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16-05-2026

‘विकसित भारत’ में स्पीड ब्रेकर की आहट!

  •  नोटबंदी और जीएसटी के बाद इकोनॉमी में स्लोडाउन सैटल हो ही रहा था कि कोविड बहाना बन गया। लेकिन कोविड से निपटते ही देश की इकोनॉमी ऐसी सरपट दौड़ी की दुनिया दंग रह गई। रूस-यूक्रेन वॉर का भी इंडिया ने एडवांटेज उठा लिया लेकिन वेस्ट एशिया वॉर ग्रोथ पाथ पर आगे बढ़ रही इकोनॉमी की चूल हिलाने लगा है। यह इतना बड़ा खतरा है कि इस शॉकवेव से निकलने में कई साल लग सकते हैं क्योंकि इसका इंपैक्ट अमूमन सभी इंडिकेटर, डिमांड, सप्लाई, करंट अकाउंट डेफिसिट और प्रोडक्टिविटी पर एक जैसा दिखाई देगा। खैर...एसबीआई के चेयरमैन सीएस सेट्टी ने फ्यूचर की बात करते हुए कहा है कि 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने के लिए 3,000-3,500 लाख करोड़ रुपए की भारी-भरकम फंडिंग की जरूरत होगी। केवल 2035 के विकसित भारत टार्गेट्स तक पहुंचने के लिए ही 600-650 लाख करोड़ रुपए के इंवेस्टमेंट की जरूरत होगी। सेेट्टी के अनुसार इतनी बड़ी पूंजी जरूरत को केवल बैंकों के जरिए पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए भारत को अपने बॉन्ड मार्केट को गहरा करना होगा और म्यूचुअल फंड, इंश्योरेंस तथा पेंशन फंड जैसे लॉन्ग-टर्म इंवेस्टमेंट टूल्स में भागीदारी बढ़ानी होगी। उन्होंने कहा कि डोमेस्टिक सेविंग्स का बड़ा हिस्सा अब पारंपरिक बैंक डिपॉजिट से निकलकर म्यूचुअल फंड, इंश्योरेंस और पेंशन प्रोडक्ट्स में जा रहा है। ऐसे में इन इंस्ट्ट्यिूशनल सेविंग्स को रियल इकोनॉमी और इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग की ओर मोडऩे की कोशिश अभी से तेज करने की जरूरत है। भारत का कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट डवलप्ड मार्केट्स के मुकाबले बहुत छोटा है जिससे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए लॉन्ग-टर्म फंडिंग बड़ा चैलेंज है। सेट्टी ने कहा सरकारी कैपेक्स वित्त वर्ष 15 में लगभग 2 लाख करोड़ था, जो वित्त वर्ष27 के बजट में इसे बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ कर दिया गया है। यानी दस साल में सरकारी कैपेक्स में 600 परसेंट की बढ़ोतरी हुई है। बेहतर रोड और रेल कनेक्विटी, पोर्ट और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में इन सालों में हुए इंवेस्टमेंट के कारण इंडिया इंक की प्रोजेक्ट वायबिलिटी (व्यवहार्यता) बेहतर हुई है। सेट्टी ने कहा कि एमएसएमई बैंकों के लिए सबसे तेजी से बढऩे वाला क्रेडिट सेगमेंट बना हुआ है। दिसंबर 2025 तक एमएसएमई का क्रेडिट ओवरड्यू सालाना आधार पर 16-18 परसेंट ग्रोथ के साथ 67 लाख करोड़ तक पहुंच गया। कई बैंकों में एमएसएमई लोन ग्रोथ 20 परसेंट से अधिक रही। लेकिन अभी भी 50 परसेंट से कम एमएसएमई फंडिंग फॉर्मल चैनल से हो पा रही है। कुल एनपीए घटकर 2.5 परसेंट पर आ गए हैं ऐसे में बैंकों की सेहत भी सुधर रही है और सरकारी बैंकों का नेट प्रोफिट 1.98 लाख करोड़ रुपये के लेवल पर पहुंच गया है। लेकिन बैंकिंग रिफॉर्म की बहुत ज्यादा जरूरत है और बड़े प्रोजेक्ट्स की फाइनेंसिंग के लिए बैंकों की कैपेसिटी बढ़ाने की आवश्यकता है। सीआरआर और एसएलआर जैसे प्रावधानों के कारण बैंकों के करीब 21 परसेंट संसाधन लॉक हो जाते हैं।

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‘विकसित भारत’ में स्पीड ब्रेकर की आहट!

 नोटबंदी और जीएसटी के बाद इकोनॉमी में स्लोडाउन सैटल हो ही रहा था कि कोविड बहाना बन गया। लेकिन कोविड से निपटते ही देश की इकोनॉमी ऐसी सरपट दौड़ी की दुनिया दंग रह गई। रूस-यूक्रेन वॉर का भी इंडिया ने एडवांटेज उठा लिया लेकिन वेस्ट एशिया वॉर ग्रोथ पाथ पर आगे बढ़ रही इकोनॉमी की चूल हिलाने लगा है। यह इतना बड़ा खतरा है कि इस शॉकवेव से निकलने में कई साल लग सकते हैं क्योंकि इसका इंपैक्ट अमूमन सभी इंडिकेटर, डिमांड, सप्लाई, करंट अकाउंट डेफिसिट और प्रोडक्टिविटी पर एक जैसा दिखाई देगा। खैर...एसबीआई के चेयरमैन सीएस सेट्टी ने फ्यूचर की बात करते हुए कहा है कि 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने के लिए 3,000-3,500 लाख करोड़ रुपए की भारी-भरकम फंडिंग की जरूरत होगी। केवल 2035 के विकसित भारत टार्गेट्स तक पहुंचने के लिए ही 600-650 लाख करोड़ रुपए के इंवेस्टमेंट की जरूरत होगी। सेेट्टी के अनुसार इतनी बड़ी पूंजी जरूरत को केवल बैंकों के जरिए पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए भारत को अपने बॉन्ड मार्केट को गहरा करना होगा और म्यूचुअल फंड, इंश्योरेंस तथा पेंशन फंड जैसे लॉन्ग-टर्म इंवेस्टमेंट टूल्स में भागीदारी बढ़ानी होगी। उन्होंने कहा कि डोमेस्टिक सेविंग्स का बड़ा हिस्सा अब पारंपरिक बैंक डिपॉजिट से निकलकर म्यूचुअल फंड, इंश्योरेंस और पेंशन प्रोडक्ट्स में जा रहा है। ऐसे में इन इंस्ट्ट्यिूशनल सेविंग्स को रियल इकोनॉमी और इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग की ओर मोडऩे की कोशिश अभी से तेज करने की जरूरत है। भारत का कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट डवलप्ड मार्केट्स के मुकाबले बहुत छोटा है जिससे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए लॉन्ग-टर्म फंडिंग बड़ा चैलेंज है। सेट्टी ने कहा सरकारी कैपेक्स वित्त वर्ष 15 में लगभग 2 लाख करोड़ था, जो वित्त वर्ष27 के बजट में इसे बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ कर दिया गया है। यानी दस साल में सरकारी कैपेक्स में 600 परसेंट की बढ़ोतरी हुई है। बेहतर रोड और रेल कनेक्विटी, पोर्ट और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में इन सालों में हुए इंवेस्टमेंट के कारण इंडिया इंक की प्रोजेक्ट वायबिलिटी (व्यवहार्यता) बेहतर हुई है। सेट्टी ने कहा कि एमएसएमई बैंकों के लिए सबसे तेजी से बढऩे वाला क्रेडिट सेगमेंट बना हुआ है। दिसंबर 2025 तक एमएसएमई का क्रेडिट ओवरड्यू सालाना आधार पर 16-18 परसेंट ग्रोथ के साथ 67 लाख करोड़ तक पहुंच गया। कई बैंकों में एमएसएमई लोन ग्रोथ 20 परसेंट से अधिक रही। लेकिन अभी भी 50 परसेंट से कम एमएसएमई फंडिंग फॉर्मल चैनल से हो पा रही है। कुल एनपीए घटकर 2.5 परसेंट पर आ गए हैं ऐसे में बैंकों की सेहत भी सुधर रही है और सरकारी बैंकों का नेट प्रोफिट 1.98 लाख करोड़ रुपये के लेवल पर पहुंच गया है। लेकिन बैंकिंग रिफॉर्म की बहुत ज्यादा जरूरत है और बड़े प्रोजेक्ट्स की फाइनेंसिंग के लिए बैंकों की कैपेसिटी बढ़ाने की आवश्यकता है। सीआरआर और एसएलआर जैसे प्रावधानों के कारण बैंकों के करीब 21 परसेंट संसाधन लॉक हो जाते हैं।


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