अभी फिल्म आई थी ना सितारे जमीन पर...फिल्म का तो पता नहीं लेकिन सोमवार को सब जमीन पर आ गये। 8 जून 2026 भारत के फाइनेंशियल मार्केट के लिए कोई आमदिन नहीं रहा। आमतौर पर जब शेयर्स में करेक्शन आता है तो इंवेस्टर सेफ हेवन असैट गोल्ड और सिल्वर की तरफ दौड़ लगाते हैं। लेकिन सोमवार को सब धाराशायी हो गए गोल्ड, सिल्वर, रुपया और बीएसई इंडेक्स सभी में करेक्शन दर्ज किया गया। यह कुछ वैसा ही है जैसा क्रिकेट का स्वीपिंग शॉट या झाड़ू लगाना। चारों असैट क्लास में एक साथ कमजोरी का सीधा अर्थ है कि इंवेस्टर सेंटिमेंट बहुत ज्यादा निगेटिव हो चुका है और रिस्क अपैटाइट (रिस्क लेने की कैपेसिटी) तेजी से कम हुई है। जियो-पॉलिटिक्स में मचे गदर का असर लगभग हर असैट पर है। मई में गोल्ड रिकॉर्ड लेवल पर था जबकि चांदी ने भी कई वर्ष का हाई बनाया था। लेकिन 8 जून को प्रोफिट बुकिंग का दौर बना रहने के कारण एक बार तो गोल्ड 2400 रुपये तक टूट गया था हालांकि एमसीएक्स पर बाद में सायं 5.15 बजे गिरावट 1050 रुपये की थी। जबकि चांदी में करीब 3 हजार रुपये के करेक्शन के साथ 245540 रुपये के लेवल पर थी। इस दबाव की प्रमुख वजह वेस्ट एशिया में सीजफायर की महीनेभर से चल रही कोशिश फेल हो जाने और फिर से दोनों पक्षों का एक-दूसरे पर अटैक करने को माना जा रहा है। इसका असर ब्रेंट क्रूड की प्राइस पर भी दिखा और एक बार यह 89 डॉलर के लेवल तक पहुंच जाने के बाद मामूली करेक्शन के साथ 86.43 डॉलर के लेवल पर था। अमेरिका से आए मजबूत आर्थिक आंकड़ों ने यह संभावना बढ़ा दी कि अमेरिकी ब्याज दरें अपेक्षा से अधिक समय तक ऊंची रह सकती हैं। जब ब्याज दरें ऊंची रहने की संभावना बढ़ती है, तो डॉलर मजबूत होता है और सोने-चांदी जैसी ब्याज नहीं देने वाली परिसंपत्तियों पर दबाव आता है। इसका नतीजा यह हुआ कि भारत सरकार के फोरेन इंवेस्टर को रिझाने के लिए एलटीसीजी में दी गई छूट के बावजूद रुपया करीब 80 पैसे कमजोर होकर 95.70 डॉलर तक पहुंच गया। जहां तक मार्केट की बात है तो बीएसई सेंसेक्स 700 पॉइंट टूटकर 73524 के लेवल पर बंद हुआ। मार्च और अप्रैल में बाजार ने मजबूत रैली दिखाई थी और कई सूचकांक रिकॉर्ड स्तरों के करीब पहुंच गए थे। इसलिए मौजूदा गिरावट को इंवेस्टर्स द्वारा रिस्क कम करने और प्रोफिट बुक करने की प्रक्रिया के रूप में भी देखा जा रहा है। बाजार की सबसे महत्वपूर्ण कहानी यह है कि इस बार पारंपरिक सेफ हेवन और रिस्क एसेट दोनों एक साथ दबाव में आ गए। इसका मतलब है कि निवेशक फिलहाल नकदी और डॉलर जैसी अधिक सुरक्षित परिसंपत्तियों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
