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20-04-2026

मार्जिन पर मार : पैकेजिंग कॉस्ट ने बढ़ाई टेंशन

  •  वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब सीधे भारत के उपभोक्ता बाजार पर दिखने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बाद अब पैकेजिंग इंडस्ट्री में भी महंगाई तेज हो गई है, जिससे FMCG, ड्रिंक्स और फार्मा कंपनियों की कॉस्ट लगातार बढ़ रही है। जो पैकेजिंग पहले सिर्फ एक सपोर्ट सिस्टम मानी जाती थी, वही अब कंपनियों के लिए सबसे बड़ा खर्च और जोखिम बनती जा रही है। ग्लास बोतलों की कमी बाजार में साफ नजर आ रही है। इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक, ग्लास की कॉस्ट 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है, जबकि प्लास्टिक रेजिन और पॉलिमर की कीमतों में 50 से 60 प्रतिशत तक उछाल आया है। इसका सीधा कारण कच्चे तेल की महंगाई और सप्लाई चेन में रुकावट है। इसके अलावा, ग्लास बनाने वाली कई फैक्ट्रियां गैस और ईंधन महंगा होने के कारण केवल 40 से 60 प्रतिशत क्षमता पर ही काम कर पा रही हैं, जिससे सप्लाई और सीमित हो गई है। ड्रिंक्स इंडस्ट्री इस संकट का सबसे बड़ा शिकार बन रही है। शराब और सॉफ्ट ड्रिंक कंपनियां ग्लास बोतलों पर ज्यादा निर्भर होती हैं, और अब वही बोतलें कम पड़ रही हैं। गर्मियों के पीक सीजन में डिमांड 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाती है, लेकिन सप्लाई उतनी नहीं बढ़ पा रही। नतीजतन, कई कंपनियां या तो प्रोडक्शन घटा रही हैं या फिर बोतलों के लिए पहले से ज्यादा इन्वेंट्री जमा कर रही हैं, जो 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ाई गई है। पैकेजिंग की कॉस्ट आमतौर पर किसी भी प्रोडक्ट की कुल कॉस्ट का 15 से 25 प्रतिशत हिस्सा होती है, लेकिन मौजूदा हालात में यह हिस्सा और बढ़ रहा है। इसके चलते कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर 2 से 5 प्रतिशत तक का सीधा असर पड़ रहा है। वहीं लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट में भी 10 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे कुल खर्च और ऊपर जा रहा है। इस दबाव से निपटने के लिए कंपनियां कई रणनीतियों पर काम कर रही हैं। कुछ कंपनियां छोटे पैक (लो यूनिट पैक) लॉन्च कर रही हैं, ताकि कीमत कम रखी जा सके। वहीं कई ब्रांड पैकेजिंग को हल्का बना रहे हैं या फिर कम बिकने वाले वेरिएंट्स (स््य) को घटा रहे हैं। कीमत बढ़ाना भी एक विकल्प है, लेकिन कंपनियां इसे धीरे-धीरे लागू कर रही हैं ताकि डिमांड पर असर न पड़े। अगर वेस्ट एशिया में तनाव जल्द कम नहीं होता, तो आने वाले 3 से 6 महीनों में इसका असर और ज्यादा गहरा हो सकता है। ग्राहकों को या तो महंगे प्रोडक्ट मिलेंगे या फिर छोटे पैक में सामान खरीदना पड़ेगा। साफ है कि पैकेजिंग का यह संकट अब सिर्फ एक इंडस्ट्री की समस्या नहीं रहा, बल्कि पूरे बाजार की दिशा तय करने वाला बड़ा फैक्टर बन चुका है।

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मार्जिन पर मार : पैकेजिंग कॉस्ट ने बढ़ाई टेंशन

 वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब सीधे भारत के उपभोक्ता बाजार पर दिखने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बाद अब पैकेजिंग इंडस्ट्री में भी महंगाई तेज हो गई है, जिससे FMCG, ड्रिंक्स और फार्मा कंपनियों की कॉस्ट लगातार बढ़ रही है। जो पैकेजिंग पहले सिर्फ एक सपोर्ट सिस्टम मानी जाती थी, वही अब कंपनियों के लिए सबसे बड़ा खर्च और जोखिम बनती जा रही है। ग्लास बोतलों की कमी बाजार में साफ नजर आ रही है। इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक, ग्लास की कॉस्ट 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है, जबकि प्लास्टिक रेजिन और पॉलिमर की कीमतों में 50 से 60 प्रतिशत तक उछाल आया है। इसका सीधा कारण कच्चे तेल की महंगाई और सप्लाई चेन में रुकावट है। इसके अलावा, ग्लास बनाने वाली कई फैक्ट्रियां गैस और ईंधन महंगा होने के कारण केवल 40 से 60 प्रतिशत क्षमता पर ही काम कर पा रही हैं, जिससे सप्लाई और सीमित हो गई है। ड्रिंक्स इंडस्ट्री इस संकट का सबसे बड़ा शिकार बन रही है। शराब और सॉफ्ट ड्रिंक कंपनियां ग्लास बोतलों पर ज्यादा निर्भर होती हैं, और अब वही बोतलें कम पड़ रही हैं। गर्मियों के पीक सीजन में डिमांड 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाती है, लेकिन सप्लाई उतनी नहीं बढ़ पा रही। नतीजतन, कई कंपनियां या तो प्रोडक्शन घटा रही हैं या फिर बोतलों के लिए पहले से ज्यादा इन्वेंट्री जमा कर रही हैं, जो 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ाई गई है। पैकेजिंग की कॉस्ट आमतौर पर किसी भी प्रोडक्ट की कुल कॉस्ट का 15 से 25 प्रतिशत हिस्सा होती है, लेकिन मौजूदा हालात में यह हिस्सा और बढ़ रहा है। इसके चलते कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर 2 से 5 प्रतिशत तक का सीधा असर पड़ रहा है। वहीं लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट में भी 10 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे कुल खर्च और ऊपर जा रहा है। इस दबाव से निपटने के लिए कंपनियां कई रणनीतियों पर काम कर रही हैं। कुछ कंपनियां छोटे पैक (लो यूनिट पैक) लॉन्च कर रही हैं, ताकि कीमत कम रखी जा सके। वहीं कई ब्रांड पैकेजिंग को हल्का बना रहे हैं या फिर कम बिकने वाले वेरिएंट्स (स््य) को घटा रहे हैं। कीमत बढ़ाना भी एक विकल्प है, लेकिन कंपनियां इसे धीरे-धीरे लागू कर रही हैं ताकि डिमांड पर असर न पड़े। अगर वेस्ट एशिया में तनाव जल्द कम नहीं होता, तो आने वाले 3 से 6 महीनों में इसका असर और ज्यादा गहरा हो सकता है। ग्राहकों को या तो महंगे प्रोडक्ट मिलेंगे या फिर छोटे पैक में सामान खरीदना पड़ेगा। साफ है कि पैकेजिंग का यह संकट अब सिर्फ एक इंडस्ट्री की समस्या नहीं रहा, बल्कि पूरे बाजार की दिशा तय करने वाला बड़ा फैक्टर बन चुका है।


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