आप जानते हैं भारत के दिग्गज न्यूक्लियर साइंटिस्ट डॉ. होमी जहांगीर भाभा का एयरक्रेश में निधन हो गया था। कॉन्सपिरेसी थ्योरी (षडय़ंत्र कथाएं) कहती हैं कि एयरक्रेश हुआ नहीं कराया गया था...अमेरिका सहित पश्चिमी ताकतों ने। भारत के थोरियम प्रोजेक्ट को रोकने के लिए। अभी 24 जनवरी को इस हादसे को 62 साल हो गए। लेकिन भाभा जो करना चाहते हैं उस दिशा में भारत को बहुत बड़ी कामयाबी मिली है। सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कलपक्कम पावर प्लांट में पीएफबीआर (प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर) के क्रिटिकलिटी हासिल कर लेने की देश को बधाई दी थी। क्रिटिकलिटी यानी न्यूक्लियर रिएक्शन में पैदा हुई वो अवस्था जिसमें रिएक्टर खुद परमाणु विखंडन की प्रक्रिया को रेगुलेट करने लगता है और बाहरी दखल की जरूरत नहीं रहती। पीएफबीआर का यह प्रोटोटाइप तैयार करने में अमेरिका से लेकर फ्रांस और जापान से लेकर यूके व रूस तक नाकामयाब रहे हैं। अकेले अमेरिका ने इस प्रोजेक्ट पर 15 बिलियन डॉलर लगाए हैं लेकिन पीएफबीआर का प्रोटोटाइप नहीं बना पाया। इसी तरह जापान 12 बिलियन, यूके 8 बिलियन और जर्मनी 6 बिलियन डॉलर खर्च करने के बावजूद असफल रहे हैं। जबकि भारत ने 22 साल की मेहनत के बाद केवल...केवल 90 मिलियन यानी 9 करोड़ डॉलर यानी करीब 850 करोड़ रुपये में इतिहास रच दिया। अभी इसमें प्लूटोनियम का इस्तेमाल किया जा रहा है जो इसे यूरेनियम में बदल देता है। अब सवाल यह है कि दुनिया भर के देश पीएफबीआर को डवलप करने के लिए अरबों डॉलर क्यों झोंक रहे हैं। तो जबाव है इसमें जितना फ्यूल डाला जाता है उससे ज्यादा फ्यूल (बदले हुए स्वरूप में) तैयार कर देता है। जिसे फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है और एक ही बार फ्यूल लोड करने से यह रिएक्टर लगातार चलता रहता है।
तमिलनाडु के कलपक्कम न्यूक्लियर प्लांट में लगाए गए पीएफबीआर की कैपेसिटी 500 मेगावॉट की है। भारत सरकार इस प्रोजेक्ट को फास्ट्रेक करना चाहती है क्योंकि यूरेनियम देश में उपलब्ध है नहीं और बंटी हुई दुनिया में इंपोर्ट में स्ट्रेटेजिक रिस्क बहुत है। एक ओर भारत के पास न्यूक्लियर रिएक्टर चलाने के लिए यूरेनियम नहीं के बराबर है वहीं थोरियम (जिस पर इस फास्ट ब्रीडर रिएक्टर को चलाया जाना है) का केरल और तमिलनाडु के समुद्री तटों की रेत में अथाह भंडार है। इसी रेत को डॉ. होमी जहांगीर भाभा देश की एनर्जी सिक्यॉरिटी में बदलने के मिशन पर चल रहे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि को भारत के सिविल न्यूक्लियर सफर में एक निर्णायक कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित रिएक्टर न सिर्फ भारत की वैज्ञानिक क्षमता को दर्शाता है, बल्कि यह देश को अपने विशाल थोरियम भंडार के उपयोग की दिशा में भी आगे बढ़ाता है। 500 मेगावाट का यह सोडियम-कूल्ड फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत के सबसे जटिल परमाणु प्रोजेक्ट्स में से एक है। इसे भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम (भाविनी) द्वारा डवलप किया जा रहा है। पारंपरिक रिएक्टर जहां मुख्यत: यूरेनियम का उपयोग करते हैं, वहीं फास्ट ब्रीडर रिएक्टर प्लूटोनियम पर काम करते हैं और यूरेनियम-238 को प्लूटोनियम-239 में बदलते हैं। इस प्रक्रिया में इस्तेमाल किया गया स्पेंट फ्यूल (कमजोर हो गया फ्यूल) फिर से प्रोसेस कर रिएक्टर में दोबारा उपयोग किया जा सकता है, जिसे क्लोज फ्यूल साइकल कहा जाता है यानी इसमें बार-बार फ्यूल लोड करने की जरूरत नहीं होती। इसी क्षमता के कारण इस रिएक्टर को एनर्जी का अक्षय पात्र भी कहा जाता है। डबल फायदा ये कि फ्यूल खर्च कम और परमाणु कचरा भी कम। भारत सरकार इस प्रोजेक्ट को तीन चरणों में चला रही है। पीएफबीआर दूसरा चरण और तीसरे चरण में पीएफबीआर में बने प्लूटोनियम से थोरियम आधारित रिएक्टर चलाए जाने हैं।