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21-05-2026

सोलर, विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए 5 साल में 7 लाख एकड़ जमीन की जरूरत : कोलियर्स

  •  देश को अगले पांच वर्षों में सोलर और विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स को स्थापित करने के लिए लगभग सात लाख एकड़ भूमि की आवश्यकता होगी और इसकी अनुमानित लागत 10 से 15 अरब अमेरिकी डॉलर होगी। रियल एस्टेट परामर्श कंपनी कोलियर्स की बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में यह कहा गया है। बीते वर्ष भारत की स्थापित रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता 250 गीगावाट से अधिक पहुंच गई। यह 2015 में लगभग 80 गीगावाट के मुकाबले तीन गुना से अधिक है। मार्च, 2026 तक देश में रिन्यूएबल ईंधन स्रोतों से लगभग 275 गीगावाट क्षमता स्थापित की जा चुकी है। कोलियर्स इंडिया ने ‘ग्रीन शिफ्ट: रिन्यूएबल प्रायोरिटाइजेशन रीशेपिंग इंडियन रियल एस्टेट’ नाम से जारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया कि 2030 तक सोलर और विंड एनर्जी क्षमता में लगभग 270-300 गीगावाट की वृद्धि होगी। रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘हमारा अनुमान है कि 2030 तक भारत में आगामी सोलर और पवन प्रोजेक्ट्स के लिए लगभग सात लाख एकड़ भूमि की आवश्यकता होगी। इसके परिणामस्वरूप अकेले जमीन में 10 से 15 अरब डॉलर का निवेश हो सकता है।’’ इसमें कहा गया है कि 2026 से 2030 के दौरान, सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए 6.5 लाख एकड़ से अधिक भूमि की आवश्यकता होगी और शेष जमीन विंड एनर्जी के लिए जरूरत होगी। कोलियर्स ने कहा कि भारत में सोलर प्रोजेक्ट्स की लागत आमतौर पर तीन से चार करोड़ रुपये प्रति मेगावाट होती है, जबकि पवन (तटीय) प्रोजेक्ट्स में उपयोग की जाने वाली प्रौद्योगिकी के आधार पर लगभग आठ से नौ करोड़ रुपये प्रति मेगावाट निवेश की आवश्यकता होती है। रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘घरेलू विनिर्माण क्षमताओं में तेजी से हो रही प्रगति के साथ, हमें उम्मीद है कि भारत 2030 तक रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता के 500 गीगावाट के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर लेगा।’’ वास्तव में, 2030 तक, अकेले सोलर प्रोजेक्ट्स की स्थापित क्षमता 400 से 450 गीगावाट तक पहुंच सकती है। कोलियर्स ने कहा, ‘‘कुल मिलाकर, अगले कुछ वर्षों में रिन्यूएबल एनर्जी क्षेत्र में लगभग 110 से 120 अरब डॉलर का निवेश हो सकता है।’’ रिन्यूएबल एनर्जी परियोजना की लागत का लगभग 10-12 प्रतिशत भूमि और स्वीकृतियों से संबंधित होता है। वर्तमान में, लगभग 146 गीगावाट (एक गीगावाट बराबर 1,000 मेगावाट) रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इनमें से 60 प्रतिशत से अधिक सोलर परियोजनाएं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता के तीव्र विस्तार से भारत के रियल एस्टेट क्षेत्र, विशेष रूप से भूमि अधिग्रहण और रिन्यूएबल एनर्जी पर केंद्रित औद्योगिक पार्कों के लिए अवसर पैदा होंगे। कोलियर्स इंडिया के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) और प्रबंध निदेशक बादल याग्निक ने कहा, ‘‘आने वाले कुछ वर्षों में, रिन्यूएबल एनर्जी न केवल भारत के कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मददगार होगी, बल्कि वृद्धि और निवेश को भी गति देगी। इससे पूरे देश में दीर्घकालिक सतत वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा।’’

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सोलर, विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए 5 साल में 7 लाख एकड़ जमीन की जरूरत : कोलियर्स

 देश को अगले पांच वर्षों में सोलर और विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स को स्थापित करने के लिए लगभग सात लाख एकड़ भूमि की आवश्यकता होगी और इसकी अनुमानित लागत 10 से 15 अरब अमेरिकी डॉलर होगी। रियल एस्टेट परामर्श कंपनी कोलियर्स की बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में यह कहा गया है। बीते वर्ष भारत की स्थापित रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता 250 गीगावाट से अधिक पहुंच गई। यह 2015 में लगभग 80 गीगावाट के मुकाबले तीन गुना से अधिक है। मार्च, 2026 तक देश में रिन्यूएबल ईंधन स्रोतों से लगभग 275 गीगावाट क्षमता स्थापित की जा चुकी है। कोलियर्स इंडिया ने ‘ग्रीन शिफ्ट: रिन्यूएबल प्रायोरिटाइजेशन रीशेपिंग इंडियन रियल एस्टेट’ नाम से जारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया कि 2030 तक सोलर और विंड एनर्जी क्षमता में लगभग 270-300 गीगावाट की वृद्धि होगी। रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘हमारा अनुमान है कि 2030 तक भारत में आगामी सोलर और पवन प्रोजेक्ट्स के लिए लगभग सात लाख एकड़ भूमि की आवश्यकता होगी। इसके परिणामस्वरूप अकेले जमीन में 10 से 15 अरब डॉलर का निवेश हो सकता है।’’ इसमें कहा गया है कि 2026 से 2030 के दौरान, सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए 6.5 लाख एकड़ से अधिक भूमि की आवश्यकता होगी और शेष जमीन विंड एनर्जी के लिए जरूरत होगी। कोलियर्स ने कहा कि भारत में सोलर प्रोजेक्ट्स की लागत आमतौर पर तीन से चार करोड़ रुपये प्रति मेगावाट होती है, जबकि पवन (तटीय) प्रोजेक्ट्स में उपयोग की जाने वाली प्रौद्योगिकी के आधार पर लगभग आठ से नौ करोड़ रुपये प्रति मेगावाट निवेश की आवश्यकता होती है। रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘घरेलू विनिर्माण क्षमताओं में तेजी से हो रही प्रगति के साथ, हमें उम्मीद है कि भारत 2030 तक रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता के 500 गीगावाट के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर लेगा।’’ वास्तव में, 2030 तक, अकेले सोलर प्रोजेक्ट्स की स्थापित क्षमता 400 से 450 गीगावाट तक पहुंच सकती है। कोलियर्स ने कहा, ‘‘कुल मिलाकर, अगले कुछ वर्षों में रिन्यूएबल एनर्जी क्षेत्र में लगभग 110 से 120 अरब डॉलर का निवेश हो सकता है।’’ रिन्यूएबल एनर्जी परियोजना की लागत का लगभग 10-12 प्रतिशत भूमि और स्वीकृतियों से संबंधित होता है। वर्तमान में, लगभग 146 गीगावाट (एक गीगावाट बराबर 1,000 मेगावाट) रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इनमें से 60 प्रतिशत से अधिक सोलर परियोजनाएं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता के तीव्र विस्तार से भारत के रियल एस्टेट क्षेत्र, विशेष रूप से भूमि अधिग्रहण और रिन्यूएबल एनर्जी पर केंद्रित औद्योगिक पार्कों के लिए अवसर पैदा होंगे। कोलियर्स इंडिया के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) और प्रबंध निदेशक बादल याग्निक ने कहा, ‘‘आने वाले कुछ वर्षों में, रिन्यूएबल एनर्जी न केवल भारत के कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मददगार होगी, बल्कि वृद्धि और निवेश को भी गति देगी। इससे पूरे देश में दीर्घकालिक सतत वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा।’’


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