भारत में शेयर बाजार में रिटेल इन्वेस्टर्स की भागीदारी पिछले कुछ वर्ष में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची है। दिसंबर 2025 तक देश में डीमैट खातों की संख्या बढक़र 21.6 करोड़ हो गई। लेकिन उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इन 21.6 करोड़ डीमैट खातों में से केवल लगभग 5 करोड़ खाते ही सक्रिय हैं, जबकि करीब 16.6 करोड़ खाते निष्क्रिय या निष्प्रभावी (डॉरमेंट) पड़े हैं। यह स्थिति तब और अधिक चर्चा में आ गई जब नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने वित्त वर्ष 2025-26 में सक्रिय निवेशकों की संख्या में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की। एनएसई का सक्रिय निवेशक आधार वित्त वर्ष26 में 7' घटकर 4.58 करोड़ रह गया, जो वित्त वर्ष 25 में 4.92 करोड़ था। यह पिछले 3 वर्ष में पहली वार्षिक गिरावट है। वित्त वर्ष 2026 के दौरान लगभग 35 लाख सक्रिय खाते कम हो गए। इनमें से 70' से अधिक यानी करीब 26 लाख खाते प्रमुख डिस्काउंट ब्रोकरेज प्लेटफॉम्र्स जैसे •ोरोधा से जुड़े थे। आंकड़ों के अनुसार देश के कुल डीमैट खातों में से केवल 23.1' खातों में पिछले एक वर्ष के दौरान एक लेनदेन हुआ है। इसका मतलब है लगभग 76.9' खाते निष्क्रिय हैं। इनमें ऐसे खाते शामिल हैं जिनमें एक वर्ष से अधिक समय से कोई ट्रेडिंग गतिविधि नहीं हुई है, साथ ही वे खाते भी जो व्यक्ति ने अलग-अलग ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म पर खोल रखे हैं। बुल मार्केट के दौरान लाखों निवेशकों ने केवल आईपीओ में आवेदन करने के लिए डीमैट खाते खोले। कई चर्चित आईपीओ में भारी ओवरसब्सक्रिप्शन के कारण निवेशकों को शेयर अलॉटमेंट नहीं मिला। वहीं जिन निवेशकों को शेयर मिले, उनमें से कई ने लिस्टिंग के तुरंत बाद मुनाफावसूली कर बाजार से दूर हो गए। •ोरोधा जैसे डिजिटल ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म और पेपरलेस ऑनबोर्डिंग की वजह से डीमैट खाता खोलना आसान हो गया। कई निवेशकों ने अलग-अलग ब्रोकर्स के साथ कई खाते खोल लिए। हालांकि वे नियमित रूप से एक खाते का उपयोग करते हैं, जबकि बाकी खाते निष्क्रिय पड़े रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार महत्वपूर्ण कारण फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस सेगमेंट में लगातार होने वाला नुकसान है। नुकसान झेलने के बाद बड़ी संख्या में निवेशक दीर्घकालिक निवेश की ओर जाने के बजाय पूरी तरह बाजार से बाहर हो जाते हैं। डीमैट खाते निष्क्रिय हो जाते हैं जिसे एफएंडओ बर्नआउट कहा जा रहा है। मार्केट एनेलिस्ट्स का अनुमान है कि एक व्यक्ति द्वारा कई डीमैट खाते रखने की प्रवृत्ति के कारण भारत में यूनीक इंवेस्टर्स की संख्या 21.6 करोड़ नहीं, बल्कि लगभग 12-13 करोड़ के बीच है।