शोध संस्थान ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने कहा कि सरकार को औद्योगिक उत्पादों के नियमित परीक्षण शुल्क की अधिकतम सीमा तय करनी चाहिए, क्योंकि क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (क्यूसीओ) के अनुपालन की लागत बढऩे से देश के विनिर्माण क्षेत्र और छोटे आयातकों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। जीटीआरआई ने कहा कि क्यूसीओ नीति का उद्देश्य उत्पादों की क्वालिटी और उपभोक्ता सुरक्षा को बढ़ाना है, लेकिन इसके तेजी से विस्तार के कारण परीक्षण ढांचे पर दबाव बढ़ रहा है और सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए अनुपालन में कठिनाइयां उत्पन्न हो रही हैं। संस्थान के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारत की बढ़ती क्वालिटी कंट्रोल व्यवस्था के कारण परीक्षण और प्रमाणन की लागत इतनी अधिक हो गई है कि कई छोटे आयातक कारोबार से बाहर हो सकते हैं, जिससे बाजार पर बड़े आयातकों का वर्चस्व बढ़ सकता है। उन्होंने बताया कि यह शुल्क विदेशी विनिर्माता प्रमाणन योजना के तहत लगता है, जो भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के अंतर्गत लागू है। इसके तहत जिन उत्पादों पर क्यूसीओ लागू है, उनके विदेशी विनिर्माताओं को भारत में एक्सपोर्ट करने से पहले बीआईएस प्रमाणन प्राप्त करना आवश्यक होता है। जीटीआरआई ने कहा कि बड़ी कंपनियां इन लागत को बड़े व्यापार में समायोजित कर सकती हैं, लेकिन छोटे आयातकों के लिए यह संभव नहीं है। कई एमएसएमई के लिए 15 से 20 लाख रुपये तक का प्रारंभिक प्रमाणन खर्च व्यवसाय को अव्यावहारिक बना देता है। संस्थान ने सरकार से मांग की कि नियमित औद्योगिक उत्पादों के परीक्षण शुल्क पर सीमा तय की जाए, मान्यता प्राप्त विदेशी प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट को स्वीकार किया जाए, जोखिम आधारित परीक्षण नियम अपनाए जाएं और नए क्यूसीओ लागू करने से पहले नियामकीय प्रभाव का आकलन किया जाए।