पर्वों के पर्वधिराज पर्यूषण के शुभारम्भ पर जैन श्वेताम्बर संस्था सोडाला श्याम नगर में आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए उपप्रर्वतिनी डॉ.दिव्य प्रभाजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि यह लोकोत्तर पर्व है। यह आध्यात्मिक आत्म सिद्धि का पर्व है। इस पर्व के माध्यम से जैन श्रावक आध्यात्म की ओर आलोकित होता है। धर्म आराधना के माध्यम से अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह के आदर्शों पर आचरण का संकल्प लेता है। श्रावक त्याग, तपस्या के माध्यम से आहार पर नियंत्रण, इच्छाओं पर नियंत्रण का संकल्प लेता है। उसे त्याग मूर्ति के साथ साध्वियों का सानिध्य मिलता है। यह पर्व आत्मा से आत्मा को जोडऩे का है। आत्मा को इस पर्व के दौरान श्रावक समझने का कार्य करता है और स्वयं को पहचानने के साथ नई पहचान देने का भी कार्य करता है। यह पर्व मनुष्य को ट्रस्ट्री जीवन की पे्ररणा देता है। आध्यात्मिक जीवन की ओर मनुष्य को प्ररित करता है। चरित्र निर्माण के साथ पापों को रोकने का संदेश देता है। साध्वी जी ने कहा कि पर्यूषण पर्व परिग्रह से मुक्त होकर अपरिग्रह के मार्ग का सेतु बनता है। ज्ञान दर्शन चरित्र और तप की अराधना का संदेश देता है। जीवन में चित्र का नहीं चरित्र का विशेष महत्व है। चरित्र के बिना सुन्दरता का भी कोई महत्व नहीं है। चरित्र के बिना जीवन सार्थक नहीं है। उन्होंने कहा कि ऊंचे कुल में जन्म लेना ही पर्याप्त नहीं है। जीवन में चरित्र की सार्थकता के लिये सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, ईमानदारी का होना जीवन में आवश्यक है। शारीरिक सौंदर्य की बजाय आध्यात्मिक सौंदर्य अधिक महत्वपूर्ण है। शील के बिना सौंदर्य का कोई महत्व नहीं है। चरित्र के बिना श्रंगार का कोई महत्व नहीं है। इंद्रियों को वश में रखने वाला ही चरित्रवान बनता है। मनुष्य की इंद्रियां घोड़े के समान है। मनुष्य जब घोड़े की तरह इंद्रियों की सवारी करता है, उन पर नियंत्रण करता है तो वह चरित्रवान बनता है। रईस घोड़ों पर नियंत्रण करता है। सामाजिक जीवन में मनुष्य की भूमिका रईस की है, जो घोड़े की तरह इंद्रियों पर नियंत्रण रखकर जीवन को सार्थक बनाता है और संयमित जीवन की दिशा में आगे बढ़ता है। उन्होंने वीर दुर्गादास का उदाहरण देते हुए कहा कि उनका जीवन चरित्रवान था। जिन्होंने मानव जीवन में जारी को मां बहन का आदर्श प्रस्तुत कर अपने चरित्रवान होने का परिचय दिया था।