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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

09-04-2026

सेबी ने आईपीओ एप्रूवल की वैलिडिटी 30 सितंबर तक बढ़ायी

  •  पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच बाजार नियामक सेबी ने मंगलवार को आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के लिए दी गयी मंजूरी की वैधता 30 सितंबर तक बढ़ा दी। साथ ही न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता नियमों का अनुपालन नहीं करने वाली इकाइयों को भी एकबारगी छूट दी है। इस कदम से उन कंपनियों को राहत मिलने की उम्मीद है जिन्होंने अनिश्चित बाजार स्थितियों के कारण अपनी सार्वजनिक निर्गम पेश करने की योजनाओं को टाल दिया है या फिर पुनर्निर्धारित किया है भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने अलग-अलग परिपत्रों में कहा कि एक अप्रैल, 2026 और 30 सितंबर, 2026 के बीच समाप्त हो रही बाजार नियामक की टिप्पणियां यानी मंजूरी पत्र अब 30 सितंबर, 2026 तक वैध रहेंगे। मौजूदा नियमों के तहत, कंपनियों को सेबी की टिप्पणियां प्राप्त होने की तारीख से 12 महीने या 18 महीने (जो भी लागू हो) के भीतर अपने सार्वजनिक निर्गम पेश करने होते हैं।  नियामक ने कोविड महामारी के दौरान भी इसी प्रकार की छूट दी थी। नियामक ने कहा कि उसे उद्योग संगठनों से प्रतिवेदन मिले हैं। उनमें पश्चिम एशिया में तनाव और निवेशकों की कम भागीदारी सहित मौजूदा अनिश्चितता के कारण निर्गम जारी करने वालों द्वारा संसाधन जुटाने और पूंजी बाजारों तक पहुंच बनाने में आ रही कठिनाइयों का उल्लेख किया गया है। साथ ही 25 प्रतिशत न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता को पूरा करने में आ रही दिक्कतों की भी बात कही गयी है। सेबी ने कहा, ‘‘उद्योग संगठनों के प्रतिवेदन, वैश्विक स्तर पर मौजूदा तनावों के कारण अनिश्चित बाजार स्थितियों और निवेशकों की कम भागीदारी को ध्यान में रखते हुए एक अप्रैल, 2026 से 30 सितंबर, 2026 के बीच समाप्त होने वाले सेबी के मंजूरी पत्रों की वैधता को 30 सितंबर, 2026 तक बढ़ाने के लिए एकबारगी छूट देने का निर्णय लिया गया है।’’ सेबी के अनुसार, ‘‘इसके अलावा, एक अप्रैल, 2026 से अब तक की अवधि के दौरान न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता आवश्यकताओं का अनुपालन न करने के लिए शेयर बाजारों या डिपॉजिटरी द्वारा ऐसी सूचीबद्ध संस्थाओं के खिलाफ शुरू की गई कोई भी दंडात्मक कार्रवाई वापस ली जा सकती है।’’ मौजूदा रूपरेखा न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता मानदंडों को पूरा करने में विफल रहने वाली कंपनियों के खिलाफ जुर्माना, प्रवर्तक शेयरधारिता को जब्त करना और अन्य कार्रवाइयों जैसे उपायों का प्रावधान करता है।

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सेबी ने आईपीओ एप्रूवल की वैलिडिटी 30 सितंबर तक बढ़ायी

 पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच बाजार नियामक सेबी ने मंगलवार को आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के लिए दी गयी मंजूरी की वैधता 30 सितंबर तक बढ़ा दी। साथ ही न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता नियमों का अनुपालन नहीं करने वाली इकाइयों को भी एकबारगी छूट दी है। इस कदम से उन कंपनियों को राहत मिलने की उम्मीद है जिन्होंने अनिश्चित बाजार स्थितियों के कारण अपनी सार्वजनिक निर्गम पेश करने की योजनाओं को टाल दिया है या फिर पुनर्निर्धारित किया है भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने अलग-अलग परिपत्रों में कहा कि एक अप्रैल, 2026 और 30 सितंबर, 2026 के बीच समाप्त हो रही बाजार नियामक की टिप्पणियां यानी मंजूरी पत्र अब 30 सितंबर, 2026 तक वैध रहेंगे। मौजूदा नियमों के तहत, कंपनियों को सेबी की टिप्पणियां प्राप्त होने की तारीख से 12 महीने या 18 महीने (जो भी लागू हो) के भीतर अपने सार्वजनिक निर्गम पेश करने होते हैं।  नियामक ने कोविड महामारी के दौरान भी इसी प्रकार की छूट दी थी। नियामक ने कहा कि उसे उद्योग संगठनों से प्रतिवेदन मिले हैं। उनमें पश्चिम एशिया में तनाव और निवेशकों की कम भागीदारी सहित मौजूदा अनिश्चितता के कारण निर्गम जारी करने वालों द्वारा संसाधन जुटाने और पूंजी बाजारों तक पहुंच बनाने में आ रही कठिनाइयों का उल्लेख किया गया है। साथ ही 25 प्रतिशत न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता को पूरा करने में आ रही दिक्कतों की भी बात कही गयी है। सेबी ने कहा, ‘‘उद्योग संगठनों के प्रतिवेदन, वैश्विक स्तर पर मौजूदा तनावों के कारण अनिश्चित बाजार स्थितियों और निवेशकों की कम भागीदारी को ध्यान में रखते हुए एक अप्रैल, 2026 से 30 सितंबर, 2026 के बीच समाप्त होने वाले सेबी के मंजूरी पत्रों की वैधता को 30 सितंबर, 2026 तक बढ़ाने के लिए एकबारगी छूट देने का निर्णय लिया गया है।’’ सेबी के अनुसार, ‘‘इसके अलावा, एक अप्रैल, 2026 से अब तक की अवधि के दौरान न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता आवश्यकताओं का अनुपालन न करने के लिए शेयर बाजारों या डिपॉजिटरी द्वारा ऐसी सूचीबद्ध संस्थाओं के खिलाफ शुरू की गई कोई भी दंडात्मक कार्रवाई वापस ली जा सकती है।’’ मौजूदा रूपरेखा न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता मानदंडों को पूरा करने में विफल रहने वाली कंपनियों के खिलाफ जुर्माना, प्रवर्तक शेयरधारिता को जब्त करना और अन्य कार्रवाइयों जैसे उपायों का प्रावधान करता है।


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