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27-08-2025

‘भारत ऋषि-मुनियों की जन्म भूमि’

  •  श्री जैन श्वेताम्बर तेरपंथी सभा, गंगाशहर में संवतसरी महापर्व पर विशेष मुनि कमलकुमार ने कहा कि भारत देश ऋषि मुनियों की जन्म भूमि हैं। यहां अनेक ऋषि मुनियों ने जन्म लेकर साधना कर जन -जन को आलोकित किया है। साधना के अनेक उपक्रम देखने को आज भी मिल रहे हैं। कई जलाहारी हैं ,कई फलाहारी हैं, कई मौनी हैं ,कई ध्यानी हैं, कई रात -दिन खड़े ही रहते हैं, कई सो कर नींद नहीं लेते हैं, कई निर्वस्त्र हैं, कई जटाधारी है आदि अन्य अनेक प्रकार के साधक आज भी देखने को मिलते हैं। जैन धर्म एक आध्यात्मिक धर्म है। इस धर्म में 24 तीर्थकरों की मान्यता है। जैसे सप्ताह के सात दिन समाप्त हुए और पुन: दूसरा सप्ताह प्रारंभ हो जाता है। पक्ष के 15 दिन सम्पन्न हुए और दूसरा पक्ष प्रारंभ हो जाता है। मास के 31 दिन पूर्व हुए दूसरा महिना प्रारंभ हो जाता है। ठीक इसी प्रकार काल विभाग के दो आरे होते है ,उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल, प्रत्येक के 6 6 आरे होते हैं। तीसरे आरे के अंत में तीर्थंकर होते हैं और चैथे आरे के अंत तक ही रहते हैं। वर्तमान में पांचवां आरा चल रहा है। छठे आरे के बाद पुन: आरों का क्रम प्रारंभ हो जाता है और पुन: तीसरे आरे से तीर्थकर पैदा होते हैं। इस प्रकार यह संसार अनादि काल से चल रहा है और अनंत तीर्थंकर हो चुके हैं। 

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‘भारत ऋषि-मुनियों की जन्म भूमि’

 श्री जैन श्वेताम्बर तेरपंथी सभा, गंगाशहर में संवतसरी महापर्व पर विशेष मुनि कमलकुमार ने कहा कि भारत देश ऋषि मुनियों की जन्म भूमि हैं। यहां अनेक ऋषि मुनियों ने जन्म लेकर साधना कर जन -जन को आलोकित किया है। साधना के अनेक उपक्रम देखने को आज भी मिल रहे हैं। कई जलाहारी हैं ,कई फलाहारी हैं, कई मौनी हैं ,कई ध्यानी हैं, कई रात -दिन खड़े ही रहते हैं, कई सो कर नींद नहीं लेते हैं, कई निर्वस्त्र हैं, कई जटाधारी है आदि अन्य अनेक प्रकार के साधक आज भी देखने को मिलते हैं। जैन धर्म एक आध्यात्मिक धर्म है। इस धर्म में 24 तीर्थकरों की मान्यता है। जैसे सप्ताह के सात दिन समाप्त हुए और पुन: दूसरा सप्ताह प्रारंभ हो जाता है। पक्ष के 15 दिन सम्पन्न हुए और दूसरा पक्ष प्रारंभ हो जाता है। मास के 31 दिन पूर्व हुए दूसरा महिना प्रारंभ हो जाता है। ठीक इसी प्रकार काल विभाग के दो आरे होते है ,उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल, प्रत्येक के 6 6 आरे होते हैं। तीसरे आरे के अंत में तीर्थंकर होते हैं और चैथे आरे के अंत तक ही रहते हैं। वर्तमान में पांचवां आरा चल रहा है। छठे आरे के बाद पुन: आरों का क्रम प्रारंभ हो जाता है और पुन: तीसरे आरे से तीर्थकर पैदा होते हैं। इस प्रकार यह संसार अनादि काल से चल रहा है और अनंत तीर्थंकर हो चुके हैं। 


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