पांच साल में जैसे दुनिया ही बदल गई...कारों की। इंजन, पावर, माइलेज और प्राइस कीवर्ड थे।...कितना देती (माइलेज) है जैसे सवाल पीछे छूट चुके हैं। असली उत्सुकता यह जानने की होती है कि एयरबैग कितने हैं, ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग है कि नहीं, 360-डिग्री कैमरा तो होगा ही, गाड़ी लेन अलर्ट देती है या नहीं। यह पूरी कहानी है अडैस यानी एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम्स की। इसके साथ ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स के मेलजोल ने तो क्रांति ही कर दी है। जो टेक्नोलॉजी कभी केवल मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू या ऑडी जैसे लक्जरी ब्रांड्स का सेलिंग पॉइंट थी वो अब ह्यूंदे, महिंद्रा, टाटा, होंडा, एमजी, किआ और मारुति जैसे मेनस्ट्रीम मासमार्केट कार ब्रांड्स में आम हो चुकी है। मेड इन इंडिया कार अब ना केवल गुडलुकिंग हैं बल्कि स्मार्ट भी हैं जो भारत की एडवेंचरस सडक़ों पर ड्राइवर के लिए हेल्पिंग हैंड साबित हो रही हैं। अडैस और इलेक्ट्रॉनिक पैकेजिंग के दम पर इंडियन मोबिलिटी सेफ, कनेक्टेड और इंटेलीजेंट बन रही है। भारत की सडक़ों को पॉटपौरी ऑफ सिविलाइजेशन कह सकते हैं। पॉटपौरी यानी खिचड़ी या मिक्स वेज। जहां सडक़ पर गधे-घोड़े से लेकर साइकल, मोटरसाइकल, मोटरकार, ट्रक, बस और जुगाड़ सब साथ चलते है। फिर...थार वाले तो हैं हीं। इसीलिए इंडियन रोड्स को बहुत चैलेंजिंग कहा जाता है। इतना चैलेंज कि इंसान के रिफ्लेक्स (सहज प्रतिक्रिया) थोखा दे जाते हैं। इसीलिए अडैस बहुत तेजी से मेनस्ट्रीम हो रहे हैं। कार में लगे रडार, कैमरे, अल्ट्रासोनिक सेंसर और लिडार सिस्टम लगातार गाड़ी के आसपास के वातावरण को स्कैन करते रहते हैं। ये सेंसर हर सेकंड लाखों डेटा पॉइंट्स को प्रोसेस करके गाड़ी के आसपास की डिजिटल तस्वीर तैयार करते हैं। फ्रंट कैमरे ट्रैफिक सिग्नल को पहचानते हैं, लेन मार्किंग को ट्रैक करते हैं और ड्राइवर को लेन जंप होने पर अलर्ट करते हैं। रडार सेंसर आगे चल रही गाड़ी से गैप पर नजर रखते हैं और अडैप्टिव क्रू•ा कंट्रोल गाड़ी की स्पीड को खुद ही रेगुलेट करता रहता है। यदि सामने अचानक कोई गाड़ी ब्रेक लगाती है या कोई पैदल यात्री सडक़ पर आ जाता है, तो सिस्टम ड्राइवर को तुरंत अलर्ट कर देता है। जरूरत पडऩे पर गाड़ी खुद भी ब्रेक लगा सकती है। सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक्स इंसान की चूक को कम करके एक्सीडेंट टालने में मददगार साबित हो रही है।
एक्टिव सेफ्टी
पहले कारों में आमतौर पर पैसिव सेफ्टी फीचर ही थे। एक्सीडेंट हो जाने के बाद एयरबैग खुलते थे ताकि ड्राइवर और पैसेंजर को चोट न लगे। लेकिन अडैस एक्टिव सेफ्टी सिस्टम है जो एक्सीडेंट को टालता है। ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग, फॉरवर्ड कोलिजन वार्निंग, ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग और लेन कीप असिस्ट जैसे फीचर इनमें शामिल हैं। हालांकि अभी यह पैकेज पैसेंजर वेहीकल में आ रहा है लेकिन जल्दी हेवी कमर्शियल वेहीकल्स (ट्रक-बस) में भी अनिवार्य हो जाएगा। लॉन्ग रूट पर चलने ट्रक ड्राइवरों के लिए ड्राइवर मॉनिटरिंग सिस्टम उपयोगी साबित हो सकते हैं। इन्फ्रारेड कैमरे ड्राइवर की आंखों और चेहरे पर नजर रखते हैं। यदि सिस्टम को नींद, थकान या ध्यान भटकने के संकेत मिलते हैं, तो यह अलार्म, वाइब्रेशन या ऑडियो अलर्ट के जरिए ड्राइवर को जगा देता है। कंप्यूटर ऑन व्हील्स आज के जमाने की कार में दर्जनों इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट्स (ईसीयू), हाई-परफॉर्मेंस चिप्स और सॉफ्टवेयर सिस्टम लगे होते हैं, जो इंजन से लेकर इंफोटेनमेंट और सेफ्टी तक हर चीज को कंट्रोल करते हैं। हालात यहां तक है कि आपकी कार का सॉफ्टवेयर भी स्मार्टफोन की तरह ओवर-द-एयर अपडेट होता रहता है। स्मार्टफोन की तरह कारों में भी फीचर, बेहतर सेफ्टी एल्गोरिद्म और परफॉर्मेन्स को अपग्रेड किया जा सकता है। ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स ने प्रिडिक्टिव मेंटेनेंस को हकीकत कर दिया है। क्लाउड से जुड़े सेंसर अब गाड़ी की कंडीशन को लगातार मॉनिटर करते हैं। किसी पार्ट या सिस्टम में खराबी आने की आशंका होने पर सिस्टम पहले ही ड्राइवर को अलर्ट कर देता है। यदि किसी सेंसर का कैलिब्रेशन बिगड़ रहा हो, बैटरी कमजोर हो रही हो या इंजन में कोई अजीब वाइब्रेशन हो रहा तो आपको ज्यादा गड़बड़ होने से पहले ही अलर्ट मिल जाएगा।
ई•ाी ड्राइविंग
भारत के बड़े शहरों की संकरी गलियां, भीड़भाड़ वाले मॉल और पार्किंग स्पेस की कमी से कोफ्त होती है। 360-डिग्री कैमरे, पार्किंग सेंसर और ऑटोमैटिक पार्किंग असिस्ट जैसे फीचर यहां हेल्पिंग हैंड बन रहे हैं। अल्ट्रासोनिक सेंसर कार के आसपास की दूरी को मापते हैं और ड्राइवर को टक्कर से बचाने में मदद करते हैं। कई नई कारों में खुद स्टीयरिंग कंट्रोल कर पार्किंग की सुविधा है।
ईवी एंड अडैस
ईवी पेट्रोल और डीजल कारों के मुकाबले इलेक्ट्रॉनिक्स पर अधिक निर्भर होती हैं। बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम, पावर कंट्रोल यूनिट्स और डिजिटल मॉनिटरिंग पहले से ही ईवी का मुख्य हिस्सा हैं। से में अडैस फीचर को जोडऩा तकनीकी रूप से अधिक आसान है। टाटा, महिंद्रा और एमजी जैसी कंपनियां अपने इलेक्ट्रिक मॉडलों में एडवांस्ड ड्राइविंग टेक्नोलॉजी जोडऩे पर काम कर रही हैं। अडैस और ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स की बढ़ती डिमांड भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए भी जैकपॉट है। सरकार सेमीकंडक्टर और चिप मेन्युफैक्चरिंग के लिए बिलियन डॉलर के प्रोग्राम चला रही है। सेंसर, चिप्स और ऑटो इलेक्ट्रॉनिक्स की लोकल मैन्युफैक्चरिंग शुरू होने पर स्मार्ट कार सस्ती भी हो सकती है। और अडैस जैसे फीचर एंट्री-लेवल कारों में भी मिलने लगेंगे। हालांकि भारत में मिट गई लेन मार्किंग बहुत आम है। ट्रेफिक नियमों का उल्लंघन बहुत है और एक्सट्रीम वेदर यानी विकट मौसमी हालात सेंसर पर भी असर डालते हैं। अडैस का लोकेलाइजेशन (इंडियन कंडीशन के लिए ट्रेनिंग) बहुत जरूरी है। भारत में मोटरसाइकल और पैदल यात्रियों की संख्या पश्चिमी देशों की तुलना में कहीं अधिक है। इसलिए यहां इस्तेमाल होने वाले एआई एल्गोरिद्म को अलग तरीके से डिजाइन करना पड़ता है। साइबर सुरक्षा के चैलेंज तो और भी बड़े हैं। जैसे-जैसे कारें इंटरनेट और क्लाउड से जुड़ती जाएंगी, डेटा सुरक्षा और हैकिंग बहुत बड़ा खतरा होगा। आने वाले दशक में भारतीय मोबिलिटी की कायापलट हो सकती है। कारें अधिक ऑटोनोमस (स्वायत्त), कनेक्टेड और इंटेलीजेंट होंगी। कार-टू-कार और कार-टू-ट्रेफिक सिग्नल इंफॉर्मेशन शेयर कर सकेंगे। एआई सिस्टम से ट्रेफिक फ्लो बेहतर होगा और एक्सीडेंट घटेंगे। हो सकता है भारत में सॉफ्टवेयर-डिफाइंड मोबिलिटी आम हो जाए। इसमें गाड़ी लगातार अपडेट होती रहती है और ड्राइविंग एक्सपीरियंस समय के साथ बेहतर होता जाता है।
