भारतीय रिजर्व बैंक का रेपो दर बढ़ाने का फैसला वृहद आर्थिक स्थिरता और महंगाई पर नियंत्रण को प्राथमिकता देने का संकेत देता है। हालांकि, ऊंची ब्याज दर से खपत, निवेश एवं विस्तार की योजनाओं पर असर पड़ सकता है। उद्योग जगत के विशेषज्ञों ने बुधवार को यह बात कही। आरबीआई ने बुधवार को उम्मीद के मुताबिक नीतिगत दर रेपो 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया। करीब चार साल में यह रेपो दर में पहली बढ़ोतरी है। साथ ही नीतिगत रुख को ‘तटस्थ’ से बदलकर ‘सूझ-बूझ के साथ सख्त’ करने का फैसला भी किया गया। उद्योग मंडल एसोचैम के अध्यक्ष निर्मल के. मिंडा ने कहा, ‘‘ हम रेपो दर बढ़ाने और मौद्रिक नीति के रुख को बदलने के आरबीआई के फैसले का स्वागत करते हैं। यह कदम वृहद आर्थिक स्थिरता और महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखने के प्रति सतर्क रुख का संकेत देता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘ हालांकि, कर्ज लेने की लागत बढऩे से खपत पर कुछ असर पड़ सकता है। खासकर ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) और कर्ज की मांग पर निर्भर क्षेत्रों में नए निवेश तथा विस्तार की योजनाएं धीमी पड़ सकती हैं। हालांकि, इसका असर तुरंत होने के बजाय धीरे-धीरे पडऩे की संभावना है क्योंकि मौद्रिक नीति के फैसलों का असर अर्थव्यवस्था तक पहुंचने में समय लगता है।’’ केयरएज रेटिंग्स की मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा ने कहा, ‘‘आरबीआई का रेपो दर बढ़ाने का फैसला हमारी उम्मीदों के अनुरूप है। मौद्रिक नीति का रुख ‘सोच-समझकर सख्त रुख’ अपनाने के निर्णय से आगे दरों में और कटौती की संभावना खत्म होती दिख रही है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वृद्धि के अनुमान को 0.40 प्रतिशत बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत करना भी मोटे तौर पर हमारी उम्मीदों के अनुरूप था, हालांकि हमें अब भी उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2026-27 में वृद्धि मामूली रूप से अधिक 7.3 प्रतिशत रहेगी।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि, बैंकों से अतिरिक्त नकदी निकालने को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिया गया लेकिन हमारा मानना है कि आरबीआई का ध्यान नकदी प्रबंधन पर बना रहेगा। हमारा मानना है कि उपयुक्त नकदी प्रबंधन किए बिना केवल दरें बढ़ाना कम प्रभावी साबित हो सकता है। ’’ भारतीय युवा शक्ति ट्रस्ट की संस्थापक एवं प्रबंध न्यासी लक्ष्मी वेंकटरमण वेंकटेशन ने कहा, ‘‘अगस्त में खुदरा महंगाई बढक़र 4.82' हो गई है जो आरबीआई के 4.0' के लक्ष्य से अधिक है। खाद्य कीमतों में बढ़ते दबाव और अनिश्चित बाहरी माहौल के बीच खाद्य महंगाई 5.95' रही। ऐसे में आरबीआई का रेपो दर बढ़ाने का फैसला मूल्य दबाव को नियंत्रित करने और व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की जरूरत को दर्शाता है। चूंकि बैंक की ब्याज दर रेपो से जुड़ी है, ऐसे में छोटे उद्यमों के लिए कर्ज लेने की लागत में मामूली बढ़ोतरी से कार्यशील पूंजी, ऋण चुकाने और कारोबार के विस्तार, कर्मचारियों की नियुक्ति तथा निवेश से जुड़े फैसलों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।’’ वेंकटेशन ने कहा, ‘‘ऐसे में यह जरूरी है कि मौद्रिक सख्ती के साथ अंतिम छोर तक कर्ज की मजबूत पहुंच, पर्याप्त कार्यशील पूंजी सहायता, खरीदारों द्वारा सूक्ष्म और लघु उद्यमों को समय पर भुगतान तथा कर्ज चुकाने की उचित व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए, ताकि सक्षम सूक्ष्म एवं छोटे उद्यमों को असंगठित क्षेत्र से महंगे वित्त के भरोसे जाने के लिए मजबूर न होना पड़े।’’