TOP

ई - पेपर Subscribe Now!

ePaper
Subscribe Now!

Download
Android Mobile App

Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

19-05-2026

Energy Independence=Global Dominance? चीन इसी फॉर्मूले पर खेल रहा है...

  •  दुनिया इस समय सिर्फ हथियारों, AI और ट्रेड वॉर की लड़ाई नहीं लड़ रही, बल्कि असली गेम अब ‘एनर्जी कंट्रोल’ का बन चुका है। तेल, गैस और सप्लाई चेन के हर झटके ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दशक में वही देश सबसे ताकतवर होगा, जो अपनी एनर्जी जरूरतों को बाहरी दुनिया पर कम से कम निर्भर रखते हुए पूरा कर सके। इसी ग्लोबल उथल-पुथल के बीच चीन ने ऐसा कदम उठाया है, जिसने पूरी दुनिया के रणनीतिकारों और निवेशकों का ध्यान खींच लिया है। अगर आपको लगता है कि चीन सिर्फ EV, AI और चिप्स की रेस जीतना चाहता है, तो तस्वीर अभी अधूरी है। असली कहानी न्यूक्लियर एनर्जी में लिखी जा रही है। डेटा बताता है कि इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा अंडर-कंस्ट्रक्शन न्यूक्लियर रिएक्टर चीन में हैं। चीन अकेले 39 न्यूक्लियर रिएक्टर बना रहा है, जबकि भारत और रूस 6-6 रिएक्टरों पर काम कर रहे हैं। इसके बाद मिस्र और तुर्किये 4-4, दक्षिण कोरिया 3, जबकि बांग्लादेश, जापान, यूक्रेन और यूनाइटेड किंगडम 2-2 रिएक्टर बना रहे हैं। अर्जेंटीना, ब्राजील, ईरान, पाकिस्तान, स्लोवाकिया और हंगरी केवल 1-1 रिएक्टर पर काम कर रहे हैं। यह सिर्फ एक सरकारी प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि आने वाले 20 वर्षों के ‘ग्लोबल पावर मैप’ का ब्लूप्रिंट है। मार्केट के नजरिए से देखें तो यह सिर्फ न्यूक्लियर सेक्टर की स्टोरी नहीं, बल्कि अगले दशक की मेगा इन्वेस्टमेंट थीम बन सकती है। इसके पीछे पूरा एक इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम तैयार हो रहा है। यूरेनियम सप्लाई, न्यूक्लियर इंजीनियरिंग, ग्रिड टेक्नोलॉजी, हाई-एंड मशीनरी, रोबोटिक्स और एडवांस्ड मटेरियल्स जैसी इंडस्ट्रीज आने वाले दशक की बड़ी थीम बन सकती हैं। दुनिया भर के फंड मैनेजर अब ऊर्जा सुरक्षा को केवल सरकारी मुद्दा नहीं, बल्कि लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट थीम के रूप में देखने लगे हैं। चीन का यह आक्रामक न्यूक्लियर मिशन दुनिया को साफ संदेश दे रहा है- आने वाला दशक सिर्फ AI वॉर का नहीं, बल्कि ‘पावर सप्लाई वॉर’ का होगा। जिस देश के पास सस्ती, स्थिर और घरेलू ऊर्जा होगी, वही ग्लोबल प्रोडक्शन और टेक्नोलॉजी चेन पर नियंत्रण बनाए रख सकेगा। इंडिया के लिए भी यह संकेत बेहद महत्वपूर्ण है। भारत अभी 6 रिएक्टरों पर काम कर रहा है, लेकिन यदि उसे 5 ट्रिलियन डॉलर से आगे की अर्थव्यवस्था बनना है, AI और मेन्यूफेक्चरिंग हब बनना है, तो एनर्जी कैपेसिटी में बड़ा विस्तार करना होगा। सिर्फ रिन्यूएबल एनर्जी पर्याप्त नहीं होगी। बेसलोड पावर के लिए न्यूक्लियर, हाइड्रो और ग्रिड मॉडर्नाइजेशन पर समानांतर निवेश जरूरी होगा। अंत में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि चीन कितने रिएक्टर बना रहा है। असली सवाल यह है कि क्या चीन भविष्य की दुनिया के लिए खुद को एनर्जी के स्तर पर पूरी तरह तैयार कर चुका है? अगर जवाब ‘हां’ है, तो आने वाले वर्षों में ग्लोबल इकोनॉमिक पॉवर बैलेंस और भी तेजी से एशिया की ओर झुक सकता है। और शायद इसी वजह से दुनिया अब चीन को सिर्फ मेन्यूफेक्चरिंग जाइंट नहीं, बल्कि ‘फ्यूचर एनर्जी किंग’ के रूप में देखना शुरू कर चुकी है।

Share
Energy Independence=Global Dominance? चीन इसी फॉर्मूले पर खेल रहा है...

 दुनिया इस समय सिर्फ हथियारों, AI और ट्रेड वॉर की लड़ाई नहीं लड़ रही, बल्कि असली गेम अब ‘एनर्जी कंट्रोल’ का बन चुका है। तेल, गैस और सप्लाई चेन के हर झटके ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दशक में वही देश सबसे ताकतवर होगा, जो अपनी एनर्जी जरूरतों को बाहरी दुनिया पर कम से कम निर्भर रखते हुए पूरा कर सके। इसी ग्लोबल उथल-पुथल के बीच चीन ने ऐसा कदम उठाया है, जिसने पूरी दुनिया के रणनीतिकारों और निवेशकों का ध्यान खींच लिया है। अगर आपको लगता है कि चीन सिर्फ EV, AI और चिप्स की रेस जीतना चाहता है, तो तस्वीर अभी अधूरी है। असली कहानी न्यूक्लियर एनर्जी में लिखी जा रही है। डेटा बताता है कि इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा अंडर-कंस्ट्रक्शन न्यूक्लियर रिएक्टर चीन में हैं। चीन अकेले 39 न्यूक्लियर रिएक्टर बना रहा है, जबकि भारत और रूस 6-6 रिएक्टरों पर काम कर रहे हैं। इसके बाद मिस्र और तुर्किये 4-4, दक्षिण कोरिया 3, जबकि बांग्लादेश, जापान, यूक्रेन और यूनाइटेड किंगडम 2-2 रिएक्टर बना रहे हैं। अर्जेंटीना, ब्राजील, ईरान, पाकिस्तान, स्लोवाकिया और हंगरी केवल 1-1 रिएक्टर पर काम कर रहे हैं। यह सिर्फ एक सरकारी प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि आने वाले 20 वर्षों के ‘ग्लोबल पावर मैप’ का ब्लूप्रिंट है। मार्केट के नजरिए से देखें तो यह सिर्फ न्यूक्लियर सेक्टर की स्टोरी नहीं, बल्कि अगले दशक की मेगा इन्वेस्टमेंट थीम बन सकती है। इसके पीछे पूरा एक इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम तैयार हो रहा है। यूरेनियम सप्लाई, न्यूक्लियर इंजीनियरिंग, ग्रिड टेक्नोलॉजी, हाई-एंड मशीनरी, रोबोटिक्स और एडवांस्ड मटेरियल्स जैसी इंडस्ट्रीज आने वाले दशक की बड़ी थीम बन सकती हैं। दुनिया भर के फंड मैनेजर अब ऊर्जा सुरक्षा को केवल सरकारी मुद्दा नहीं, बल्कि लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट थीम के रूप में देखने लगे हैं। चीन का यह आक्रामक न्यूक्लियर मिशन दुनिया को साफ संदेश दे रहा है- आने वाला दशक सिर्फ AI वॉर का नहीं, बल्कि ‘पावर सप्लाई वॉर’ का होगा। जिस देश के पास सस्ती, स्थिर और घरेलू ऊर्जा होगी, वही ग्लोबल प्रोडक्शन और टेक्नोलॉजी चेन पर नियंत्रण बनाए रख सकेगा। इंडिया के लिए भी यह संकेत बेहद महत्वपूर्ण है। भारत अभी 6 रिएक्टरों पर काम कर रहा है, लेकिन यदि उसे 5 ट्रिलियन डॉलर से आगे की अर्थव्यवस्था बनना है, AI और मेन्यूफेक्चरिंग हब बनना है, तो एनर्जी कैपेसिटी में बड़ा विस्तार करना होगा। सिर्फ रिन्यूएबल एनर्जी पर्याप्त नहीं होगी। बेसलोड पावर के लिए न्यूक्लियर, हाइड्रो और ग्रिड मॉडर्नाइजेशन पर समानांतर निवेश जरूरी होगा। अंत में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि चीन कितने रिएक्टर बना रहा है। असली सवाल यह है कि क्या चीन भविष्य की दुनिया के लिए खुद को एनर्जी के स्तर पर पूरी तरह तैयार कर चुका है? अगर जवाब ‘हां’ है, तो आने वाले वर्षों में ग्लोबल इकोनॉमिक पॉवर बैलेंस और भी तेजी से एशिया की ओर झुक सकता है। और शायद इसी वजह से दुनिया अब चीन को सिर्फ मेन्यूफेक्चरिंग जाइंट नहीं, बल्कि ‘फ्यूचर एनर्जी किंग’ के रूप में देखना शुरू कर चुकी है।


Label

PREMIUM

CONNECT WITH US

X
Login
X

Login

X

Click here to make payment and subscribe
X

Please subscribe to view this section.

X

Please become paid subscriber to read complete news