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05-06-2026

फॉरेन इंवेस्टमेंट में पड़ा डेंट तो एक्शन मोड में आई सरकार

  •  भारत सरकार गवर्नमेंट बॉन्ड में एफपीआई पर लगने वाले कैपिटल गेन टैक्स को खत्म करने की तैयारी कर रही है। फॉरेन इंवेस्टमेंट (एफडीआई/एफपीआई/ एफआईआई) का आउटफ्लो बढऩे के  कारण रुपये की चूल हिली हुई हैं। वर्ष 2020 में डॉलर के मुकाबले रुपये केवल 74 रुपये का था जो अब 96 रुपये तक गिर चुका है। वर्ष 2026 में ही रुपया अब तक डॉलर के मुकाबले 5 परसेंट से अधिक कमजोर हो चुका है। रिपोर्ट्स के अनुसार अभी इस प्रस्ताव को केबिनेट ने मंजूर किया है। इस अध्यादेश को प्रेसिडेंट की मंजूरी मिलने के बाद लागू किया जाएगा। एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की चीफ इकोनॉमिस्ट माधवी अरोड़ा के अनुसार टैक्स में राहत मिलने से इंवेस्टमेंट फ्लो को सपोर्ट मिलेगा। लेकिन आज के हालातों में यह कोई मेजिक रेमिडी (जादुई समाधान) नहीं है लेकिन मीडियम टर्म में इसका फायदा मिल सकता है। अभी फॉरेन इंवेस्टर्स को 12 महीने से अधिक समय तक रखे गए लिस्टेड शेयर और बॉन्ड्स पर 12.5 परसेंट लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (एलटीजीसी) देना पड़ता है। रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार गवर्नमेंट बॉन्ड की इंटरेस्ट इनकम पर पर लगने वाले 20 परसेंट विदहोल्डिंग टैक्स (टीडीएस) को भी हटाने पर विचार कर रही है। एनेलिस्ट्स के अनुसार इक्विटी टैक्सेशन के मामले में भारत ग्लोबल बेंचमार्क के करीब है, लेकिन डैट मार्केट में नॉन-रेजिडेंट इंवेस्टमेंट (फॉरेन इंवेस्टमेंट) पर टैक्स लगाने वाले गिने-चुने देशों में शामिल है। इस वर्ष फॉरेन इंवेस्टर्स ने इंडियन गवर्नमेंट बॉन्ड्स में कुल मिलाकर 1.4 बिलियन डॉलर का नेट इंवेस्टमेंट किया है। दूसरी ओर भारतीय शेयर मार्केट से लगभग 28 बिलियन डॉलर की निकासी हुई है। एनेलिस्ट्स के अनुसार यदि सरकार कैपिटल गेन टैक्स और ब्याज कर को हटा देती है, तो भारतीय बॉन्ड मार्केट की ग्लोबल कंपीटिटिवनैस बढ़ सकती है जिससे फॉरेन इंवेस्टमेंट में तेजी आ सकती है। यदि फॉरेन इंवेस्टमेंट बढ़ता है तो हिचकोले खाता रुपया ठहर सकता है और करंट अकाउंट पर से भी प्रेशर घट सकता है। जुलाई 2024 में पेश केंद्रीय बजट में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अधिकांश असैट्स पर एलटीसीजी की रेट 10 से बढ़ाकर 12.5 परसेंट कर दी गई थी और इंडेक्सेशन बेनेफिट समाप्त कर दिया गया है। इससे भारतीय बाजार में इंवेस्टमेंट की प्रभावी लागत और बढ़ गई है। अलंकित लिमिटेड के सीएफओ गौरव माहेश्वरी के अनुसार सिंगापुर, यूएई और हांगकांग जैसे कई प्रमुख इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर एफपीआई पर कैपिटल गेन्स टैक्स नहीं लगाते हैं। हालांकि डवलप्ड मार्केट्स में लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स 15 से 24 परसेंट के बीच है, लेकिन वहां इंवेस्टर्स को बेहतर सामाजिक सुरक्षा, पारदर्शी नियम और स्थिर आर्थिक ढांचा मिलता है। एनेलिस्ट्स के अनुसार कैपिटल आउटफ्लो के पांच प्रमुख कारण हैं— एलटीसीजी में बढ़ोतरी, रुपये में कमजोरी, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में वृद्धि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और चीन में निवेश अवसरों का बढऩा। हालांकि भारत की घरेलू निवेशक शक्ति अभी भी मजबूत बनी हुई है। म्यूचुअल फंड, ईटीएफ, बीमा और रिटेल निवेशकों की लगातार भागीदारी ने बाजार को मजबूत बनाए रखा है। 

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फॉरेन इंवेस्टमेंट में पड़ा डेंट तो एक्शन मोड में आई सरकार

 भारत सरकार गवर्नमेंट बॉन्ड में एफपीआई पर लगने वाले कैपिटल गेन टैक्स को खत्म करने की तैयारी कर रही है। फॉरेन इंवेस्टमेंट (एफडीआई/एफपीआई/ एफआईआई) का आउटफ्लो बढऩे के  कारण रुपये की चूल हिली हुई हैं। वर्ष 2020 में डॉलर के मुकाबले रुपये केवल 74 रुपये का था जो अब 96 रुपये तक गिर चुका है। वर्ष 2026 में ही रुपया अब तक डॉलर के मुकाबले 5 परसेंट से अधिक कमजोर हो चुका है। रिपोर्ट्स के अनुसार अभी इस प्रस्ताव को केबिनेट ने मंजूर किया है। इस अध्यादेश को प्रेसिडेंट की मंजूरी मिलने के बाद लागू किया जाएगा। एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की चीफ इकोनॉमिस्ट माधवी अरोड़ा के अनुसार टैक्स में राहत मिलने से इंवेस्टमेंट फ्लो को सपोर्ट मिलेगा। लेकिन आज के हालातों में यह कोई मेजिक रेमिडी (जादुई समाधान) नहीं है लेकिन मीडियम टर्म में इसका फायदा मिल सकता है। अभी फॉरेन इंवेस्टर्स को 12 महीने से अधिक समय तक रखे गए लिस्टेड शेयर और बॉन्ड्स पर 12.5 परसेंट लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (एलटीजीसी) देना पड़ता है। रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार गवर्नमेंट बॉन्ड की इंटरेस्ट इनकम पर पर लगने वाले 20 परसेंट विदहोल्डिंग टैक्स (टीडीएस) को भी हटाने पर विचार कर रही है। एनेलिस्ट्स के अनुसार इक्विटी टैक्सेशन के मामले में भारत ग्लोबल बेंचमार्क के करीब है, लेकिन डैट मार्केट में नॉन-रेजिडेंट इंवेस्टमेंट (फॉरेन इंवेस्टमेंट) पर टैक्स लगाने वाले गिने-चुने देशों में शामिल है। इस वर्ष फॉरेन इंवेस्टर्स ने इंडियन गवर्नमेंट बॉन्ड्स में कुल मिलाकर 1.4 बिलियन डॉलर का नेट इंवेस्टमेंट किया है। दूसरी ओर भारतीय शेयर मार्केट से लगभग 28 बिलियन डॉलर की निकासी हुई है। एनेलिस्ट्स के अनुसार यदि सरकार कैपिटल गेन टैक्स और ब्याज कर को हटा देती है, तो भारतीय बॉन्ड मार्केट की ग्लोबल कंपीटिटिवनैस बढ़ सकती है जिससे फॉरेन इंवेस्टमेंट में तेजी आ सकती है। यदि फॉरेन इंवेस्टमेंट बढ़ता है तो हिचकोले खाता रुपया ठहर सकता है और करंट अकाउंट पर से भी प्रेशर घट सकता है। जुलाई 2024 में पेश केंद्रीय बजट में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अधिकांश असैट्स पर एलटीसीजी की रेट 10 से बढ़ाकर 12.5 परसेंट कर दी गई थी और इंडेक्सेशन बेनेफिट समाप्त कर दिया गया है। इससे भारतीय बाजार में इंवेस्टमेंट की प्रभावी लागत और बढ़ गई है। अलंकित लिमिटेड के सीएफओ गौरव माहेश्वरी के अनुसार सिंगापुर, यूएई और हांगकांग जैसे कई प्रमुख इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर एफपीआई पर कैपिटल गेन्स टैक्स नहीं लगाते हैं। हालांकि डवलप्ड मार्केट्स में लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स 15 से 24 परसेंट के बीच है, लेकिन वहां इंवेस्टर्स को बेहतर सामाजिक सुरक्षा, पारदर्शी नियम और स्थिर आर्थिक ढांचा मिलता है। एनेलिस्ट्स के अनुसार कैपिटल आउटफ्लो के पांच प्रमुख कारण हैं— एलटीसीजी में बढ़ोतरी, रुपये में कमजोरी, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में वृद्धि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और चीन में निवेश अवसरों का बढऩा। हालांकि भारत की घरेलू निवेशक शक्ति अभी भी मजबूत बनी हुई है। म्यूचुअल फंड, ईटीएफ, बीमा और रिटेल निवेशकों की लगातार भागीदारी ने बाजार को मजबूत बनाए रखा है। 


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