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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

15-04-2026

क्या 100% OFS वाले IPOमें करना चाहिए इंवेस्ट ?

  •  पिछले कुछ वर्षों में भारत के IPO बाजार में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। लेकिन इस तेजी के साथ एक अहम सवाल भी खड़ा हुआ है—क्या निवेशकों को उन IPO में पैसा लगाना चाहिए, जिनमें पूरा इश्यू Offer for Sale (OFS) होता है? मशहूर निवेशक वॉरेन बफेट ने एक बार कहा था कि बाजार के उछाल के दौर में कई बार कंपनियां ऊंची कीमत पर शेयर बेचकर निवेशकों से पैसा अपने पास ले जाती हैं। आज के समय में यह बात भारत के कई IPO पर लागू होती दिख रही है। आमतौर पर IPO का मकसद होता है कि कंपनी नया पैसा जुटाकर अपने बिजऩेस को बढ़ाए। लेकिन 100% OFSवाले IPO में कंपनी को कोई नया पैसा नहीं मिलता। इसमें सिर्फ प्रमोटर, प्राइवेट इक्विटी फंड और शुरुआती निवेशक अपने शेयर बेचकर पैसा निकालते हैं। पिछले पांच साल में लगभग 300 IPO में OFS का हिस्सा था, जिनमें से 68 पूरी तरह OFS थे। इनसे जुटाए गए करीब 1.76 लाख करोड़ का एक भी हिस्सा कंपनियों के विस्तार या कर्ज घटाने में नहीं गया। इसका साफ मतलब है कि इन IPO का मुख्य उद्देश्य सिर्फ पैसा निकालना था। नतीजे भी बहुत उत्साहजनक नहीं रहे हैं। इन 68 कंपनियों की कुल वैल्यू लिस्टिंग के बाद करीब रुपये 95,000 करोड़ तक घट गई। औसतन हर कंपनी ने लगभग रुपये 1,400 करोड़ की वैल्यू गंवाई। सबसे चिंता की बात यह है कि 60' से ज्यादा कंपनियां अब अपने लिस्टिंग वाले स्तर से नीचे ट्रेड कर रही हैं। इसका एक बड़ा कारण ऊंची वैल्यूएशन है। जहां निफ्टी-50 आमतौर पर 20-30 के पी/ई रेशियो पर ट्रेड करता है, वहीं इन IPO का औसत पी/ई रेशियो करीब 57 रहा। कुछ कंपनियों में तो निवेशकों ने 1 रुपये की कमाई के लिए 100 रुपये से ज्यादा चुकाए। हालांकि यह भी सच है कि हर OFS वाला IPO खराब नहीं होता। कुछ मजबूत कंपनियां जैसे मैनकाइंड फार्मा या  आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एएमसी उचित कीमत पर लिस्ट हुईं और निवेशकों को अच्छा रिटर्न भी दिया। इसलिए सिर्फ ह्रस्नस् होने के आधार पर किसी OFS को खारिज करना सही नहीं होगा। लेकिन निवेशकों को सावधान रहने की जरूरत है। सबसे जरूरी सवाल यह है—जब प्रमोटर और बड़े निवेशक खुद इस समय शेयर बेच रहे हैं, तो क्या यह सही समय है खरीदने का? अगर कंपनी का बिजऩेस मजबूत है, ग्रोथ साफ दिख रही है और वैल्यूएशन उचित है, तभी निवेश करना समझदारी होगी। इस पूरे ट्रेंड से एक साफ सबक निकलता है। निवेश बैंक अपनी फीस के लिए ऊंची कीमत तय करते हैं, प्रमोटर सही मौके पर शेयर बेचते हैं, लेकिन निवेशक अगर बिना सोचे-समझे सिर्फ तेजी के लालच में पैसा लगाते हैं, तो नुकसान उठाना पड़ सकता है। अंत में, 100% OFS वाले IPO में निवेश करना गलत नहीं है, लेकिन आंख बंद करके निवेश करना जरूर गलत है। समझदारी, रिसर्च और सही कीमत पर निवेश ही इस बाजार में सफलता की कुंजी है।

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क्या 100% OFS वाले IPOमें करना चाहिए इंवेस्ट ?

 पिछले कुछ वर्षों में भारत के IPO बाजार में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। लेकिन इस तेजी के साथ एक अहम सवाल भी खड़ा हुआ है—क्या निवेशकों को उन IPO में पैसा लगाना चाहिए, जिनमें पूरा इश्यू Offer for Sale (OFS) होता है? मशहूर निवेशक वॉरेन बफेट ने एक बार कहा था कि बाजार के उछाल के दौर में कई बार कंपनियां ऊंची कीमत पर शेयर बेचकर निवेशकों से पैसा अपने पास ले जाती हैं। आज के समय में यह बात भारत के कई IPO पर लागू होती दिख रही है। आमतौर पर IPO का मकसद होता है कि कंपनी नया पैसा जुटाकर अपने बिजऩेस को बढ़ाए। लेकिन 100% OFSवाले IPO में कंपनी को कोई नया पैसा नहीं मिलता। इसमें सिर्फ प्रमोटर, प्राइवेट इक्विटी फंड और शुरुआती निवेशक अपने शेयर बेचकर पैसा निकालते हैं। पिछले पांच साल में लगभग 300 IPO में OFS का हिस्सा था, जिनमें से 68 पूरी तरह OFS थे। इनसे जुटाए गए करीब 1.76 लाख करोड़ का एक भी हिस्सा कंपनियों के विस्तार या कर्ज घटाने में नहीं गया। इसका साफ मतलब है कि इन IPO का मुख्य उद्देश्य सिर्फ पैसा निकालना था। नतीजे भी बहुत उत्साहजनक नहीं रहे हैं। इन 68 कंपनियों की कुल वैल्यू लिस्टिंग के बाद करीब रुपये 95,000 करोड़ तक घट गई। औसतन हर कंपनी ने लगभग रुपये 1,400 करोड़ की वैल्यू गंवाई। सबसे चिंता की बात यह है कि 60' से ज्यादा कंपनियां अब अपने लिस्टिंग वाले स्तर से नीचे ट्रेड कर रही हैं। इसका एक बड़ा कारण ऊंची वैल्यूएशन है। जहां निफ्टी-50 आमतौर पर 20-30 के पी/ई रेशियो पर ट्रेड करता है, वहीं इन IPO का औसत पी/ई रेशियो करीब 57 रहा। कुछ कंपनियों में तो निवेशकों ने 1 रुपये की कमाई के लिए 100 रुपये से ज्यादा चुकाए। हालांकि यह भी सच है कि हर OFS वाला IPO खराब नहीं होता। कुछ मजबूत कंपनियां जैसे मैनकाइंड फार्मा या  आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एएमसी उचित कीमत पर लिस्ट हुईं और निवेशकों को अच्छा रिटर्न भी दिया। इसलिए सिर्फ ह्रस्नस् होने के आधार पर किसी OFS को खारिज करना सही नहीं होगा। लेकिन निवेशकों को सावधान रहने की जरूरत है। सबसे जरूरी सवाल यह है—जब प्रमोटर और बड़े निवेशक खुद इस समय शेयर बेच रहे हैं, तो क्या यह सही समय है खरीदने का? अगर कंपनी का बिजऩेस मजबूत है, ग्रोथ साफ दिख रही है और वैल्यूएशन उचित है, तभी निवेश करना समझदारी होगी। इस पूरे ट्रेंड से एक साफ सबक निकलता है। निवेश बैंक अपनी फीस के लिए ऊंची कीमत तय करते हैं, प्रमोटर सही मौके पर शेयर बेचते हैं, लेकिन निवेशक अगर बिना सोचे-समझे सिर्फ तेजी के लालच में पैसा लगाते हैं, तो नुकसान उठाना पड़ सकता है। अंत में, 100% OFS वाले IPO में निवेश करना गलत नहीं है, लेकिन आंख बंद करके निवेश करना जरूर गलत है। समझदारी, रिसर्च और सही कीमत पर निवेश ही इस बाजार में सफलता की कुंजी है।


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