भारत में सोना हमेशा सिर्फ़ एक धातु नहीं रहा, बल्कि सुरक्षा, परंपरा और भरोसे का प्रतीक माना गया है। लेकिन अब यह भरोसा नई शक्ल में दिखाई दे रहा है। लोग तिजोरी में सोना रखने से आगे बढक़र डिजिटल और मार्केट-आधारित गोल्ड निवेश की तरफ़ तेजी से बढ़ रहे हैं। इसका सबसे बड़ा संकेत है Gold ETFs में आई रिकॉर्ड तेजी। पिछले एक साल में भारतीय Gold ETFs की होल्डिंग्स करीब 79 प्रतिशत बढ़ गई हैं, जिसने बाजार और निवेशकों दोनों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। World Gold Council के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल 2025 में भारत के Gold ETFs का कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) 7.2 बिलियन डॉलर था, जो मई 2026 तक बढक़र 18.4 बिलियन डॉलर पहुंच गया। यानी सिर्फ़ एक साल में निवेश लगभग ढाई गुना हो गया। इसी दौरान Gold ETF holdings 65.3 टन से बढक़र 116.7 टन तक पहुंच गईं। यह सिर्फ़ आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय निवेशकों की बदलती सोच का बड़ा संकेत है। दरअसल, पिछले दो वर्षों में सोने की कीमतों ने जबरदस्त रैली दिखाई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना लगभग 2,100 डॉलर प्रति औंस से ऊपर निकल गया। अमेरिका-चीन तनाव, वैश्विक ट्रेड वॉर, ऊंची महंगाई, डॉलर की अस्थिरता और भू-राजनीतिक संकटों ने निवेशकों को सुरक्षित विकल्प तलाशने पर मजबूर किया। ऐसे माहौल में सोना फिर से ‘सेफ हेवन’ बनकर उभरा। भारत में इसका असर दो स्तरों पर दिखा। पहला, आम निवेशक फिजिकल गोल्ड खरीदने की बजाय श्वञ्जस्नह्य में पैसा लगाने लगे। दूसरा, बड़े निवेशकों और संस्थागत फंड्स ने भी गोल्ड को पोर्टफोलियो सुरक्षा के तौर पर अपनाना शुरू कर दिया। Gold ETFs की सबसे बड़ी ताकत यही है कि इसमें निवेशक बिना लॉकर, मेकिंग चार्ज और चोरी के जोखिम के सोने में निवेश कर सकते हैं। मोबाइल ऐप पर कुछ क्लिक में गोल्ड खरीदना आज की डिजिटल पीढ़ी को ज्यादा आसान और स्मार्ट विकल्प लग रहा है। दिलचस्प बात यह है कि जहां ज्वेलरी की मांग में सुस्ती देखी जा रही है, वहीं निवेश के रूप में गोल्ड की मांग लगातार बढ़ रही है। World Gold Council के मुताबिक 2024 में भारत की ज्वेलरी डिमांड 563 टन से घटकर 2025 में करीब 440 टन रह गई।
यानी लोग शादी-ब्याह के लिए कम, लेकिन निवेश और सुरक्षा के लिए ज्यादा सोना खरीद रहे हैं। इस बदलाव के पीछे एक बड़ा कारण भारत की आर्थिक चिंता भी है। भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड आयातकों में शामिल है। सरकार लंबे समय से गोल्ड इम्पोर्ट बिल कम करने की कोशिश कर रही है क्योंकि इससे चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ता है। ऐसे में Gold ETFs को फिजिकल गोल्ड के मुकाबले बेहतर विकल्प माना जा रहा है, क्योंकि इससे बाजार में डिजिटल निवेश बढ़ता है और सोने की खपत का पैटर्न बदलता है। ETF inflows की बात करें तो भारत के बड़े फंड्स में निवेश लगातार बढ़ रहा है। Nippon India Gold BeES, जो देश का सबसे बड़ा Gold ETF है, उसके पास लगभग 36.5 टन सोना है और 2026 में अब तक उसमें 1.1 बिलियन डॉलर का निवेश आ चुका है। वहीं ICICI Prudential Gold ETF और BI Gold ETF में भी सैकड़ों मिलियन डॉलर की नई पूंजी आई है। यह साफ दिखाता है कि निवेशकों का भरोसा सिर्फ़ सोने पर नहीं, बल्कि Gold ETF मॉडल पर भी मजबूत हुआ है। हालांकि सवाल यह भी है कि क्या यह तेजी लंबे समय तक जारी रहेगी? बाजार विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक वैश्विक अनिश्चितता बनी रहेगी, सोने की मांग मजबूत रह सकती है। अगर अमेरिका में ब्याज दरें धीरे-धीेरे कम होती हैं और डॉलर कमजोर पड़ता है, तो सोने की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। लेकिन अगर वैश्विक तनाव कम हुआ और इक्विटी बाजारों में तेजी लौटी, तो Gold ETFs में निवेश की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ सकती है। फिलहाल तस्वीर साफ है—भारतीय निवेशक अब सिर्फ़ ‘सोना खरीद’ नहीं रहे, बल्कि ‘स्मार्ट गोल्ड इन्वेस्टमेंट’ की तरफ़ बढ़ रहे हैं। और यही वजह है कि Gold ETFs अब सिर्फ़ एक निवेश प्रोडक्ट नहीं, बल्कि भारत के बदलते फाइनेंशियल बिहेवियर का नया प्रतीक बन चुके हैं।
