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09-05-2026

स्वस्थ पति आय छिपाकर पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से बच नहीं सकता : कोर्ट

  •  दिल्ली की अदालत ने उस अंतरिम आदेश को बरकरार रखा है, जिसके तहत घरेलू हिंसा के आरोपी एक व्यक्ति को अलग रह रही पत्नी और नाबालिग बच्ची को गुजर-बसर के लिए हर महीने 7,500 रुपये देने का निर्देश दिया गया था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान ने कहा कि एक स्वस्थ पति अपनी आय छिपाकर परिवार के भरण-पोषण के वैध दायित्व से बच नहीं सकता है। उन्होंने घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम-2005 के तहत पारित निचली अदालत के आदेश के खिलाफ व्यक्ति की अपील खारिज कर दी। न्यायमूर्ति प्रधान ने कहा, मेरा यह सुविचारित मत है कि अपने खर्चों का प्रबंधन करना अपीलकर्ता की जिम्मेदारी है। अपीलकर्ता का खर्चों का विवरण देना और यह कहना कि उस पर अपनी मां की देखभाल की जिम्मेदारी है, उसे अपनी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं करता है। फरीदाबाद निवासी प्रदीप कुमार ने निचली अदालत के 23 दिसंबर 2025 के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी प्रिया और नाबालिग बच्ची को गुजर-बसर के लिए  हर महीने 7,500 रुपये देने का निर्देश दिया गया था। अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक, प्रिया का आरोप है कि जनवरी 2020 में शादी के बाद से ही उसे प्रदीप तथा उसके घरवालों के हाथों दहेज उत्पीडऩ, घरेलू हिंसा और क्रूरता का सामना करना पड़ा है।

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स्वस्थ पति आय छिपाकर पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से बच नहीं सकता : कोर्ट

 दिल्ली की अदालत ने उस अंतरिम आदेश को बरकरार रखा है, जिसके तहत घरेलू हिंसा के आरोपी एक व्यक्ति को अलग रह रही पत्नी और नाबालिग बच्ची को गुजर-बसर के लिए हर महीने 7,500 रुपये देने का निर्देश दिया गया था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान ने कहा कि एक स्वस्थ पति अपनी आय छिपाकर परिवार के भरण-पोषण के वैध दायित्व से बच नहीं सकता है। उन्होंने घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम-2005 के तहत पारित निचली अदालत के आदेश के खिलाफ व्यक्ति की अपील खारिज कर दी। न्यायमूर्ति प्रधान ने कहा, मेरा यह सुविचारित मत है कि अपने खर्चों का प्रबंधन करना अपीलकर्ता की जिम्मेदारी है। अपीलकर्ता का खर्चों का विवरण देना और यह कहना कि उस पर अपनी मां की देखभाल की जिम्मेदारी है, उसे अपनी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त नहीं करता है। फरीदाबाद निवासी प्रदीप कुमार ने निचली अदालत के 23 दिसंबर 2025 के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी प्रिया और नाबालिग बच्ची को गुजर-बसर के लिए  हर महीने 7,500 रुपये देने का निर्देश दिया गया था। अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक, प्रिया का आरोप है कि जनवरी 2020 में शादी के बाद से ही उसे प्रदीप तथा उसके घरवालों के हाथों दहेज उत्पीडऩ, घरेलू हिंसा और क्रूरता का सामना करना पड़ा है।


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