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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

01-04-2026

बीमार न बना दे भोजन

  •  यूं तो भोजन व आहार पर पूर्व में एक बार चर्चा हो चुकी है, पर यहां फिर से कुछ कहना प्रासंगिक हो गया है। विश्व में देखें तो मनुष्य ही ऐसा है, जिसका आहार अनिश्चित होता है। पशुओं-जानवरों को देखें तो उनका आहार निश्चित होता है। उनकी बुनियादी शारीरिक जरूरतें और उनका स्वभाव फैसला करता है कि वे क्या खाते हैं और क्या नहीं। यह भी तय होता है कि वे कब खाते हैं और कब नहीं। इसके विपरीत मनुष्य की स्थिति देखें तो उसका व्यवहार आहार को लेकर अप्रत्याशित रहता है, बल्कि वह एक तरह से अनिश्चितता में जीता है। ऐसा इसलिए कि उसे यह बताने वाला कोई नहीं कि उसे कब खाना चाहिये, न उसकी जागरूकता बताती है कि कितना खाना चाहिये और न ही उसकी समझ फैसला ले पाती है कि कब नहीं खाना है। जब इनमें से कुछ भी निश्चित नहीं है, तो इसका असर मनुष्य के जीवन पर भी आता है और वह भी अनिश्चितता की ओर अग्रसर हो जाता है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य थोड़ी सी समझदारी दिखाये, बुद्धि व सोच को काम में ले, थोड़ी विचारशीलता के साथ आंख खोलकर देखे तो सही आहार का निर्णय करना कठिन तो नहीं है। सही आहार को समझने के लिए दो बातों की जरूरत ही होती है, पहली यह कि क्या खाये और दूसरी यह कि क्या न खाये।  दरअसल मनुष्य का शरीर रसायनिक तत्वों से बना है, शरीर की पूरी प्रक्रिया रसायनिक है। जैसे कोई व्यक्ति मदिरा पान करता है, मदिरा एक रसायन है और उस रसायन के प्रभाव में उस व्यक्ति का शरीर आ जायेगा, जिससे पहले तो वह नशे में आयेगा और मदिरा पान अधिक हो गया है तो वह बेहोश भी हो जायेगा। कितना भी स्वस्थ मनुष्य क्यों नहीं हो, नशे का रसायन उसके शरीर को प्रभावित करता ही है। मनुष्य कितना ही पुण्यात्मा हो, लेकिन शरीर में अगर विष ने प्रवेश कर लिया है तो असर दिखायेगा ही। जो भोजन मनुष्य को किसी तरह की बेहोशी, उत्तेजना या किसी तरह की अशांति की ओर ले जाये वह हानिकारक है और सबसे गहरी परम हानि तब होती है जब ये चीजें नाभि को प्रभावित करने लगें। बहुत बार हम प्राकृतिक चिकित्सा करवाते हैं, शरीर को स्वस्थ करने के लिए गीली मिट्टी, गीली पट्टी या टब में स्नान आदि के प्रयोग किये जाते हैं। गीली मिट्टी-पट्टी और टब में स्नान करने के अन्य क्या फायदे हैं, यह तो प्राकृतिक चिकित्सक बेहतर बता सकते हैं, लेकिन मेरा यह मानना है कि जब नाभि केंद्र को नमी मिलती है, तो वह निष्क्रिय उर्जा के असर को समाप्त करती है और सक्रिय उर्जा का सृजन करती है, बस इससे मनुष्य स्वस्थ होने लगता है।

    इसी तरह हम अपने आहार में हल्के भोजन का उपयोग करें, तो सक्रिय उर्जा का सृजन होने लगता है जो नाभि केंद्र को सहज रखता है और हम उत्तम स्वास्थ्य की ओर अग्रसर होते हैं। अगर नाभि के साथ अन्याय किया जाता है या उसे दबाव में रखा जाता है तो नाभि केंद्र निष्क्रिय हो जाता है और इससे तन की उर्जा घटने लगती है। धीरे-धीरे नाभि केंद्र सुस्त पडऩे लगता है, आखिर में यह लगभग सो जाता है। हमारे शरीर में वैसे भी दो केंद्र महत्वपूर्ण होते हैं, पहला मस्तिष्क तथा दूसरा नाभि। मस्तिष्क में विचारों का प्रवाह चलता रहता है और उसका सीधा कनेक्ट नाभि से भी होता है। हम जितना हल्का भोजन ग्रहण करेंगे उतना ही शरीर में भारीपन कम आयेगा और तन हल्का रहने से मन प्रफुल्लित व उर्जावान बना रहेगा। सही आहार के लिए यही कहा जा सकता है कि वह ऐसा न हो जो तन में भारीपन पैदा करे, उत्तेजना न लाये और न नशीला हो। सही आहार लेंगे तो तंद्रा महसूस नहीं होगी। दरअसल कुछ लोग इसलिए बीमार पड़ते हैं कि उन्हें भरपेट या समुचित आहार नहीं मिलता और कुछ इसलिए कि वे शौक-शौक में ज्यादा खा लेते हैं। अब तो जीमणवार का दौर भी सिमट गया है और खिलाने के लिए मनुहार उतनी नहीं होती, जितनी पहले हुआ करती थी, इस कारण विकल्प हमारे हाथ में है कि हमें क्या खाना चाहिये। बालपन-किशोरावस्था के उपरांत करीब बीस वर्ष की आयु से युवा-अवस्था प्रारंभ होती है, जो सामान्यत: 45 साल की उम्र तक रहती है। इसके बाद प्रारंभिक प्रौढावस्था आरंभ होती है, जो सामान्यत: 70 वर्ष की आयु तक रहती है। इसके बाद आधुनिक परिवेश में प्रारंभिक वृद्धावस्था का दौर प्रारंभ होता है जो जीवन पर्यंत गहराता जाता है। 20-45 साल की उम्र चूंकि युवा वस्था होती है,  शरीर का पाचन तंत्र भी ठीक रहता है, अत: इस उम्र में भोजन वही करें जो आसानी से पच सके। प्रौढावस्था प्रारंभ होते ही भारी भोजन करना कम कर दें और इसे धीरे-धीरे घटाते जायें, हल्के भोजन को जीवन-चर्या का हिस्सा बना लें। प्रारंभिक वृद्धावस्था के प्रारंभ होते ही पूरी तरह हल्के आहार पर आ जायें तथा फलों पर अधिक फोकस करें तो बेहतर रहेगा। इस तरह भोजन के प्रति हम अपने नजरिये को बेहतर करें तो स्वस्थ रहेंगे और अस्पतालों के तनाव व खर्च से मुक्ति पा सकेंगे। 

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बीमार न बना दे भोजन

 यूं तो भोजन व आहार पर पूर्व में एक बार चर्चा हो चुकी है, पर यहां फिर से कुछ कहना प्रासंगिक हो गया है। विश्व में देखें तो मनुष्य ही ऐसा है, जिसका आहार अनिश्चित होता है। पशुओं-जानवरों को देखें तो उनका आहार निश्चित होता है। उनकी बुनियादी शारीरिक जरूरतें और उनका स्वभाव फैसला करता है कि वे क्या खाते हैं और क्या नहीं। यह भी तय होता है कि वे कब खाते हैं और कब नहीं। इसके विपरीत मनुष्य की स्थिति देखें तो उसका व्यवहार आहार को लेकर अप्रत्याशित रहता है, बल्कि वह एक तरह से अनिश्चितता में जीता है। ऐसा इसलिए कि उसे यह बताने वाला कोई नहीं कि उसे कब खाना चाहिये, न उसकी जागरूकता बताती है कि कितना खाना चाहिये और न ही उसकी समझ फैसला ले पाती है कि कब नहीं खाना है। जब इनमें से कुछ भी निश्चित नहीं है, तो इसका असर मनुष्य के जीवन पर भी आता है और वह भी अनिश्चितता की ओर अग्रसर हो जाता है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य थोड़ी सी समझदारी दिखाये, बुद्धि व सोच को काम में ले, थोड़ी विचारशीलता के साथ आंख खोलकर देखे तो सही आहार का निर्णय करना कठिन तो नहीं है। सही आहार को समझने के लिए दो बातों की जरूरत ही होती है, पहली यह कि क्या खाये और दूसरी यह कि क्या न खाये।  दरअसल मनुष्य का शरीर रसायनिक तत्वों से बना है, शरीर की पूरी प्रक्रिया रसायनिक है। जैसे कोई व्यक्ति मदिरा पान करता है, मदिरा एक रसायन है और उस रसायन के प्रभाव में उस व्यक्ति का शरीर आ जायेगा, जिससे पहले तो वह नशे में आयेगा और मदिरा पान अधिक हो गया है तो वह बेहोश भी हो जायेगा। कितना भी स्वस्थ मनुष्य क्यों नहीं हो, नशे का रसायन उसके शरीर को प्रभावित करता ही है। मनुष्य कितना ही पुण्यात्मा हो, लेकिन शरीर में अगर विष ने प्रवेश कर लिया है तो असर दिखायेगा ही। जो भोजन मनुष्य को किसी तरह की बेहोशी, उत्तेजना या किसी तरह की अशांति की ओर ले जाये वह हानिकारक है और सबसे गहरी परम हानि तब होती है जब ये चीजें नाभि को प्रभावित करने लगें। बहुत बार हम प्राकृतिक चिकित्सा करवाते हैं, शरीर को स्वस्थ करने के लिए गीली मिट्टी, गीली पट्टी या टब में स्नान आदि के प्रयोग किये जाते हैं। गीली मिट्टी-पट्टी और टब में स्नान करने के अन्य क्या फायदे हैं, यह तो प्राकृतिक चिकित्सक बेहतर बता सकते हैं, लेकिन मेरा यह मानना है कि जब नाभि केंद्र को नमी मिलती है, तो वह निष्क्रिय उर्जा के असर को समाप्त करती है और सक्रिय उर्जा का सृजन करती है, बस इससे मनुष्य स्वस्थ होने लगता है।

इसी तरह हम अपने आहार में हल्के भोजन का उपयोग करें, तो सक्रिय उर्जा का सृजन होने लगता है जो नाभि केंद्र को सहज रखता है और हम उत्तम स्वास्थ्य की ओर अग्रसर होते हैं। अगर नाभि के साथ अन्याय किया जाता है या उसे दबाव में रखा जाता है तो नाभि केंद्र निष्क्रिय हो जाता है और इससे तन की उर्जा घटने लगती है। धीरे-धीरे नाभि केंद्र सुस्त पडऩे लगता है, आखिर में यह लगभग सो जाता है। हमारे शरीर में वैसे भी दो केंद्र महत्वपूर्ण होते हैं, पहला मस्तिष्क तथा दूसरा नाभि। मस्तिष्क में विचारों का प्रवाह चलता रहता है और उसका सीधा कनेक्ट नाभि से भी होता है। हम जितना हल्का भोजन ग्रहण करेंगे उतना ही शरीर में भारीपन कम आयेगा और तन हल्का रहने से मन प्रफुल्लित व उर्जावान बना रहेगा। सही आहार के लिए यही कहा जा सकता है कि वह ऐसा न हो जो तन में भारीपन पैदा करे, उत्तेजना न लाये और न नशीला हो। सही आहार लेंगे तो तंद्रा महसूस नहीं होगी। दरअसल कुछ लोग इसलिए बीमार पड़ते हैं कि उन्हें भरपेट या समुचित आहार नहीं मिलता और कुछ इसलिए कि वे शौक-शौक में ज्यादा खा लेते हैं। अब तो जीमणवार का दौर भी सिमट गया है और खिलाने के लिए मनुहार उतनी नहीं होती, जितनी पहले हुआ करती थी, इस कारण विकल्प हमारे हाथ में है कि हमें क्या खाना चाहिये। बालपन-किशोरावस्था के उपरांत करीब बीस वर्ष की आयु से युवा-अवस्था प्रारंभ होती है, जो सामान्यत: 45 साल की उम्र तक रहती है। इसके बाद प्रारंभिक प्रौढावस्था आरंभ होती है, जो सामान्यत: 70 वर्ष की आयु तक रहती है। इसके बाद आधुनिक परिवेश में प्रारंभिक वृद्धावस्था का दौर प्रारंभ होता है जो जीवन पर्यंत गहराता जाता है। 20-45 साल की उम्र चूंकि युवा वस्था होती है,  शरीर का पाचन तंत्र भी ठीक रहता है, अत: इस उम्र में भोजन वही करें जो आसानी से पच सके। प्रौढावस्था प्रारंभ होते ही भारी भोजन करना कम कर दें और इसे धीरे-धीरे घटाते जायें, हल्के भोजन को जीवन-चर्या का हिस्सा बना लें। प्रारंभिक वृद्धावस्था के प्रारंभ होते ही पूरी तरह हल्के आहार पर आ जायें तथा फलों पर अधिक फोकस करें तो बेहतर रहेगा। इस तरह भोजन के प्रति हम अपने नजरिये को बेहतर करें तो स्वस्थ रहेंगे और अस्पतालों के तनाव व खर्च से मुक्ति पा सकेंगे। 


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