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Daily Business Newspaper | A Knowledge Powerhouse in Hindi

21-05-2026

मार्च 2026 क्वार्टर कोरोना के बाद India-Focused से सबसे बड़ा नेट आउटफ्लो

  •  भारत पर फोकस करने वाले फॉरेन फंड्स और ETFs से मार्च 2026 क्वार्टर में भारी नेट आउटफ्लो देखने को मिला। Morningstar की रिपोर्ट के मुताबिक यह साल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान आई बड़ी बिकवाली के बाद सबसे बड़ा क्वार्टरली नेट आउटफ्लो है। इससे साफ है कि फॉरेन निवेशकों का भरोसा हाल के महीनों में कमजोर हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 क्वार्टर में भारत आधारित फॉरेन फंड्स और श्वञ्जस्नह्य से करीब 4.97 बिलियन डॉलर का नेट आउटफ्लो हुआ। पिछले क्वार्टर यानी दिसंबर 2025 में यह आंकड़ा केवल 1.8 बिलियन डॉलर था। यानी बहुत कम समय में फॉरेन निवेशकों की बिकवाली तेजी से बढ़ी है। इन कुल आंकड़ों में भारत आधारित ऑफशोर फंड्स की हिस्सेदारी करीब 3.46 बिलियन डॉलर रही, जबकि ETFs से करीब 1.5 बिलियन डॉलर का नेट आउटफ्लो हुआ। फॉरेन निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में भी लगातार बिकवाली जारी रखी। मार्च क्वार्टर में ETFs ने करीब 14.2 बिलियन डॉलर के शेयर बेचे। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में बढ़ते राजनीतिक तनाव, खासकर अमेरिका, इजराइल और ईरान से जुड़े हालात ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई। इसके अलावा डॉलर की मजबूती, बॉन्ड यील्ड में तेजी और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का भी असर निवेश भावना पर पड़ा। इन वजहों से भारत जैसे उभरते बाजारों में जोखिम बढ़ा और फॉरेन निवेशकों ने पैसा निकालना शुरू किया। मार्च क्वार्टर में भारतीय शेयर बाजार में भी बड़ी गिरावट देखने को मिली। सेंसेक्स करीब 15.5 प्रतिशत और निफ्टी 14.5 प्रतिशत तक टूट गया। बाजार में आई इस कमजोरी ने फॉरेन निवेशकों का भरोसा और कमजोर किया। रिपोर्ट के मुताबिक भारत आधारित फॉरेन फंड्स की कुल संपत्ति घटकर 77 बिलियन डॉलर रह गई, जो पिछले क्वार्टर में करीब 96 बिलियन डॉलर थी। यानी बाजार गिरने और नेट आउटफ्लो दोनों का असर फंड्स की कुल वैल्यू पर पड़ा। हालांकि ETFs ने दूसरे एक्टिव फंड्स के मुकाबले बेहतर मजबूती दिखाई। रिपोर्ट में कहा गया है कि फॉरेन निवेशकों के लिए ETFs तेजी से पैसा लगाने और निकालने का आसान तरीका बनते जा रहे हैं। मॉर्निंगस्टार का कहना है कि भारतीय बाजार में वैल्यूएशन और कमाई के अनुमान के बीच अंतर बढऩे से निवेशकों की उम्मीदों में बदलाव आया है। ऐसे में जब तक वैश्विक माहौल स्थिर नहीं होता, तब तक फॉरेन निवेश पर दबाव बना रह सकता है।

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मार्च 2026 क्वार्टर कोरोना के बाद India-Focused से सबसे बड़ा नेट आउटफ्लो

 भारत पर फोकस करने वाले फॉरेन फंड्स और ETFs से मार्च 2026 क्वार्टर में भारी नेट आउटफ्लो देखने को मिला। Morningstar की रिपोर्ट के मुताबिक यह साल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान आई बड़ी बिकवाली के बाद सबसे बड़ा क्वार्टरली नेट आउटफ्लो है। इससे साफ है कि फॉरेन निवेशकों का भरोसा हाल के महीनों में कमजोर हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 क्वार्टर में भारत आधारित फॉरेन फंड्स और श्वञ्जस्नह्य से करीब 4.97 बिलियन डॉलर का नेट आउटफ्लो हुआ। पिछले क्वार्टर यानी दिसंबर 2025 में यह आंकड़ा केवल 1.8 बिलियन डॉलर था। यानी बहुत कम समय में फॉरेन निवेशकों की बिकवाली तेजी से बढ़ी है। इन कुल आंकड़ों में भारत आधारित ऑफशोर फंड्स की हिस्सेदारी करीब 3.46 बिलियन डॉलर रही, जबकि ETFs से करीब 1.5 बिलियन डॉलर का नेट आउटफ्लो हुआ। फॉरेन निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में भी लगातार बिकवाली जारी रखी। मार्च क्वार्टर में ETFs ने करीब 14.2 बिलियन डॉलर के शेयर बेचे। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में बढ़ते राजनीतिक तनाव, खासकर अमेरिका, इजराइल और ईरान से जुड़े हालात ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई। इसके अलावा डॉलर की मजबूती, बॉन्ड यील्ड में तेजी और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का भी असर निवेश भावना पर पड़ा। इन वजहों से भारत जैसे उभरते बाजारों में जोखिम बढ़ा और फॉरेन निवेशकों ने पैसा निकालना शुरू किया। मार्च क्वार्टर में भारतीय शेयर बाजार में भी बड़ी गिरावट देखने को मिली। सेंसेक्स करीब 15.5 प्रतिशत और निफ्टी 14.5 प्रतिशत तक टूट गया। बाजार में आई इस कमजोरी ने फॉरेन निवेशकों का भरोसा और कमजोर किया। रिपोर्ट के मुताबिक भारत आधारित फॉरेन फंड्स की कुल संपत्ति घटकर 77 बिलियन डॉलर रह गई, जो पिछले क्वार्टर में करीब 96 बिलियन डॉलर थी। यानी बाजार गिरने और नेट आउटफ्लो दोनों का असर फंड्स की कुल वैल्यू पर पड़ा। हालांकि ETFs ने दूसरे एक्टिव फंड्स के मुकाबले बेहतर मजबूती दिखाई। रिपोर्ट में कहा गया है कि फॉरेन निवेशकों के लिए ETFs तेजी से पैसा लगाने और निकालने का आसान तरीका बनते जा रहे हैं। मॉर्निंगस्टार का कहना है कि भारतीय बाजार में वैल्यूएशन और कमाई के अनुमान के बीच अंतर बढऩे से निवेशकों की उम्मीदों में बदलाव आया है। ऐसे में जब तक वैश्विक माहौल स्थिर नहीं होता, तब तक फॉरेन निवेश पर दबाव बना रह सकता है।


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