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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

18-04-2026

बढ़ती रॉ-मेटेरियल कॉस्ट के ‘जाल’ में फंसा कॉर्पोरेट जगत

  •  पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर गहराता जा रहा है। खासकर कच्चे माल की बढ़ती कीमतों ने कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। उत्पादन लागत बढऩे से कंपनियां दबाव में हैं और इसका असर धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंचने लगा है। पिछले करीब डेढ़ महीने में कई अहम कच्चे माल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है। यूरिया की कीमत में 70% से ज्यादा, नैफ्था में करीब 60%, सल्फर में 50% से अधिक और कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) में 30% से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके अलावा पीवीसी रेजिन, टाइटेनियम डाइऑक्साइड और एल्यूमिनियम जैसी चीजें भी महंगी हो गई हैं। इन सभी का इस्तेमाल अलग-अलग उद्योगों में होता है, इसलिए लागत का असर लगभग हर सेक्टर पर पड़ रहा है। कंपनियां अब अपने खर्च को कंट्रोल करने के लिए नई रणनीति बना रही हैं। कई कंपनियां अपने बड़े निवेश (कैपेक्स) को टाल रही हैं और जरूरी खर्चों पर ही ध्यान दे रही हैं। इसके साथ ही मुनाफे के मार्जिन पर भी दबाव बढ़ रहा है, क्योंकि लागत तेजी से बढ़ रही है लेकिन कीमतें उसी अनुपात में बढ़ाना आसान नहीं है। डाबर के ग्लोबल सीईओ मोहित मल्होत्रा ने कहा है कि देश एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहां इनपुट कॉस्ट की महंगाई, कंपनियों की कीमत बढ़ाने की क्षमता से आगे निकल सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस युद्ध ने वित्त वर्ष 2027 के लिए बनाए गए अनुमान को पूरी तरह बदल दिया है।अब कंपनियों का फोकस विस्तार या नए निवेश से ज्यादा लागत को संभालने पर है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर कई सेक्टर पर साफ दिख रहा है। तेल विपणन कंपनियों के साथ-साथ एविएशन सेक्टर पर इसका सीधा असर पड़ा है, क्योंकि विमान ईंधन (एविएशन टरबाइन फ्यूल) उनकी लागत का बड़ा हिस्सा होता है। इसी वजह से एयरलाइंस टिकट महंगे कर रही हैं। वहीं लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट कंपनियों का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है, जिससे सामान की ढुलाई महंगी हो रही है। एफएमसीजी, पेंट और कंज्यूमर ड्यूरेबल कंपनियां भी दबाव में हैं। ये कंपनियां अपने मुनाफे को बचाने के लिए धीरे-धीरे प्रोडक्ट की कीमतें बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। हालांकि, वे एकदम से कीमत बढ़ाने से बच रही हैं ताकि ग्राहकों की मांग पर असर न पड़े।सबसे ज्यादा असर खाद (फर्टिलाइजऱ) सेक्टर पर पड़ा है। यूरिया की कमी के कारण कई कंपनियों को उत्पादन कम करना पड़ा है। भारत अपनी कुल उर्वरक जरूरतों का लगभग 30' आयात करता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। युद्ध के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हुई है, जिससे आयात में दिक्कत आ रही है। इसके अलावा, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (रुहृत्र) और पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर निर्भरता भी समस्या बढ़ा रही है। भारत लगभग 10-15% रुहृत्र स्पॉट मार्केट से खरीदता है, जबकि बाकी लंबी अवधि के समझौतों के तहत आता है। लेकिन पश्चिम एशिया से आने वाली सप्लाई, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते, युद्ध के कारण प्रभावित हो रही है, जिससे जोखिम बढ़ गया है। एक और बड़ी समस्या रुपये की कमजोरी है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से आयात और महंगा हो गया है। इससे कंपनियों की लागत और बढ़ रही है और महंगाई पर भी दबाव बन रहा है। मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव भी कंपनियों के लिए अनिश्चितता बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो कंपनियों के पास अपने प्रोडक्ट की कीमतें बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा, क्योंकि रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाएंगी। फिलहाल, कंपनियां संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं—एक तरफ बढ़ती लागत और दूसरी तरफ ग्राहकों की मांग को बनाए रखना। लेकिन साफ है कि वैश्विक तनाव का असर अब भारतीय बाजार और आम लोगों की जेब तक पहुंच चुका है, और आने वाले समय में यह असर और गहरा हो सकता है।

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बढ़ती रॉ-मेटेरियल कॉस्ट के ‘जाल’ में फंसा कॉर्पोरेट जगत

 पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर गहराता जा रहा है। खासकर कच्चे माल की बढ़ती कीमतों ने कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। उत्पादन लागत बढऩे से कंपनियां दबाव में हैं और इसका असर धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंचने लगा है। पिछले करीब डेढ़ महीने में कई अहम कच्चे माल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है। यूरिया की कीमत में 70% से ज्यादा, नैफ्था में करीब 60%, सल्फर में 50% से अधिक और कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) में 30% से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके अलावा पीवीसी रेजिन, टाइटेनियम डाइऑक्साइड और एल्यूमिनियम जैसी चीजें भी महंगी हो गई हैं। इन सभी का इस्तेमाल अलग-अलग उद्योगों में होता है, इसलिए लागत का असर लगभग हर सेक्टर पर पड़ रहा है। कंपनियां अब अपने खर्च को कंट्रोल करने के लिए नई रणनीति बना रही हैं। कई कंपनियां अपने बड़े निवेश (कैपेक्स) को टाल रही हैं और जरूरी खर्चों पर ही ध्यान दे रही हैं। इसके साथ ही मुनाफे के मार्जिन पर भी दबाव बढ़ रहा है, क्योंकि लागत तेजी से बढ़ रही है लेकिन कीमतें उसी अनुपात में बढ़ाना आसान नहीं है। डाबर के ग्लोबल सीईओ मोहित मल्होत्रा ने कहा है कि देश एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहां इनपुट कॉस्ट की महंगाई, कंपनियों की कीमत बढ़ाने की क्षमता से आगे निकल सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस युद्ध ने वित्त वर्ष 2027 के लिए बनाए गए अनुमान को पूरी तरह बदल दिया है।अब कंपनियों का फोकस विस्तार या नए निवेश से ज्यादा लागत को संभालने पर है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर कई सेक्टर पर साफ दिख रहा है। तेल विपणन कंपनियों के साथ-साथ एविएशन सेक्टर पर इसका सीधा असर पड़ा है, क्योंकि विमान ईंधन (एविएशन टरबाइन फ्यूल) उनकी लागत का बड़ा हिस्सा होता है। इसी वजह से एयरलाइंस टिकट महंगे कर रही हैं। वहीं लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट कंपनियों का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है, जिससे सामान की ढुलाई महंगी हो रही है। एफएमसीजी, पेंट और कंज्यूमर ड्यूरेबल कंपनियां भी दबाव में हैं। ये कंपनियां अपने मुनाफे को बचाने के लिए धीरे-धीरे प्रोडक्ट की कीमतें बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। हालांकि, वे एकदम से कीमत बढ़ाने से बच रही हैं ताकि ग्राहकों की मांग पर असर न पड़े।सबसे ज्यादा असर खाद (फर्टिलाइजऱ) सेक्टर पर पड़ा है। यूरिया की कमी के कारण कई कंपनियों को उत्पादन कम करना पड़ा है। भारत अपनी कुल उर्वरक जरूरतों का लगभग 30' आयात करता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। युद्ध के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हुई है, जिससे आयात में दिक्कत आ रही है। इसके अलावा, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (रुहृत्र) और पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर निर्भरता भी समस्या बढ़ा रही है। भारत लगभग 10-15% रुहृत्र स्पॉट मार्केट से खरीदता है, जबकि बाकी लंबी अवधि के समझौतों के तहत आता है। लेकिन पश्चिम एशिया से आने वाली सप्लाई, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते, युद्ध के कारण प्रभावित हो रही है, जिससे जोखिम बढ़ गया है। एक और बड़ी समस्या रुपये की कमजोरी है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से आयात और महंगा हो गया है। इससे कंपनियों की लागत और बढ़ रही है और महंगाई पर भी दबाव बन रहा है। मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव भी कंपनियों के लिए अनिश्चितता बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो कंपनियों के पास अपने प्रोडक्ट की कीमतें बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा, क्योंकि रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाएंगी। फिलहाल, कंपनियां संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं—एक तरफ बढ़ती लागत और दूसरी तरफ ग्राहकों की मांग को बनाए रखना। लेकिन साफ है कि वैश्विक तनाव का असर अब भारतीय बाजार और आम लोगों की जेब तक पहुंच चुका है, और आने वाले समय में यह असर और गहरा हो सकता है।


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