिविंग अब भारत में तेजी से उभरता हुआ और संभावनाओं से भरा सेक्टर बन चुका है। बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ती उम्रदराज आबादी और बेहतर सुविधाओं की मांग इसे आगे बढ़ा रही है। आने वाले वर्षों में यह सेक्टर न सिर्फ रियल एस्टेट, बल्कि हेल्थकेयर और सर्विस इंडस्ट्री के लिए भी एक बड़ा गेमचेंजर साबित हो सकता है।


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