जैन श्वेताम्बर संस्था सोडाला के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए उपप्रवर्तिनी साध्वी डॉ.दिव्य प्रभाजी ने कहा कि पर्यूषण पर्व अज्ञान अविवेक प्रमाद से प्रेषित राग द्वेष को समाप्त करने के साथ आत्मशुद्धि का संदेश देता है। यह सम्पूर्ण विकृतियों को समाप्त करने की प्रक्रिया है। साध्वी जी ने कहा कि आज आवश्यकता घर को स्वर्ण बनाने की है। जीवन के पश्चात सभी स्वर्ग जाना चाहते हैं लेकिन जीवन रहते परिवार में स्वर्ग के हालात निर्मित हो घर स्वर्ग का प्रतीक बने। इस पर हम ध्यान नहीं देते है। प्रत्येक व्यक्ति कार्य समाप्त होने के बाद घर पहुंचने की चिंता करता है क्योंकि घर जाकर उसको कत्र्तव्य का स्मरण होता है। परिवार के सदस्यों के प्रति व्यक्ति स्वयं का उत्सर्ग करता है। इसीलिये हम कहते हैं कि घर आत्मीयता का केन्द्र है लेकिन इसी घर में आज कलह भी देखने का मिलती है। घर में आज पे्रम का अभाव देखने को मिलता है। घर में कितनी ही सुविधायें क्यों न उपलब्ध की जाये, सब कुछ व्यर्थ है। अगर पे्रम व सहिष्णुता का अभाव है वह घर स्वर्ग नहीं है। घर की एकता ही सफलता का सेतु बनाती है। मानव जीवन में मन बहुत चंचल है और वह वायु प्रकाश से भी तेज गति से भटकता है। मन पर अंकुश के लिये सदभाव, चिंतन मनन में संलग्न करने की आवश्यकता है। आज मनुष्य मन के आगे स्वयं को पस्त महसूस करता है। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह का आचरण करके हम हमारे मन को वश में कर सकते हैं। मन अगर मनुष्य को नई ऊंचाई देता है तो उसे गिराने वाला भी मन ही है। दुनिया में मन, भवंरा, स्त्री, बंदर को अत्यधिक चंचल बताया गया है लेकिन सर्वाधिक चंचल तो मन ही है। संयम साधना से ही मन को नियंत्रित कर उसे सही दिशा में आगे बढऩे का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इस पर्व की सामप्ति पर सम्पूर्ण प्राणी मात्र से क्षमा याचना करते हैं और क्रोध, माया, लाभ के रूप में जमा हुआ कचरा साफ किया जाता है। ईष्र्या, द्वेष को निकाल कर बाहर फेंकने का कार्य करने की पे्ररणा मिलती है। धन सम्पत्ति आदि से ममत्व भाव को दूर कर अहिंसा भाव की स्थापना करना इसका प्रमुख उद्देश्य है।