राजस्थान की इकॉनोमी इन दिनों एक दिलचस्प लेकिन चिंता पैदा करने वाले मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ सोशल स्कीम्स और रूटीन के खर्चों पर सरकार का फोकस बढ़ा है, तो दूसरी तरफ लंबे समय के लिए डवलपमेंट को आगे बढ़ाने वाला पूंजीगत खर्च यानी कैपेक्स पीछे छूटता दिख रहा है।
कैपेक्स क्या होता है? : कैपेक्स यानी पूंजीगत खर्च वह पैसा होता है, जो सरकार बड़े और लंबे समय तक फायदा देने वाले कामों पर लगाती है। जैसे सडक़, पावर प्रोजेक्ट, बेहतर वाटर सप्लाई, अस्पताल और स्कूल बनाना। यही चीजें किसी राज्य को आगे बढ़ाती हैं।
राजस्थान की स्थिति क्या है? : राजस्थान अपने कुल खर्च का सिर्फ करीब 10 से 11 पर्सेंट ही ऐसे कामों पर खर्च कर पा रहा है, जो काफी कम है। दूसरे बड़े राज्य जैसे गुजरात, उत्तर प्रदेश और ओडिशा इस पर 18 से 22 पर्सेंट तक खर्च कर रहे हैं। इसका सीधा मतलब है कि दूसरे राज्य भविष्य के लिए ज्यादा तैयारी कर रहे हैं, जबकि राजस्थान अभी पीछे चल रहा है।
पैसा कहां जा रहा है? : राजस्थान में बड़ी प्राब्लम यह है कि सरकार का बहुत सारा पैसा ऐसे कामों में खर्च हो जाता है जो तुरंत जरूरी तो हैं, लेकिन विकास नहीं बढ़ाते। जैसे कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन, कर्ज का ब्याज और अन्य सरकारी खर्च। जब इन पर ज्यादा पैसा खर्च होता है, तो रोड, इंडस्ट्री और नई प्रोजेक्ट्स के लिए कम पैसा बचता है।
इसका असर क्या होगा? : अगर कैपेक्स कम रहेगा तो धीरे-धीरे डवलपमेंट की रफ्तार कम हो जाती है। नई इंडस्ट्री कम लगती हैं, जॉब के मौके घटते हैं और निजी इंवेस्टमेंट भी कम आता है। लोग और कंपनियां उन्हीं राज्यों में जाना पसंद करती हैं जहां बेहतर रोड, पावर और इन्फ्रा हों।
आगे क्या करना जरूरी है? : राजस्थान को अब अपने खर्च का तरीका बदलना होगा। गैर-जरूरी खर्च कम करके ज्यादा ध्यान रोड, इंडस्ट्री, एजुकेशन और हेल्थ जैसे सेक्टर्स पर देना होगा। साथ ही, राज्य को अपनी रेवेन्यू बढ़ाने के रास्ते भी तलाशने होंगे। राजस्थान के सामने साफ ऑप्शन है... या तो आज के खर्च में ही उलझा रहे, या भविष्य के विकास के लिए इन्वेस्टमेंट बढ़ाए। अगर राज्य ने समय रहते सही फैसला लिया, तो विकास की रफ्तार तेज हो सकती है नहीं तो पीछे छूटने का खतरा बना रहेगा।
