आप स्वयं ही अपने मित्र हैं, शत्रु हैं कोई दूसरा मित्र या शत्रु नहीं है। अगर मैं किसी को गाली दूं तो गाली शांति से नहीं दे सकता हूं। चिंता, बैचेनी, जलन ही गाली बनती है। दूसरों को चोट का मतलब पहले अपने को चोट पहुंचाता हूं। शांत और आनंदित रहेंगे तो गाली नहीं दे सकते। गाली देने से पूर्व मन ही मन पागलपन पैदा करना पड़ता है। योजना बनानी पड़ती है। बम तभी फूटता है, जब भीतर बारूद भरा हो। जब व्यक्ति क्रोध करता है तो स्वयं को पीड़ा देता है। आप गाली देकर स्वयं को पीडि़त करते हैं। हम 24 घंटे शत्रुता करते रहते हैं। जो कर रहे हैं, करने योग्य नहीं, फिर भी वही करते हैं। अर्थात यह अतिसार रोग है। हम भी अनायास ही जहर लेते रहते हैं। कभी एक माह क्रोध न करके देखें। भीतर की गं्रथियों से जहर लेते हैं। काम वासना से भरे पड़े हैं। भोग से कभी आनंद पाया नहीं जाता है। हम अपने साथ शत्रुता करते हैं। जिंदगी में दुख ही दुख पाया। जो भी कर रहे हैं वो सच में शत्रुता है लेकिन स्वयं को बचा लेते हैं। दूसरों की वजह से दुख है। मौलिक कारण मैं स्वयं हूं। कोई और नहीं। भोग में अपने को सताते हैं और ऊब जाते हैं। त्याग में अपने को सताते हैं, सताना जारी रखा है। पहले दूसरों पर क्रोध करते हैं, बाद में क्रोध अपने पर करते हैं। मन ही मन आत्मग्लानि से भर जाते हैं किंतु अपने को सताना जारी रखते हैं। संसारी दुखी हैं। आनंद की कोई खबर ही नहीं है। त्यागी भी दुखी है। संसारी की तरकीब है कि दूसरों के कारण, दूसरों जन्मों पर टालते रहते हैं। लालच भरा जीवन सांप-सीढ़ी के खेल की तरह होता है।