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16-04-2026

फ्यूल कीमतों में उछाल से मार्च में थोक मुद्रास्फीति 38 माह के उच्च स्तर 3.88% पर

  •  पश्चिम एशिया संकट के बीच फ्यूल, बिजली एवं विनिर्मित वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण मार्च में थोक मुद्रास्फीति तीन साल से अधिक यानी 38 माह के उच्च स्तर 3.88 प्रतिशत पर पहुंच गई। बुधवार को जारी सरकारी आंकड़ों से यह जानकारी मिली। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति मार्च में लगातार पांचवें महीने बढ़ी। प्राथमिक खाद्य पदार्थों की कीमतों में नरमी के बीच मुख्य मुद्रास्फीति में तेजी आई। थोक मुद्रास्फीति मार्च में वैश्विक जिंस कीमतों में वृद्धि और 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल-ईरान संघर्ष की शुरुआत के बाद से ऊर्जा कीमतों में आए झटके के प्रभाव को दर्शाती है। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित मुद्रास्फीति फरवरी में 2.13' और मार्च, 2025 में 2.25% थी। उद्योग मंत्रालय ने बयान में कहा, ‘‘ ...कच्चे पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, अन्य विनिर्माण, गैर-खाद्य वस्तुएं, ‘मूल धातु’, विनिर्माण और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि इसकी मुख्य वजह रही।’’ डब्ल्यूपीआई आंकड़ों के अनुसार, फ्यूल व बिजली श्रेणी में मुद्रास्फीति मार्च में बढक़र 1.05 प्रतिशत हो गई जबकि फरवरी में इसमें 3.78 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। कच्चे पेट्रोलियम में मुद्रास्फीति मार्च में बढक़र 51.57 प्रतिशत हो गई जबकि पिछले महीने इसमें 1.29 प्रतिशत की गिरावट थी। विनिर्मित उत्पादों की महंगाई दर भी फरवरी के 2.92 प्रतिशत से बढक़र मार्च में 3.39 प्रतिशत हो गई। वित्तीय सेवा प्रदाता कंपनी बार्कलेज ने कहा, ‘‘ वैश्विक ऊर्जा कीमतों के ऊंच स्तर पर बने रहने से धीरे-धीरे अन्य जिंस कीमतों पर असर पड़ता है। हमारा अनुमान है कि भविष्य में थोक महंगाई और बढ़ेगी।’’ खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर हालांकि मार्च में घटकर 1.90 प्रतिशत रह गई जो फरवरी में 2.19 प्रतिशत थी। सब्जियों में यह घटकर 1.45' हो गई जबकि फरवरी में यह 4.73 प्रतिशत थी। बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री सोनल बधान ने कहा कि आगे चलकर यदि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो आने वाले महीनों में इसका प्रभाव समग्र थोक मुद्रास्फीति पर पड़ सकता है। अमेरिका-इजराइल के ईरान पर हमले के बाद पश्चिम एशिया में जारी संकट से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। 28 फरवरी से शुरू हुए इस संकट के बाद कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। सरकार ने 26 मार्च को पेट्रोल तथा डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी ताकि फ्यूल खुदरा विक्रेता बढ़ी हुई कच्चे तेल की कीमतों का बोझ उपभोक्ताओं पर न डालें। उत्पाद शुल्क में यह कटौती अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेज एवं तीव्र वृद्धि के मद्देनजर की गई जो करीब 70 डॉलर प्रति बैरल से बढक़र करीब 122 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी। इससे पहले जारी आंकड़ों के अनुसार, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित खुदरा महंगाई मार्च में बढक़र 3.4 प्रतिशत हो गई जो पिछले महीने 3.21 प्रतिशत थी। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने इस महीने की शुरुआत में चालू वित्त वर्ष 2026-27 की अपनी पहली द्वैमासिक मौद्रिक नीति पेश करते हुए प्रमुख नीतिगत दर रेपो को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा था। आरबीआई नीतिगत दरों के निर्धारण के लिए मुख्य रूप से खुदरा महंगाई को आधार मानता है।

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फ्यूल कीमतों में उछाल से मार्च में थोक मुद्रास्फीति 38 माह के उच्च स्तर 3.88% पर

 पश्चिम एशिया संकट के बीच फ्यूल, बिजली एवं विनिर्मित वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण मार्च में थोक मुद्रास्फीति तीन साल से अधिक यानी 38 माह के उच्च स्तर 3.88 प्रतिशत पर पहुंच गई। बुधवार को जारी सरकारी आंकड़ों से यह जानकारी मिली। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति मार्च में लगातार पांचवें महीने बढ़ी। प्राथमिक खाद्य पदार्थों की कीमतों में नरमी के बीच मुख्य मुद्रास्फीति में तेजी आई। थोक मुद्रास्फीति मार्च में वैश्विक जिंस कीमतों में वृद्धि और 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल-ईरान संघर्ष की शुरुआत के बाद से ऊर्जा कीमतों में आए झटके के प्रभाव को दर्शाती है। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित मुद्रास्फीति फरवरी में 2.13' और मार्च, 2025 में 2.25% थी। उद्योग मंत्रालय ने बयान में कहा, ‘‘ ...कच्चे पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, अन्य विनिर्माण, गैर-खाद्य वस्तुएं, ‘मूल धातु’, विनिर्माण और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि इसकी मुख्य वजह रही।’’ डब्ल्यूपीआई आंकड़ों के अनुसार, फ्यूल व बिजली श्रेणी में मुद्रास्फीति मार्च में बढक़र 1.05 प्रतिशत हो गई जबकि फरवरी में इसमें 3.78 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। कच्चे पेट्रोलियम में मुद्रास्फीति मार्च में बढक़र 51.57 प्रतिशत हो गई जबकि पिछले महीने इसमें 1.29 प्रतिशत की गिरावट थी। विनिर्मित उत्पादों की महंगाई दर भी फरवरी के 2.92 प्रतिशत से बढक़र मार्च में 3.39 प्रतिशत हो गई। वित्तीय सेवा प्रदाता कंपनी बार्कलेज ने कहा, ‘‘ वैश्विक ऊर्जा कीमतों के ऊंच स्तर पर बने रहने से धीरे-धीरे अन्य जिंस कीमतों पर असर पड़ता है। हमारा अनुमान है कि भविष्य में थोक महंगाई और बढ़ेगी।’’ खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर हालांकि मार्च में घटकर 1.90 प्रतिशत रह गई जो फरवरी में 2.19 प्रतिशत थी। सब्जियों में यह घटकर 1.45' हो गई जबकि फरवरी में यह 4.73 प्रतिशत थी। बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री सोनल बधान ने कहा कि आगे चलकर यदि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो आने वाले महीनों में इसका प्रभाव समग्र थोक मुद्रास्फीति पर पड़ सकता है। अमेरिका-इजराइल के ईरान पर हमले के बाद पश्चिम एशिया में जारी संकट से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। 28 फरवरी से शुरू हुए इस संकट के बाद कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। सरकार ने 26 मार्च को पेट्रोल तथा डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी ताकि फ्यूल खुदरा विक्रेता बढ़ी हुई कच्चे तेल की कीमतों का बोझ उपभोक्ताओं पर न डालें। उत्पाद शुल्क में यह कटौती अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेज एवं तीव्र वृद्धि के मद्देनजर की गई जो करीब 70 डॉलर प्रति बैरल से बढक़र करीब 122 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी। इससे पहले जारी आंकड़ों के अनुसार, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित खुदरा महंगाई मार्च में बढक़र 3.4 प्रतिशत हो गई जो पिछले महीने 3.21 प्रतिशत थी। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने इस महीने की शुरुआत में चालू वित्त वर्ष 2026-27 की अपनी पहली द्वैमासिक मौद्रिक नीति पेश करते हुए प्रमुख नीतिगत दर रेपो को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा था। आरबीआई नीतिगत दरों के निर्धारण के लिए मुख्य रूप से खुदरा महंगाई को आधार मानता है।


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