कभी ऐसा दौर था जब विदेशी निवेशकों की भारी खरीद भारतीय शेयर बाजार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा देती थी और उनकी बिकवाली बाजार में बड़ी गिरावट का कारण बनती थी। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। एडलवाइज म्यूचुअल फंड की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय बाजार धीरे-धीरे FPI-Driven Market से Domestic-Driven Market में बदलता दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि 2008, 2011 और 2018 जैसे वर्षों में जब विदेशी निवेशकों ने बाजार से पैसा निकाला, तब शेयर बाजार ने भी कमजोर प्रदर्शन किया। 2008 में लगभग 53,000 करोड़ रुपए की FPI बिकवाली के साथ निफ्टी 100 FPI में 53% से अधिक की गिरावट दर्ज हुई थी। इसी तरह 2011 और 2018 में भी विदेशी बिकवाली के दौरान बाजार दबाव में रहा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह समीकरण बदलता नजर आया है। 2022 में विदेशी निवेशकों ने 1.21 लाख करोड़ रुपए की शुद्ध बिकवाली की, फिर भी निफ्टी 100 FPI ने करीब 5% का सकारात्मक रिटर्न दिया। 2025 में 1.64 लाख करोड़ की बिकवाली के बावजूद निफ्टी 100 लगभग 10% और निफ्टी 500 करीब 8% चढ़ा। यह दिखाता है कि अब बाजार की दिशा तय करने में केवल विदेशी निवेशकों की भूमिका नहीं रह गई है। रिपोर्ट का दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि FPI फ्लो का बाजार पूंजीकरण पर प्रभाव लगातार घट रहा है। 2010 और 2012 में विदेशी निवेशकों की खरीद बाजार पूंजीकरण के लगभग 1.8% के बराबर थी, जबकि हाल के वर्षों में यह आंकड़ा 0.5% के आसपास सिमट गया है। 2026 में मई तक 2.24 लाख करोड़ रुपए की बिकवाली हुई, लेकिन यह कुल मार्केट कैप का केवल 0.48% ही थी। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह भारतीय निवेशकों की बढ़ती भागीदारी है। FPI निवेश, म्यूचुअल फंड्स में लगातार पैसा आना और घरेलू संस्थागत निवेशकों की मजबूत मौजूदगी ने बाजार को एक नया सहारा दिया है। यही कारण है कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली अब पहले जैसी दहशत पैदा नहीं करती। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि FPI महत्वहीन हो गए हैं। विदेशी निवेशक अब भी भारतीय बाजार में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं और उनका निवेश सेंटीमेंट पर असर डालता है। लेकिन बाजार की नींव अब कहीं अधिक मजबूत और संतुलित दिखाई देती है। कुल मिलाकर, आंकड़े बताते हैं कि भारतीय शेयर बाजार परिपक्वता के नए दौर में प्रवेश कर चुका है। विदेशी निवेशकों का प्रभाव बना हुआ है, लेकिन बाजार की चाल अब केवल उनके फैसलों पर निर्भर नहीं रही। भारतीय निवेशकों की बढ़ती ताकत ने बाजार को कहीं अधिक आत्मनिर्भर बना दिया है।
