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18-08-2025

स्वतंत्रता का हित नागरिक सशक्तिकरण में निहित भगवान् श्रीकृष्ण सत्य धर्म और मित्रता के प्रतीक

  •  जैन श्वेताम्बर संस्था श्याम नगर सोडाला के तत्वावधान में स्वतंत्रता दिवस की 79वीं वर्षगांठ व कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर धर्म सभा का आयोजन किया गया। सभा को सम्बोधित करते हुए उप प्रर्वतिनी डॉ.दिव्य प्रभाजी महाराज सा. ने कहा कि देश ने लाखों नागरिकों की कुर्बानी के पश्चात स्वतंत्रता प्राप्त की है लेकिन 78 वर्ष हो जाने के बाद भी यह स्वतंत्रता अधूरी है। देश में बहुत बड़ा वर्ग आज भी गरीबी व शोषण से संघर्ष कर रहा है। गत एक दशक के दौरान सरकार ने अनेक कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से आम जनता को राहत पहुंचाने का कार्य किया है लेकिन देश की आबादी के सशक्तिकरण की आवश्यकता है। आर्थिक व सामाजिक सशक्तिकरण में ही गरीबी की समस्या को हल किया जा सकता है। महात्मा गांधी के रामराज न जवाहर लाल नेहरू का समाजवाद आज भी अधूरा है। भगवान श्रीकृष्ण के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भगवान राम महावीर व बुद्ध का जन्म राजमहल में हुआ था लेकिन कृष्ण का जन्म कंस के कारावास में हुआ था। कृष्ण ने सम्पूर्ण मानवता के कल्याण हेतु सतत कर्म किया। कृष्ण ने देश के पर्यावरण संरक्षण को अपने कर्म में सदैव महत्व दिया। उन्होंने गाय की रक्षा, वृक्षों की रक्षा के साथ गोपालकों के साथ मित्रता का कार्य किया। गोपियों से मित्रता के साथ उन्हें सशक्त बनाने में सहयोग किया। कृष्ण कभी किसी सत्ता का नेतृत्व नहीं करना चाहते थे, अत: उन्होंने अर्जुन का सारथी बनना ही स्वीकार किया और सारथी बनकर अहंकार का वध किया। साधवीजी ने कहा कि कृष्ण ने दुर्योधन के साथ भी पाण्डवों के समझौते व शांति से समस्या के हल का प्रस्ताव दिया था। केवल पांच गांवों की मांग पाण्डवों के लिये की थी लेकिन अहंकारी दुर्योधन की जिद्द के कारण ही उसको पराजय का सामना करना पड़ा था। उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा व सामाजिक सदभाव के कृष्ण प्रतीक थे और इसी कत्र्तव्य के निर्वहन में उन्होंने जरासंध, कंस का वध किया था। उन्होंने कहा कि कृष्ण जनता के कल्याण हेतु समर्पित थे। द्रौपदी की सुरक्षा प्रदान की। भगवान श्रीकृष्ण जन-जन के कल्याण हेतु समर्पित थे। कृष्ण ने कहा था कि मनुष्य जन्म से महान् नहीं होता है वह कर्म से महान् बनता है। कृष्ण की सच्ची मित्रता का उदाहरण तो सुदामा के साथ उनके व्यवहार से मिलता है।

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स्वतंत्रता का हित नागरिक सशक्तिकरण में निहित भगवान् श्रीकृष्ण सत्य धर्म और मित्रता के प्रतीक

 जैन श्वेताम्बर संस्था श्याम नगर सोडाला के तत्वावधान में स्वतंत्रता दिवस की 79वीं वर्षगांठ व कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर धर्म सभा का आयोजन किया गया। सभा को सम्बोधित करते हुए उप प्रर्वतिनी डॉ.दिव्य प्रभाजी महाराज सा. ने कहा कि देश ने लाखों नागरिकों की कुर्बानी के पश्चात स्वतंत्रता प्राप्त की है लेकिन 78 वर्ष हो जाने के बाद भी यह स्वतंत्रता अधूरी है। देश में बहुत बड़ा वर्ग आज भी गरीबी व शोषण से संघर्ष कर रहा है। गत एक दशक के दौरान सरकार ने अनेक कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से आम जनता को राहत पहुंचाने का कार्य किया है लेकिन देश की आबादी के सशक्तिकरण की आवश्यकता है। आर्थिक व सामाजिक सशक्तिकरण में ही गरीबी की समस्या को हल किया जा सकता है। महात्मा गांधी के रामराज न जवाहर लाल नेहरू का समाजवाद आज भी अधूरा है। भगवान श्रीकृष्ण के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भगवान राम महावीर व बुद्ध का जन्म राजमहल में हुआ था लेकिन कृष्ण का जन्म कंस के कारावास में हुआ था। कृष्ण ने सम्पूर्ण मानवता के कल्याण हेतु सतत कर्म किया। कृष्ण ने देश के पर्यावरण संरक्षण को अपने कर्म में सदैव महत्व दिया। उन्होंने गाय की रक्षा, वृक्षों की रक्षा के साथ गोपालकों के साथ मित्रता का कार्य किया। गोपियों से मित्रता के साथ उन्हें सशक्त बनाने में सहयोग किया। कृष्ण कभी किसी सत्ता का नेतृत्व नहीं करना चाहते थे, अत: उन्होंने अर्जुन का सारथी बनना ही स्वीकार किया और सारथी बनकर अहंकार का वध किया। साधवीजी ने कहा कि कृष्ण ने दुर्योधन के साथ भी पाण्डवों के समझौते व शांति से समस्या के हल का प्रस्ताव दिया था। केवल पांच गांवों की मांग पाण्डवों के लिये की थी लेकिन अहंकारी दुर्योधन की जिद्द के कारण ही उसको पराजय का सामना करना पड़ा था। उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा व सामाजिक सदभाव के कृष्ण प्रतीक थे और इसी कत्र्तव्य के निर्वहन में उन्होंने जरासंध, कंस का वध किया था। उन्होंने कहा कि कृष्ण जनता के कल्याण हेतु समर्पित थे। द्रौपदी की सुरक्षा प्रदान की। भगवान श्रीकृष्ण जन-जन के कल्याण हेतु समर्पित थे। कृष्ण ने कहा था कि मनुष्य जन्म से महान् नहीं होता है वह कर्म से महान् बनता है। कृष्ण की सच्ची मित्रता का उदाहरण तो सुदामा के साथ उनके व्यवहार से मिलता है।


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