देशों के बीच इंडस्ट्रियल कंपीटिशन अब केवल टेक्नोलॉजी, कॉस्ट और प्रोडक्शन कैपेसिटी भर की लड़ाई नहीं है। सरकारों की इंडस्ट्रियल सब्सिडी भी कंपनियों की ग्लोबल पावर का एक बड़ा फैक्टर बन चुकी है। ओईसीडी की मैजिक डेटाबेस रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2005 से 2024 के बीच चीनी कंपनियों को भारतीय और कई अन्य देशों की कंपनियों की तुलना में कई गुना ज्यादा सरकारी सहायता मिली। रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी कंपनियों को औसत ओईसीडी देशों की कंपनियों की तुलना में 3 से 8 गुना तक अधिक सरकारी सपोर्ट मिला। यह सहायता केवल सीधे सब्सिडी तक सीमित नहीं थी, बल्कि सस्ते सरकारी लोन, टेक्स रिबेट, सस्ती या फ्री में लैंड, बिजली बिल पर छूट और अन्य वित्तीय सुविधाओं के रूप में भी दी गई। ओईसीडी का मैजिक डेटाबेस दुनिया की 525 बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों और 15 प्रमुख इंडस्ट्रियल सैक्टर की स्टडी करता है। इसमें केवल सरकारों द्वारा घोषित योजनाओं को नहीं, बल्कि कंपनियों को वास्तव में मिले सपोर्ट का आंकलन लगाया जाता है। चीनी इंडस्ट्रियल पॉलिसी का सबसे बड़ा प्रभाव सोलर पैनल, ईवी, बैटरी, सेमीकंडक्टर, स्टील और शिपबिल्डिंग जैसी महत्वपूर्ण इंडस्ट्री में नजर आता है। सरकारी सपोर्ट के दम पर चीन ने विशेष रूप से इन इंडस्ट्रीज में बहुत ज्यादा प्रोडक्शन कैपेसिटी खड़ी की है। सोलर पैनल इंडस्ट्री इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारी सरकारी सपोर्ट, सस्ते लोन और बड़े प्रोडक्शन नेटवर्क की मदद से चीनी कंपनियां ग्लोबल मार्केठ में सबसे बड़ी प्लेयर बन गईं। इसी तरह इलेक्ट्रिक वेहीकल और बैटरी सैक्टर में भी चीन ने तेजी से बढ़त हासिल की है। ओईसीडी के अनुसार, वर्ष 2005 से 2023 के बीच जिन कंपनियों ने ग्लोबल मार्केट शेयर बढ़ाया उनकी इस ग्रोथ में लगभग 22 परसेंट योगदान सब्सिडी का था। चीनी कंपनियों के मामले में यह प्रभाव और अधिक बड़ा रहा, जिनकी मार्केट शेयर ग्रोथ में 60 परसेंट योगदान सरकारी सपोर्ट का रहा। भारत भी अब प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम के जरिए इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, सोलर, बैटरी और अन्य स्ट्रेटेजिक सैक्टर में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। भारतीय कंपनियों के लिए चैलेंज केवल लो कॉस्ट प्रोडक्शन नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी, रिसर्च, सप्लाई चेन और मास स्केल मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी का है। सब्सिडी के कारण ही अमेरिका, यूरोप और चीन के बीच तनाव बढ़ रही है।