उपरोक्त कथन की पुष्टि निम्न उदाहरण से भी होती है- एक आदमी के पास दस ऊंट थे, जिनमें एक ऊंट बाल्यकाल से ही उस व्यक्ति के पास रहता था। रात्री में ऊंटों का स्वामी, नौ ऊंटों को तो मजबूत रस्सी से बांधता था और उस दसवें ऊंट (जो उसके पास बचपन से ही था)को मामूली सी रस्सी से बांधता था लेकिन वह ऊंट का बच्चा स्वयं को मजबूत रस्सी से बंधा हुआ मानता था। बचपन की यह बात उसके मन में गहराई तक बैठ गई थी, जिससे वह मुक्त नहीं हो पा रहा था और वह सक्षम होते हुए भी रस्सी को तोडऩे का प्रयास नहीं करता था। मनुष्य के जीवन में भी ऐसी घटनाएं घटित होती रहती हैं और किसी लक्ष्य में विफलता या विफलता का दर्द उसे लम्बे समय तक सालता रहता है। यहां तक कि यह दर्द कभी-कभी न केवल सम्बंधित व्यक्ति के आत्मविश्वास को हिला देता है बल्कि उसके आगे बढऩे में भी रुकावट उत्पन्न करता है। अतीत की विफलता दुखदायी इसलिये भी होती है क्योंकि इसमें व्यक्ति का समय व मेहनत और सपनों का निवेश होता है। जब किसी कार्य के अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते तब व्यक्ति के मन में पछतावा, अपराध बोध और आत्म-ग्लानि की भावना जन्म लेती है। यह प्रवृत्ति मनुष्य के मनोबल को कमजोर कर देती है, जिसका कुप्रभाव सम्बंधित व्यक्ति के अन्य अवसरों पर भी पड़ता है।