मिडिल ईस्ट यानि खाड़ी के देशों में से अगर कोई देश युद्ध की चपेट में आ जाता है तो इसका जितना असर पूरी दुनिया पर पड़ता उतना असर दुनिया में कहीं और हो रहे युद्ध का नहीं पड़ता। इसकी एक ही वजह है तेल की सप्लाई, जो खाड़ी के देशों से अमरीका को छोडक़र चीन, भारत, जापान जैसी बड़ी इकोनॉमी वाले देशों के साथ-साथ यूरोप व अन्य कई देशों की एनर्जी की जरूरतों को पूरा करती है। ईरान युद्ध ने हमें शायद नई सीख यह दी है कि इतिहास में हो चुकी समान घटनाओं से जो कुछ सीखा या जाना हो वह जरूरी नहीं कि आने वाले समय में काम आए। क्योंकि ईरान युद्ध के दौरान पूरी दुनिया के फाइनेंशियल सेक्टर ने जिस तरह बिहेव किया है वैसा खाड़ी के देशों में पहले हो चुके युद्धों के दौरान नहीं हुआ था जबकि ज्यादातर एक्सपर्ट इतिहास के फिर से रिपीट होने की आशंका जता रहे थे। यहां तेल की कीमतें व सप्लाई से जुड़ी बातों ने काफी कुछ नया बताया जिसका कोई अंदाजा नहीं लगा पाया। क्या आप जानते हैं कि 3.5 महीने के ईरान युद्ध के दौरान हर दिन जितनी बड़ी मात्रा में तेल की सप्लाई में रूकावट आई उसका साइज Gulf Wa (1990-91), ईरान की क्रांति (1978-79) व अरब देशों द्वारा तेल की सप्लाई पर कंट्रोल (1973) के दौरान बाधित हुई कुल सप्लाई के आसपास रहा, फिर भी तेल की कीमतें उतनी नहीं बढ़ी जितनी उम्मीद की जा रही थी या जितनी इतिहास में ऐसे मौकों के दौरान बढ़ी थी। 1990-1991 में तेल की कीमतों में 130 प्रतिशत, 1978-79 में 160 प्रतिशत व 1973 में 300 प्रतिशत की तेजी आई थी जिसने पूरी दुनिया को घुटनों पर ला दिया था। इसके वैसे तो कई कारण गिनाए जा सकते हैं पर सबसे बड़ा कारण यह है कि पिछले कुछ सालों में ग्लोबल व ज्यादातर देशों की इकोनॉमी पूरी तरह बदल चुकी है व ईरान युद्ध से पहले जिस तरह पूरी दुनिया के बाजार चल रहे थे उसका भी बड़ा रोल रहा है। युद्ध के बहुत पहले से ही तेल की डिमांड व सप्लाई बढ़ रही थी क्योंकि चीन की तरह कई देश तेल के अपने रिजर्व बढ़ा रहे थे। इन्हीं रिजर्व के चलते युद्ध की दौरान तेल की डिमांड उतनी नहीं बढ़ी जितनी उम्मीद की जा रही थी। पहले यानि 1970-80 के दौरान तेल के बड़े रिजर्व रखने वाला शायद ही कोई देश रहा होगा। हालांकि अब जो रिजर्व काम आ चुके हैं उन्हें फिर से भरने के लिए आगे तेल की डिमांड बढ़ सकती है।
इसी तरह मुश्किल समय में सुरक्षा का भाव देने वाले सोना व चांदी ने भी ईरान युद्ध के दौरान अलग ही तरह का व्यवहार किया और इनकी कीमतों में बढ़त की जगह अपने पीक से 25-35' की गिरावट दर्ज हुई। इसका कारण यह रहा कि 2025 व 2026 की शुरुआत में सोने व चांदी में तेजी आ चुकी थी जबकि युद्ध इसके बाद शुरू हुआ था। इस बार डॉलर की मजबूती ने सभी को हैरान कर दिया है। इसका सबसे बड़ा कारण अमरीका का यूरोप व एशिया के मुकाबले एनर्जी पर ज्यादा आत्मनिर्भर होना तो है ही पर साथ ही अमरीका द्वारा लागू किए गए टैरिफ का भी डॉलर को मजबूत रखने में बड़ा रोल रहा है। शेयर बाजारों की चाल सभी देख रहे हैं जो युद्ध के काफी पहले से कमजोर बने हुए थे। बाजारों में पिछले साल आए रिकॉर्ड आईपीओ ने करोड़ों लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया जहां लोग अपना इंवेस्टमेंट सुरक्षित मानने लगे थे व अच्छी रिटर्न की उम्मीद में शेयर बाजारों का हिस्सा बन रहे थे। आज भी समझदार लोग शेयर बाजारों में ही अपना इंवेस्टमेंट सुरक्षित मान रहे हैं या जिनकी बाजारों के अच्छा रिटर्न देने की उम्मीद कम नहीं हुई है। समय का भी अपना रोल होता है जो समझा रहा है कि युद्ध के पहले व इसके दौरान जो कुछ हुआ उसे ठीक तरह से समझना तो जरूरी है ही, पर साथ ही यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि युद्ध के कारण जो चीजें बड़े लेवल पर बिगड़ गई है उसका असर आने वाले समय में जरूर महसूस किया जाएगा। आज शेयर बाजारों की तेजी में इस बात को भुलाना सही नहीं होगा कि इकोनॉमिक ग्रोथ के धीमा होने, महंगायी से मांग पर दबाव, उधार की कास्ट बढऩे व कॉर्पोरेट सेक्टर की कमाई पर दबाव आने के कई कारण आज भी मौजूद है। खाड़ी देशों में पहले आ चुके युद्ध जैसे संकटों के बाद शेयर बाजारों व इकोनॉमी में मंदी आई थी पर क्या ऐसा इस बार भी होगा यह बड़ा सवाल है लेकिन यह उम्मीद करना भी गलत नहीं है कि ऊपर दिए गए उदाहरणों की तरह इतिहास इस बार रिपीट नहीं होगा।