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19-06-2026

डॉलर ही नहीं रुपये पर ये भी चला रहे रोलर

  •  रूस को तेल का पेमेंट रुपये में कर भारत ने जो सेविंग की थी वो सब बराबर हो गई। गोल्ड की रैली और ईरान वॉर के कारण रुपये में जो करेक्शन आया उसने भारत के सामने बैलेंस ऑफ पेमेंट का क्राइसिस खड़ा कर दिया। डीप डाइव (गहराई से गोता लगाना) करते हैं तो पता चलता है कि रुपया दुनिया की हर प्रमुख करेंसी के मुकाबले कमजोर हुआ है। साथ में लगी टेबल के अनुसार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया एक साल में 9-10 परसेंट ही गिरा जबकि ऑस्ट्रेलियन डॉलर के मुकाबले 18 परसेंट। और तो और चीन की करेंसी युआन के मुकाबले रुपया 15 परसेंट तक गिरा। हालांकि ईरान-वॉर में सीजफायर हो जाने से रुपया रिकवर कर रहा है लेकिन एक दौर ऐसा भी आया था जब क्रूड ऑइल 125 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया था। इससे भारत का इंफ्लेशन-डवलपमेंट बैलेंस गड़बड़ा गया क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 85 परसेंट ऑइल इंपोर्ट करता है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की 96.96 के लेवल तक की गिरावट को एनेलिस्ट टेक्स्टबुक जैसा रिफ्लेक्सिव ट्रेड बता रहे हैं। सिर्फ अप्रैल महीने में ही एफआईआई निकासी 7.5 बिलियन डॉलर रही, जिससे इस वर्ष अब तक कुल निकासी 20 बिलियन डॉलर से ऊपर पहुंच गई। इसी दौरान ब्रेंट क्रूड फरवरी में लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल से बढक़र अब करीब 110 डॉलर तक पहुंच गया है। नतीजा रुपये पर दोहरी मार पड़ी। कोटक सिक्योरिटीज के अनिंद्य बनर्जी के अनुसार, मासिक तेल इंपोर्ट बोझ लगभग 7-8 बिलियन डॉलर बढ़ गया है। ऊंची ऑइल प्राइस इकोनॉमी पर इंफ्लेशन टेक्स की तरह काम करती हैं और कॉस्ट बढ़ती हैं, और रिटेल महंगाई भी बढ़ती है। लेकिन सवाल यह है कि ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और चीनी युआन के मुकाबले रुपया कमजोर क्यों हुआ। ऑइल शॉक से पहले भी रुपया कमजोर था। अनिंद्य बनर्जी ने कहा कि अमेरिका के साथ ट्रेड टेंशन के साथ ही यह दबाव शुरू हो गया था। तब चूंकि महंगाई कंट्रोल में थी इसलिए कमजोर रुपया एक्सपोर्टर को सपोर्ट दे रहा था। लेकिन येन तो पिछले वर्ष डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ। फिर जापान भी भारत की तरह एनर्जी इंपोर्टर है। ऐसे में जापान भी भारत की ही तरह इंपोर्टेड इंफ्लेशन की चपेट में था। एनेलिस्ट कहते हैं कि रुपये का आगे का रास्ता चार फैक्टर ऑइस प्राइस, जियो-पॉलिटिक्स, आरबीआई का दखल और विदेशी पूंजी प्रवाह पर निर्भर करेगा। एंरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर के अनुसार यदि तेल कीमतें नरम पड़ती हैं और वैश्विक जोखिम भावना सुधरती है, तो रुपया 93-94 के दायरे में स्थिर हो सकता है।  लेकिन रुपये के सामने कोई स्ट्रक्चरल क्राइसिस नहीं है लेकिन बाहरी दबाव जरूर पड़ रहा है। 

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डॉलर ही नहीं रुपये पर ये भी चला रहे रोलर

 रूस को तेल का पेमेंट रुपये में कर भारत ने जो सेविंग की थी वो सब बराबर हो गई। गोल्ड की रैली और ईरान वॉर के कारण रुपये में जो करेक्शन आया उसने भारत के सामने बैलेंस ऑफ पेमेंट का क्राइसिस खड़ा कर दिया। डीप डाइव (गहराई से गोता लगाना) करते हैं तो पता चलता है कि रुपया दुनिया की हर प्रमुख करेंसी के मुकाबले कमजोर हुआ है। साथ में लगी टेबल के अनुसार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया एक साल में 9-10 परसेंट ही गिरा जबकि ऑस्ट्रेलियन डॉलर के मुकाबले 18 परसेंट। और तो और चीन की करेंसी युआन के मुकाबले रुपया 15 परसेंट तक गिरा। हालांकि ईरान-वॉर में सीजफायर हो जाने से रुपया रिकवर कर रहा है लेकिन एक दौर ऐसा भी आया था जब क्रूड ऑइल 125 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया था। इससे भारत का इंफ्लेशन-डवलपमेंट बैलेंस गड़बड़ा गया क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 85 परसेंट ऑइल इंपोर्ट करता है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की 96.96 के लेवल तक की गिरावट को एनेलिस्ट टेक्स्टबुक जैसा रिफ्लेक्सिव ट्रेड बता रहे हैं। सिर्फ अप्रैल महीने में ही एफआईआई निकासी 7.5 बिलियन डॉलर रही, जिससे इस वर्ष अब तक कुल निकासी 20 बिलियन डॉलर से ऊपर पहुंच गई। इसी दौरान ब्रेंट क्रूड फरवरी में लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल से बढक़र अब करीब 110 डॉलर तक पहुंच गया है। नतीजा रुपये पर दोहरी मार पड़ी। कोटक सिक्योरिटीज के अनिंद्य बनर्जी के अनुसार, मासिक तेल इंपोर्ट बोझ लगभग 7-8 बिलियन डॉलर बढ़ गया है। ऊंची ऑइल प्राइस इकोनॉमी पर इंफ्लेशन टेक्स की तरह काम करती हैं और कॉस्ट बढ़ती हैं, और रिटेल महंगाई भी बढ़ती है। लेकिन सवाल यह है कि ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और चीनी युआन के मुकाबले रुपया कमजोर क्यों हुआ। ऑइल शॉक से पहले भी रुपया कमजोर था। अनिंद्य बनर्जी ने कहा कि अमेरिका के साथ ट्रेड टेंशन के साथ ही यह दबाव शुरू हो गया था। तब चूंकि महंगाई कंट्रोल में थी इसलिए कमजोर रुपया एक्सपोर्टर को सपोर्ट दे रहा था। लेकिन येन तो पिछले वर्ष डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ। फिर जापान भी भारत की तरह एनर्जी इंपोर्टर है। ऐसे में जापान भी भारत की ही तरह इंपोर्टेड इंफ्लेशन की चपेट में था। एनेलिस्ट कहते हैं कि रुपये का आगे का रास्ता चार फैक्टर ऑइस प्राइस, जियो-पॉलिटिक्स, आरबीआई का दखल और विदेशी पूंजी प्रवाह पर निर्भर करेगा। एंरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर के अनुसार यदि तेल कीमतें नरम पड़ती हैं और वैश्विक जोखिम भावना सुधरती है, तो रुपया 93-94 के दायरे में स्थिर हो सकता है।  लेकिन रुपये के सामने कोई स्ट्रक्चरल क्राइसिस नहीं है लेकिन बाहरी दबाव जरूर पड़ रहा है। 


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