संसद के हाल ही में संपन्न शीतकालीन सत्र में पारित एक कानून के बाद, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 में बड़ा बदलाव किया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के साथ अब वसीयत के तहत अधिकार लागू करने के लिए प्रोबेट लेना अनिवार्य नहीं रहा। यह नियम अब सभी धर्म, संपत्ति की सभी लोकेशन और वसीयत के निष्पादन के सभी स्थानों पर समान रूप से लागू होगा। यह बदलाव भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 213 को हटाकर किया गया है। यह धारा कुछ विशेष परिस्थितियों में हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन और पारसी समुदायों के लिए प्रोबेट या लेटर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन अनिवार्य था खासकर तब जब वसीयत कोलकाता, मद्रास और बॉम्बे उच्च न्यायालयों के मूल नागरिक अधिकार क्षेत्र में बनाई गई हो या वहां स्थित अचल संपत्ति को लेकर हो। मुस्लिम और भारतीय ईसाई इस प्रावधान से बाहर थे। संशोधित कानून भविष्य में लागू होगा, यानी पहले से निपट चुके मामलों पर इसका असर नहीं पड़ेगा। इस कानून के जरिए न केवल भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन किया गया है, बल्कि अन्य कानूनों में बदलाव और 71 पुराने कानूनों को भी निरस्त किया गया है। अब जिन मामलों में कोई विवाद नहीं है, वहां उत्तराधिकारी बिना अदालत गए सीधे वसीयत के आधार पर संपत्ति का ट्रांसफर कर सकेंगे। इससे कोर्ट फीस और कानूनी खर्च बचेगा और अदालतें केवल विवादित मामलों पर ध्यान दे पाएंगी। अब उत्तराधिकारी और लाभार्थी वसीयत के आधार पर बैंक खातों से संबंधित काम, संपत्ति की बिक्री या नामांतरण जैसे काम कर सकेंगे।