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18-06-2026

फ्रांस क्यों करना चाहता है आर्सेलर मित्तल का नेशनलाइजेशन?

  •  पूंजीवाद का ढोल पीटने वाला फ्रांस अब समाजवादी धमकी देने पर उतर आया है...। फ्रांस भारत के बिलिनेयर स्टील दिग्गज लक्ष्मी मित्तल की कंपनी आर्सेलरमित्तल के फ्रेंच बिजनस का नेशनलाइजेशन करने की धमकी दे रहा है। फ्रांस में उठ रही स्टील कंपनी के राष्ट्रीयकरण की मांग ने एक बड़ी राजनीतिक और आर्थिक बहस शुरू कर दी है। फ्रांस की संसद ने आर्सेलरमित्तल फ्रांस को सरकारी नियंत्रण में लेने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि यह अभी कानून नहीं बना है क्योंकि फ्रांस सरकार और सीनेट इस कदम के विरोध में हैं। यह विवाद केवल एक कंपनी का मामला नहीं है, बल्कि यूरोप की इंडस्ट्रीयल पॉलिसी, जॉब सिक्यॉरिटी और स्ट्रेटेजिक इंडस्ट्रीज में सरकार की भूमिका को लेकर बड़ी बहस बन गया है। इस पूरे विवाद की शुरुआत आर्सेलरमित्तल द्वारा फ्रांस में नौकरियों में कटौती और रीस्ट्रक्चरिंग के प्लान से हुई। कंपनी द्वारा अपने फ्रांस स्थित प्लांट्स में सैकड़ों जॉब्स खत्म कर देने की घोषणा से ट्रेड यूनियनों और राजनीतिक दलों ने जैसे जंग ही छेड़ दी।  फ्रांस के कुछ सांसदों का कहना है कि स्टील कोई सामान्य उद्योग नहीं है। स्टील कंस्ट्रक्शन, रेलवे, ऑटोमोबाइल, डिफेंस, एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और हेवी इंडस्ट्रीज की बुनियादी जरूरत है। अगर किसी देश की घरेलू स्टील क्षमता कमजोर होती है, तो इस महत्वपूर्ण सप्लाई चेन के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता बढ़ सकती है। ऐसे ही एक मामले में जापान की स्टील कंपनी निप्पॉन स्टील ने अमेरिका की यूएस स्टील को खरीदने के लिए आपसी सहमति से डील की थी। तब के प्रेसिडेंट जो बाइडन ने इस डील को स्ट्रेटेजिक असैट बताते हुए ब्लॉक कर दिया था। यह तब है जब यूएस स्टील भयंकर क्राइसिस में थी। हालात यहां तक थे कि प्रेसिडेंट इलेक्शन में भी यह डील मुद्दा बन गई थी। हालांकि प्रेसिडेंट ट्रंप के आने के बाद जून 2025 में डील को मंजूरी मिल गई।

    आर्सेलरमित्तल के रीस्ट्रक्चरिंग प्लान का विरोध इसलिए किया जा रहा है क्योंकि फ्रंास में इंडस्ट्रियल सैक्टर में जॉब्स कम हो रहे हैं और स्टील प्लांट बंद होने से हजारों जॉब्स जा सकते हैं। दूसरा मुद्दा ग्रीन स्टील है। स्टील इंडस्ट्री का एमिशन बहुत होता है और यूरोप लो एमिशन टेक्नोलॉजी में इंवेस्टमेंट करना चाहताा है। राष्ट्रीयकरण का सपोर्ट करने वालों का कहना है कि सरकार अपने हाथ में ले लेगी तो टेक्नोलॉजी में इंवेस्टमेंट तेजी से होगा। फ्रांस सरकार का मानना है कि नेशनलाइजेशन समस्या का समाधान नहीं है। उनके अनुसार यूरोपीय स्टील इंडस्ट्री की असली चुनौती कंपनी की ओनरशिप की नहीं बल्कि ग्लोबल मार्केट की स्थिति है। आर्सेलरमित्तल फ्रांस में उठ रही इस मांग का विरोध कर रही है। कंपनी का कहना है कि उसने फ्रांस में पिछले कुछ वर्ष में अरबों यूरो का इंवेस्टमेंट किया गया है। कंपनी का तर्क है कि वह ग्रीन स्टील और आधुनिक उत्पादन तकनीक में निवेश कर रही है। फ्रांस की संसद की मंजूरी के बावजूद राष्ट्रीयकरण तुरंत लागू नहीं होगा। फ्रांस में सीनेट की मंजूरी जरूरी है और सीनेट पहले ही इस प्रस्ताव का विरोध कर चुकी है। फ्रांस सरकार इस कदम के पक्ष में नहीं है। लेकिन बात केवल आर्सेलरमित्तल की नहीं है। यूरोप के कई देश अब इस उलझन में फंसे हैं कि सेमीकंडक्टर, एनर्जी, मीनरल और स्टील जैसे स्ट्रेटेजिक सैक्टर को फ्री मार्केट के हवाले रहने दिया जाए या सरकार को अधिक भूमिका निभानी चाहिए।

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फ्रांस क्यों करना चाहता है आर्सेलर मित्तल का नेशनलाइजेशन?

 पूंजीवाद का ढोल पीटने वाला फ्रांस अब समाजवादी धमकी देने पर उतर आया है...। फ्रांस भारत के बिलिनेयर स्टील दिग्गज लक्ष्मी मित्तल की कंपनी आर्सेलरमित्तल के फ्रेंच बिजनस का नेशनलाइजेशन करने की धमकी दे रहा है। फ्रांस में उठ रही स्टील कंपनी के राष्ट्रीयकरण की मांग ने एक बड़ी राजनीतिक और आर्थिक बहस शुरू कर दी है। फ्रांस की संसद ने आर्सेलरमित्तल फ्रांस को सरकारी नियंत्रण में लेने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि यह अभी कानून नहीं बना है क्योंकि फ्रांस सरकार और सीनेट इस कदम के विरोध में हैं। यह विवाद केवल एक कंपनी का मामला नहीं है, बल्कि यूरोप की इंडस्ट्रीयल पॉलिसी, जॉब सिक्यॉरिटी और स्ट्रेटेजिक इंडस्ट्रीज में सरकार की भूमिका को लेकर बड़ी बहस बन गया है। इस पूरे विवाद की शुरुआत आर्सेलरमित्तल द्वारा फ्रांस में नौकरियों में कटौती और रीस्ट्रक्चरिंग के प्लान से हुई। कंपनी द्वारा अपने फ्रांस स्थित प्लांट्स में सैकड़ों जॉब्स खत्म कर देने की घोषणा से ट्रेड यूनियनों और राजनीतिक दलों ने जैसे जंग ही छेड़ दी।  फ्रांस के कुछ सांसदों का कहना है कि स्टील कोई सामान्य उद्योग नहीं है। स्टील कंस्ट्रक्शन, रेलवे, ऑटोमोबाइल, डिफेंस, एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और हेवी इंडस्ट्रीज की बुनियादी जरूरत है। अगर किसी देश की घरेलू स्टील क्षमता कमजोर होती है, तो इस महत्वपूर्ण सप्लाई चेन के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता बढ़ सकती है। ऐसे ही एक मामले में जापान की स्टील कंपनी निप्पॉन स्टील ने अमेरिका की यूएस स्टील को खरीदने के लिए आपसी सहमति से डील की थी। तब के प्रेसिडेंट जो बाइडन ने इस डील को स्ट्रेटेजिक असैट बताते हुए ब्लॉक कर दिया था। यह तब है जब यूएस स्टील भयंकर क्राइसिस में थी। हालात यहां तक थे कि प्रेसिडेंट इलेक्शन में भी यह डील मुद्दा बन गई थी। हालांकि प्रेसिडेंट ट्रंप के आने के बाद जून 2025 में डील को मंजूरी मिल गई।

आर्सेलरमित्तल के रीस्ट्रक्चरिंग प्लान का विरोध इसलिए किया जा रहा है क्योंकि फ्रंास में इंडस्ट्रियल सैक्टर में जॉब्स कम हो रहे हैं और स्टील प्लांट बंद होने से हजारों जॉब्स जा सकते हैं। दूसरा मुद्दा ग्रीन स्टील है। स्टील इंडस्ट्री का एमिशन बहुत होता है और यूरोप लो एमिशन टेक्नोलॉजी में इंवेस्टमेंट करना चाहताा है। राष्ट्रीयकरण का सपोर्ट करने वालों का कहना है कि सरकार अपने हाथ में ले लेगी तो टेक्नोलॉजी में इंवेस्टमेंट तेजी से होगा। फ्रांस सरकार का मानना है कि नेशनलाइजेशन समस्या का समाधान नहीं है। उनके अनुसार यूरोपीय स्टील इंडस्ट्री की असली चुनौती कंपनी की ओनरशिप की नहीं बल्कि ग्लोबल मार्केट की स्थिति है। आर्सेलरमित्तल फ्रांस में उठ रही इस मांग का विरोध कर रही है। कंपनी का कहना है कि उसने फ्रांस में पिछले कुछ वर्ष में अरबों यूरो का इंवेस्टमेंट किया गया है। कंपनी का तर्क है कि वह ग्रीन स्टील और आधुनिक उत्पादन तकनीक में निवेश कर रही है। फ्रांस की संसद की मंजूरी के बावजूद राष्ट्रीयकरण तुरंत लागू नहीं होगा। फ्रांस में सीनेट की मंजूरी जरूरी है और सीनेट पहले ही इस प्रस्ताव का विरोध कर चुकी है। फ्रांस सरकार इस कदम के पक्ष में नहीं है। लेकिन बात केवल आर्सेलरमित्तल की नहीं है। यूरोप के कई देश अब इस उलझन में फंसे हैं कि सेमीकंडक्टर, एनर्जी, मीनरल और स्टील जैसे स्ट्रेटेजिक सैक्टर को फ्री मार्केट के हवाले रहने दिया जाए या सरकार को अधिक भूमिका निभानी चाहिए।


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