एक 16 वर्षीय लडक़ी के माता-पिता ने उसे मोबाइल की लत से बचाने के लिए घर में 24/7 निगरानी हेतु बाउंसर तैनात कर दिए। बताया गया कि किशोरी अपने फोन की इतनी आदी हो गई थी कि उसका व्यवहार अनियंत्रित और हिंसक होने लगा था। मनोचिकित्सक डॉ. इशा वैष्णव ने कहा कि लडक़ी सोशल मीडिया पर अजनबियों से लगातार बातचीत करती थी और अक्सर अजनबी लोगों के साथ ऑनलाइन संपर्क में रहती थी। जब परिवार ने उसका फोन छीनने की कोशिश की, तो उसने टीवी सेट और माइक्रोवेव जैसे घरेलू सामान तोड़ दिए और अपनी मां पर भी हमला कर दिया। माता-पिता स्थिति से बेहद चिंतित हो गए और उन्होंने निजी सुरक्षा कर्मियों को तैनात किया ताकि लडक़ी को नियंत्रित किया जा सके। यह मामला अब अकेला नहीं है। शहर में ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जहां परिवार अपने बच्चों की स्क्रीन लत को नियंत्रित करने के लिए बाउंसर या निजी गार्ड रख रहे हैं। सुरक्षा कर्मी बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और उन्हें फोन या अन्य गैजेट्स से दूर रखने की कोशिश करते हैं। सूरत में एक अन्य मामले में, एक परिवार ने अपने 17 वर्षीय बेटे को पुनर्वास केंद्र भेजा, जब वह स्क्रीन की लत के कारण हिंसक हो गया। डॉक्टरों का कहना है कि इस तरह की लत अब एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन उपयोग बच्चों में व्यवहारिक समस्याएं, गुस्सा, सामाजिक अलगाव और जोखिम भरे व्यवहार को बढ़ा सकता है। कुछ मामलों में बच्चे पूरी तरह से डिजिटल दुनिया में खो जाते हैं और वास्तविक जीवन से कट जाते हैं। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यह नई लत ड्रग्स और एल्कोहल जैसी पारंपरिक लतों की तरह ही खतरनाक हो सकती है। हम ऐसे मामलों को देख रहे हैं जहां बच्चों को एक से तीन महीने तक अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है।अहमदाबाद में ‘अभयम’ हेल्पलाइन से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, हाल के महीनों में बच्चों की स्क्रीन लत और उससे जुड़े हिंसक व्यवहार के मामलों में तेज वृद्धि देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए केवल कड़े कदम ही नहीं, बल्कि परिवारों को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाने, समय प्रबंधन सिखाने और डिजिटल उपयोग पर संतुलन बनाने की भी जरूरत है।