सुप्रीम कोर्ट ने एनसीएलटी में रेज्योलूशन प्रोसेस की मंजूरी में हो रही देरी पर स्वत: संज्ञान लेते हुए स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा है कि इस सस्या का युद्धस्तर पर समाधान नहीं हुआ तो दिवाला कानून का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने देशभर की एनसीएलटी पीठों में स्टाफ और बुनियादी ढांचे की कमी को भी रेखांकित किया। इसके साथ ही पीठ ने निर्देश दिया कि मामले को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत के समक्ष रखा जाए ताकि इसे उचित पीठ को सौंपा जा सके। शीर्ष अदालत में एनसीएलटी की प्रधान पीठ की तरफ से रखी गई रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में 383 आवेदन रेज्योलूशन प्रोसेस की मंजूरी के लिए लंबित हैं, जिनमें देरी एक महीने से लेकर 700 दिनों से अधिक तक की है। दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत किसी ऋणग्रस्त कंपनी को उबारने के लिए कर्ज समाधान योजना पेश की जाती है। इसमें आमतौर पर कंपनी के पुनर्गठन, कर्ज के पुनर्समायोजन या अधिग्रहण के जरिए उसके कारोबार को फिर से पटरी पर लाने की योजना शामिल होती है। शीर्ष अदालत ने यह आदेश 2023 में राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायालय (एनसीएलएटी) के एक आदेश के खिलाफ दायर दो याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 16 अप्रैल को सुनवाई के दौरान एनसीएलटी से देशभर में लंबित मामलों, उनकी अवधि और देरी के कारणों का विवरण मांगा था। इसके साथ ही भारतीय दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता बोर्ड को भी मामले में पक्षकार बनाते हुए आवश्यक आंकड़े उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।