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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

12-06-2026

काबुली चना : लाभ हेतु धैर्य रखना पड़ेगा

  •  अमेरिका ईरान इजरायल युद्ध चलने से विश्वस्तरीय काबुली चने का उत्पादन बहुत ही कम रह गया है, इसलिए आयातक देशों में काबुली चने के ऊंचे भाव हो गए हैं। दूसरी ओर घरेलू उत्पादन भी इस बार जितना अनुमान लगा रहे थे, उससे 9 लाख मीट्रिक टन कम है, इन परिस्थितियों को देखते हुए 10 रुपए प्रति किलो की इसी लाइन पर करेक्शन के बाद बढ़ जाने की संभावना है। घरेलू बिक्री कमजोरी को देखकर थोड़े दिन सुस्ती रहेगी।  काबुली चने के आयातक देशों में माल की शॉर्टेज बनने लगी है। दूसरी ओर ईरान तुर्की सीरिया जॉर्डन आदि सभी उत्पादक देशों में इस बार ईरान इजरायल अमेरिका युद्ध से काबुली चने का उत्पादन बहुत ही कम रह गया है। ब्राजील में भी काबुली चने का स्टाक अनुकूल नहीं है। अत: इस बार काबुली चने में निर्यात के अवसर जबरदस्त हैं। पिछले महीने इंदौर भोपाल लाइन के निर्यातक माल काफी खरीद गए थे, क्योंकि वहां से निर्यात में माल गया था। फिलहाल कंटेनरों की बंदरगाहों पर कमी है, इसलिए दूसरे देशों में जरूरी खाद्य पदार्थ व अन्य जिंसों के अनुसार ही बंदरगाहों पर शिपमेंट हो रहे हैं। यहां भी आई हुई फसल की बिजाई कम के साथ-साथ सीजन पर बेमौसमी बरसात से बिजाई वाले क्षेत्रों में छोटे पौधे ही नष्ट हो गये थे। यही कारण है कि जून का प्रथम पखवाड़ा चल रहा है तथा मंडियों में माल की आपूर्ति समाप्ति की ओर है। हां, यह बात सही है कि पुराना माल इस बार ज्यादा बचा है। गत वर्ष काबुली चने का उत्पादन 31 लाख मैट्रिक टन हुआ था, वह इस बार मुश्किल से 18-20 लाख मैट्रिक टन रह जाने का अंतिम अनुमान आने लगा है। गत वर्ष नया पुराना मिलाकर काबुली चने का स्टॉक 36 लाख मीट्रिक टन की उपलब्धि रही। वह इस बार 24 लाख मीट्रिक टन नया पुराना मिलाकर वर्तमान में रह गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऊंचे भाव होने से इस बार निर्यात के पड़ते घरेलू काबुली चने के लग रहे हैं। पुराने माल आने-पौने भाव में बढिय़ा तथा मोटा एक दो प्रतिशत डंक वाला काबुली चना 90 प्रतिशत निबट चुके है तथा नए सीजन का माल चल रहा है, लेकिन किसी भी मंडी में माल का प्रेशर नहीं है। गौरतलब है कि पिछले सीजन में जो काबली चना 71/72 रुपए कच्चा माल बिका था, उसके भाव नीचे में 57/60 रुपए प्रति किलो पिछले महीने रह जाने के बाद इस समय उसके भाव 64/68 रुपए बोलने लगे हैं, बढिय़ा महाराष्ट्र का बिना छना माल 70 रुपए तक बिक गया है। इस बार महाराष्ट्र में फसल कम आई है। बाजारों में रुपए की काफी तंगी से जितना मंदा आना था, वह आ चुका है। अब वर्तमान भाव से किसी भी देश से पड़ता नहीं लग रहा है। उधर इजिप्ट के देशों में काबुली चने काफी निपट चुके हैं। फिलहाल वहां इजरायल ईरान अमेरिका लड़ाई से अभी निर्यात नहीं है।, लेकिन लड़ाई बंद होने के बाद पाइपलाइन में माल नहीं रहेगा, इसलिए चौतरफा मांग निकलने लगी है। इसके अलावा टेंडर में काफी खप रहा है। ग्राहकी की बाजारों में यहां बाजार धीरे-धीरे सुधार हो रहा है, इसलिए वर्तमान भाव में खरीद भरपूर लाभदायक रहेगी।

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काबुली चना : लाभ हेतु धैर्य रखना पड़ेगा

 अमेरिका ईरान इजरायल युद्ध चलने से विश्वस्तरीय काबुली चने का उत्पादन बहुत ही कम रह गया है, इसलिए आयातक देशों में काबुली चने के ऊंचे भाव हो गए हैं। दूसरी ओर घरेलू उत्पादन भी इस बार जितना अनुमान लगा रहे थे, उससे 9 लाख मीट्रिक टन कम है, इन परिस्थितियों को देखते हुए 10 रुपए प्रति किलो की इसी लाइन पर करेक्शन के बाद बढ़ जाने की संभावना है। घरेलू बिक्री कमजोरी को देखकर थोड़े दिन सुस्ती रहेगी।  काबुली चने के आयातक देशों में माल की शॉर्टेज बनने लगी है। दूसरी ओर ईरान तुर्की सीरिया जॉर्डन आदि सभी उत्पादक देशों में इस बार ईरान इजरायल अमेरिका युद्ध से काबुली चने का उत्पादन बहुत ही कम रह गया है। ब्राजील में भी काबुली चने का स्टाक अनुकूल नहीं है। अत: इस बार काबुली चने में निर्यात के अवसर जबरदस्त हैं। पिछले महीने इंदौर भोपाल लाइन के निर्यातक माल काफी खरीद गए थे, क्योंकि वहां से निर्यात में माल गया था। फिलहाल कंटेनरों की बंदरगाहों पर कमी है, इसलिए दूसरे देशों में जरूरी खाद्य पदार्थ व अन्य जिंसों के अनुसार ही बंदरगाहों पर शिपमेंट हो रहे हैं। यहां भी आई हुई फसल की बिजाई कम के साथ-साथ सीजन पर बेमौसमी बरसात से बिजाई वाले क्षेत्रों में छोटे पौधे ही नष्ट हो गये थे। यही कारण है कि जून का प्रथम पखवाड़ा चल रहा है तथा मंडियों में माल की आपूर्ति समाप्ति की ओर है। हां, यह बात सही है कि पुराना माल इस बार ज्यादा बचा है। गत वर्ष काबुली चने का उत्पादन 31 लाख मैट्रिक टन हुआ था, वह इस बार मुश्किल से 18-20 लाख मैट्रिक टन रह जाने का अंतिम अनुमान आने लगा है। गत वर्ष नया पुराना मिलाकर काबुली चने का स्टॉक 36 लाख मीट्रिक टन की उपलब्धि रही। वह इस बार 24 लाख मीट्रिक टन नया पुराना मिलाकर वर्तमान में रह गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऊंचे भाव होने से इस बार निर्यात के पड़ते घरेलू काबुली चने के लग रहे हैं। पुराने माल आने-पौने भाव में बढिय़ा तथा मोटा एक दो प्रतिशत डंक वाला काबुली चना 90 प्रतिशत निबट चुके है तथा नए सीजन का माल चल रहा है, लेकिन किसी भी मंडी में माल का प्रेशर नहीं है। गौरतलब है कि पिछले सीजन में जो काबली चना 71/72 रुपए कच्चा माल बिका था, उसके भाव नीचे में 57/60 रुपए प्रति किलो पिछले महीने रह जाने के बाद इस समय उसके भाव 64/68 रुपए बोलने लगे हैं, बढिय़ा महाराष्ट्र का बिना छना माल 70 रुपए तक बिक गया है। इस बार महाराष्ट्र में फसल कम आई है। बाजारों में रुपए की काफी तंगी से जितना मंदा आना था, वह आ चुका है। अब वर्तमान भाव से किसी भी देश से पड़ता नहीं लग रहा है। उधर इजिप्ट के देशों में काबुली चने काफी निपट चुके हैं। फिलहाल वहां इजरायल ईरान अमेरिका लड़ाई से अभी निर्यात नहीं है।, लेकिन लड़ाई बंद होने के बाद पाइपलाइन में माल नहीं रहेगा, इसलिए चौतरफा मांग निकलने लगी है। इसके अलावा टेंडर में काफी खप रहा है। ग्राहकी की बाजारों में यहां बाजार धीरे-धीरे सुधार हो रहा है, इसलिए वर्तमान भाव में खरीद भरपूर लाभदायक रहेगी।


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