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08-10-2026

भारत में डेटा सेंटर्स का तेजी से विस्तार बढ़ा रहा बिजली, साइबर सुरक्षा और बुनियादी ढांचे से जुड़े जोखिम: रिपोर्ट

  •  भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग के कारण डेटा सेंटर उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है। हालांकि, इस क्षेत्र में बिजली की उपलब्धता, साइबर सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की मजबूती से जुड़े जोखिम भी बढ़ रहे हैं। यह जानकारी मंगलवार को जारी एक रिपोर्ट में दी गई। बीमा ब्रोकर कंपनी एऑन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्थापित डेटा सेंटर क्षमता 2030 तक चार गुना से अधिक बढ़ सकती है। नई क्षमता के लिए कई परियोजनाओं पर पहले से ही काम चल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बिजली की उपलब्धता अब यह तय करने में एक प्रमुख कारक बनती जा रही है कि नए डेटा सेंटर कहां स्थापित किए जा सकते हैं और परियोजनाएं कितनी तेजी से शुरू हो सकती हैं। एआई से जुड़े बढ़ते वर्कलोड के कारण ऊर्जा की खपत बढ़ रही है और बिजली के बुनियादी ढांचे पर दबाव भी बढ़ रहा है। एऑन के भारत में कमर्शियल रिस्क सॉल्यूशंस के मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रमुख सुशांत सरिन ने कहा कि ग्रिड से जुड़ी बाधाओं और कनेक्शन में होने वाली देरी से निपटने के लिए डेवलपर्स ऑन-साइट बिजली उत्पादन, बैटरी स्टोरेज और हाइब्रिड ऊर्जा प्रणालियों जैसे वैकल्पिक ऊर्जा समाधानों पर तेजी से विचार कर रहे हैं। सरिन ने कहा कि इन उपायों से डेटा सेंटर की मजबूती और आपूर्ति की निरंतरता बेहतर हो सकती है, लेकिन इनके साथ परिचालन, रखरखाव और आग से जुड़े जोखिम भी पैदा होते हैं। कंपनी ने ऐसे शोध का हवाला दिया, जिसके अनुसार दुनियाभर में डेटा सेंटर की बिजली मांग 2030 तक 165 प्रतिशत बढ़ सकती है। एऑन ने यह भी कहा कि एआई के नेतृत्व में हो रही वृद्धि डेटा सेंटर के भौतिक जोखिमों की प्रकृति को बदल रही है। इससे बिजली की अधिक क्षमता और कूलिंग की जरूरत बढ़ रही है। खासकर पानी की कमी वाले क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बनती जा रही है, जिससे डेटा सेंटर के लिए स्थान का चयन और अधिक जटिल हो गया है। भौतिक जोखिमों के साथ-साथ साइबर खतरे भी डेटा सेंटर के संचालन से अधिक मजबूती से जुड़ते जा रहे हैं। इसके अलावा, आधुनिक डेटा सेंटर आपस में जुड़े कंट्रोल सिस्टम, डिजिटल मॉनिटरिंग टूल्स और थर्ड-पार्टी वेंडर्स पर निर्भर करते हैं। ऐसे में साइबर हमलों से संचालन बाधित हो सकता है, संपत्तियों को नुकसान पहुंच सकता है और लंबे समय तक कारोबारी गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। एऑन ने कहा कि बीमा कंपनियां डेटा सेंटर के जोखिमों का आकलन करने के लिए तेजी से लाइफसाइकिल आधारित दृष्टिकोण अपना रही हैं। इसमें डिजाइन और निर्माण से लेकर बिजली की मजबूती, साइबर जोखिम और लंबे समय तक संचालन तक सभी पहलुओं का मूल्यांकन किया जा रहा है। डेटा सेंटर क्षेत्र में बीमा कंपनियों की लगातार बढ़ती रुचि को दर्शाते हुए एऑन ने कहा कि उसके डेटा सेंटर लाइफसाइकिल इंश्योरेंस प्रोग्राम के तहत बीमा क्षमता 3.5 अरब डॉलर से बढक़र 5 अरब डॉलर हो गई है। कंपनी ने कहा कि डेटा सेंटर के लिए जोखिम की समग्र योजना बनाना, जिसमें बिजली, पानी, जलवायु और साइबर जोखिम का आकलन शामिल है, बेहद महत्वपूर्ण होगा क्योंकि भारत के डिजिटल और एआई लक्ष्यों में डेटा सेंटर की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

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भारत में डेटा सेंटर्स का तेजी से विस्तार बढ़ा रहा बिजली, साइबर सुरक्षा और बुनियादी ढांचे से जुड़े जोखिम: रिपोर्ट

 भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग के कारण डेटा सेंटर उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है। हालांकि, इस क्षेत्र में बिजली की उपलब्धता, साइबर सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की मजबूती से जुड़े जोखिम भी बढ़ रहे हैं। यह जानकारी मंगलवार को जारी एक रिपोर्ट में दी गई। बीमा ब्रोकर कंपनी एऑन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्थापित डेटा सेंटर क्षमता 2030 तक चार गुना से अधिक बढ़ सकती है। नई क्षमता के लिए कई परियोजनाओं पर पहले से ही काम चल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बिजली की उपलब्धता अब यह तय करने में एक प्रमुख कारक बनती जा रही है कि नए डेटा सेंटर कहां स्थापित किए जा सकते हैं और परियोजनाएं कितनी तेजी से शुरू हो सकती हैं। एआई से जुड़े बढ़ते वर्कलोड के कारण ऊर्जा की खपत बढ़ रही है और बिजली के बुनियादी ढांचे पर दबाव भी बढ़ रहा है। एऑन के भारत में कमर्शियल रिस्क सॉल्यूशंस के मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रमुख सुशांत सरिन ने कहा कि ग्रिड से जुड़ी बाधाओं और कनेक्शन में होने वाली देरी से निपटने के लिए डेवलपर्स ऑन-साइट बिजली उत्पादन, बैटरी स्टोरेज और हाइब्रिड ऊर्जा प्रणालियों जैसे वैकल्पिक ऊर्जा समाधानों पर तेजी से विचार कर रहे हैं। सरिन ने कहा कि इन उपायों से डेटा सेंटर की मजबूती और आपूर्ति की निरंतरता बेहतर हो सकती है, लेकिन इनके साथ परिचालन, रखरखाव और आग से जुड़े जोखिम भी पैदा होते हैं। कंपनी ने ऐसे शोध का हवाला दिया, जिसके अनुसार दुनियाभर में डेटा सेंटर की बिजली मांग 2030 तक 165 प्रतिशत बढ़ सकती है। एऑन ने यह भी कहा कि एआई के नेतृत्व में हो रही वृद्धि डेटा सेंटर के भौतिक जोखिमों की प्रकृति को बदल रही है। इससे बिजली की अधिक क्षमता और कूलिंग की जरूरत बढ़ रही है। खासकर पानी की कमी वाले क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बनती जा रही है, जिससे डेटा सेंटर के लिए स्थान का चयन और अधिक जटिल हो गया है। भौतिक जोखिमों के साथ-साथ साइबर खतरे भी डेटा सेंटर के संचालन से अधिक मजबूती से जुड़ते जा रहे हैं। इसके अलावा, आधुनिक डेटा सेंटर आपस में जुड़े कंट्रोल सिस्टम, डिजिटल मॉनिटरिंग टूल्स और थर्ड-पार्टी वेंडर्स पर निर्भर करते हैं। ऐसे में साइबर हमलों से संचालन बाधित हो सकता है, संपत्तियों को नुकसान पहुंच सकता है और लंबे समय तक कारोबारी गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। एऑन ने कहा कि बीमा कंपनियां डेटा सेंटर के जोखिमों का आकलन करने के लिए तेजी से लाइफसाइकिल आधारित दृष्टिकोण अपना रही हैं। इसमें डिजाइन और निर्माण से लेकर बिजली की मजबूती, साइबर जोखिम और लंबे समय तक संचालन तक सभी पहलुओं का मूल्यांकन किया जा रहा है। डेटा सेंटर क्षेत्र में बीमा कंपनियों की लगातार बढ़ती रुचि को दर्शाते हुए एऑन ने कहा कि उसके डेटा सेंटर लाइफसाइकिल इंश्योरेंस प्रोग्राम के तहत बीमा क्षमता 3.5 अरब डॉलर से बढक़र 5 अरब डॉलर हो गई है। कंपनी ने कहा कि डेटा सेंटर के लिए जोखिम की समग्र योजना बनाना, जिसमें बिजली, पानी, जलवायु और साइबर जोखिम का आकलन शामिल है, बेहद महत्वपूर्ण होगा क्योंकि भारत के डिजिटल और एआई लक्ष्यों में डेटा सेंटर की भूमिका लगातार बढ़ रही है।


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