नीति आयोग ने सोमवार को कहा कि देश में रिसर्च एंड डवलपमेंट (आरएंडडी) परिवेश को मजबूत करने के लिए भारत को अगले चार से पांच वर्षों में इस क्षेत्र में अपने निवेश को मौजूदा के 0.64 प्रतिशत से बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का कम से कम दो प्रतिशत करना चाहिए। आयोग ने ‘ईज ऑफ डूइंग रिसर्च एंड डेवलपमेंट इन इंडिया - रिमूविंग ऑब्स्टेकल्स, प्रमोटिंग एनेबलर्स’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा कि सरकार को आरएंडडी से जुड़ी खरीद पर पांच प्रतिशत माल एवं सेवा कर (जीएसटी) स्लैब बहाल करने पर विचार करना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया, भारत के आरएंडडी परिवेश को मजबूत करने के लिए रिसर्च एंड डवलपमेंट में राष्ट्रीय निवेश को मौजूदा के 0.64 प्रतिशत से बढ़ाकर अगले चार से पांच साल में कम-से-कम जीडीपी के दो प्रतिशत तक ले जाने की तत्काल जरूरत है। नीति आयोग ने यह भी सुझाव दिया कि इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देने के लिए भारत को समयबद्ध और चरणबद्ध प्रोत्साहन देने की जरूरत है। नीति आयोग के अनुसार, कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 129 के तहत अनुसूची-3 (बही-खाता एवं लाभ-हानि विवरण) में आरएंडडी व्यय के लिए अलग मद शामिल करने से निजी क्षेत्र के निवेश का बेहतर आकलन हो सकेगा और कंपनियां रिसर्च एंड डवलपमेंट में अधिक निवेश के प्रति प्रोत्साहित होंगी। रिपोर्ट में कहा गया कि आरएंडडी के लिए अधिक धन उपलब्ध कराने की आवश्यकता को देखते हुए रिसर्च एंड डवलपमेंट के लिए परमार्थ समर्थन आकर्षित करने के उद्देश्य से अधिक साहसिक और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। इसमें कहा गया, ‘‘इसके लिए कंपनी अधिनियम के तहत कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) प्रावधानों को मजबूत करने और उनका प्रभावी उपयोग करने के साथ-साथ आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 133 के तहत आरएंडडी सहायता कोष में व्यक्तिगत योगदान पर अधिक कटौती (कम से कम 125 प्रतिशत) की सुविधा देने की आवश्यकता है।’’रिपोर्ट में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के भीतर एक अंतर-विभागीय समिति गठित करने की भी सिफारिश की गई है, जो नियमित अंतराल पर बैठक कर विभिन्न विभागों एवं वित्तपोषण एजेंसियों की योजनाओं और पहल में समन्वय सुनिश्चित करे तथा योजनाओं की पुनरावृत्ति को कम करे। नीति आयोग ने कहा कि हालांकि कुल आवंटन राशि में वृद्धि हुई है, लेकिन जीडीपी के अनुपात में निवेश का स्तर अभी भी कम है। साथ ही, वित्तपोषण व्यवस्था मुख्य रूप से सरकारी स्रोतों पर निर्भर बनी हुई है, जबकि निजी क्षेत्र और परमार्थ संस्थानों की भागीदारी सीमित है। रिपोर्ट कहती है कि धन आवंटन, वितरण और उपयोग की प्रक्रिया में अक्षमताओं के कारण स्थिति और जटिल हो जाती है। शोधकर्ताओं को विभिन्न वित्तपोषण पोर्टल पर जटिल और दोहराव वाली आवेदन प्रक्रियाओं, प्रस्तावों के मूल्यांकन और धन जारी होने में लंबी देरी तथा परियोजना क्रियान्वयन के दौरान लचीलेपन की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।