भारत दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेक्टर मैन्युफैक्चरर है। साथ में लगी टेबल से पता चलता है कि वित्त वर्ष 15 के बाद के सालों में ट्रेक्टर की डोमेस्टिक और एक्सपोर्ट सेल्स अमूमन डबल हो चुकी है। वित्त वर्ष 26 में शानदार परफॉर्मेन्स के साथ इंडिया की ट्रेक्टर इंडस्ट्री की ग्रोथ रेट लगभग 23.5 परसेंट बढ़ी। इंवेस्टमेंट बैंक पेंटोमैथ कैपिटल की रिपोर्ट के अनुसार यह ग्रोथ वित्त वर्ष 27 की शुरुआती तिमाहियों में भी जारी रह सकती है। फार्म इनकम में सुधार, एग्रीकल्चर आउटपुट बढऩा, जलाशयों में पर्याप्त जल भंडार, एमएसपी में लगातार हो रही बढ़ोतरी और रूरल इकोनॉमी को मिल रहे सरकारी सपोर्ट जैसे फैक्टर ट्रेक्टर की डिमांड के लिए ग्रोथ ड्राइवर साबित हुए हैं। लेकिन पेंटोमैथ कैपिटल ने जब ये रिपोर्ट लिखी होगी तब एल नीनो की खबर नहीं आई होगी। लेटेस्ट रिपोर्ट्स कहती हैं कि भारत में मानसून के चार महीनों के दौरान सामान्य की 80 परसेंट की बारिश होगी। और हॉट वेदर का एक पावरफुल सिस्टम डवलप हो रहा है। यानी ट्रेक्टर सेल्स को ग्रोथ ड्राइवर का शायद इतना ज्यादा सपोर्ट नहीं मिले। पेंटोमैथ कैपिटल के एमडी मितुल शाह के अनुसार, इंडिया की ट्रेक्टर इंडस्ट्री ने वित्त वर्ष 27 में बहुत फर्म फुटिंग (बेहद मजबूत स्थिति) के साथ एंट्री ली है। कृषि क्षेत्र की मजबूत बुनियाद, जलाशयों का बेहतर स्तर और ग्रामीण क्षेत्रों में सकारात्मक माहौल वर्ष की पहली छमाही में डिमांड को सपोर्ट देंगे। लेकिन देश की एग्रीकल्चर इकोनॉमी आज भी ज्यादातर मॉनसून की बारिश पर निर्भर है। देश का 45-50 परसेंट बुवाई रकबे में सिंचाई मॉनसूनी बारिश से होती है। फिर भारत जैसे देश में मॉनसून का साइकोलॉजिकल असर तो होता ही है। लेकिन पिछले एक दशक में बढ़ते मशीनीकरण, बेहतर सिंचाई सुविधाओं और किसानों की उत्पादकता में वृद्धि ने इस इंडस्ट्री को पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत बना दिया है। फाडा की लेटेस्ट रिपोर्ट के अनुसार मई के महीने में ट्रेक्टर सेल्स में सालाना आधार पर 11.17 परसेंट की ग्रोथ हुई है। पेंटोमैथ की रिपोर्ट कहती है कि वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में ट्रेक्टर सेल्स 15 परसेंट से अधिक बढ़ सकती है। रिपोर्ट के अनुसार साउथ इंडिया, गुजरात और राजस्थान में ट्रेक्टर की डिमांड सबसे अधिक बनी हुई है। इन क्षेत्रों में रूरल कैश फ्लो और खेती में मशीनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। दूसरी ओर किसान अब ज्यादा हॉर्सपावर वाले ट्रेक्टर की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। वित्त वर्ष 26 में 46-50 हॉर्सपावर कैटेगरी का कुल ट्रेक्टर सेल्स में लगभग आधा हिस्सा रहा। रिपोर्ट के अनुसार यदि एल नीनो के कारण मानसून प्रभावित होता है तो भी अच्छे जलाशय स्तर, मजबूत रबी फसल उत्पादन और बेहतर पैदावार इस रिस्क को काफी हद तक कम कर सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की ट्रेक्टर इंडस्ट्री धीरे-धीरे मानसून पर अपनी निर्भरता से बाहर निकल रही है। सिंचाई कवरेज में विस्तार, क्रॉप साइकल की बढ़ती तीव्रता, ग्रामीण बुनियादी ढांचे में सुधार और लगातार सरकारी सपोर्ट ट्रेक्टर डिमांड को मजबूत बनाए हुए हैं।
