भारत की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी कहानी कार, टू-व्हीलर और सिटी बस तक सीमित है। ट्रक में एलसीवी और पिकअप में थोड़ा बहुत इलेक्ट्रिक पावरट्रेन का दखल है। लेकिन मीडियम एंड हेवी-ड्यूटी ट्रक (एमएचडीटी) अभी दूर से ही बदलाव को देख रहे हैं। जबकि एमिशन घटाने, इंपोर्टेज ऑइल पर निर्भरता कम करने और लॉन्ग-टर्म नेट-जीरो टार्गेट के लिए गुड्स ट्रांसपोर्ट रियल गेमचेंजर हो सकता है। भारत के कुल वाहनों में एमएचडीटी केवल 3 परसेंट हैं लेकिन ट्रांसपोर्ट एमिशन में इनका शेयर 44 परसेंट तक है। एचसीवी और एलसीवी ट्रक का कुल डीजल खपत में शेयर 2011-12 के 33 परसेंट था जो बढक़र 2020-21 में 64 परसेंट हो गया। डीजल के इसी दबदबे के कारण इलेक्ट्रिक ट्रक के लिए राह आसान नहीं है। क्योंकि कमजोर एफीशिएंसी नॉम्र्स के कारण डीजल ट्रकों की ऑपरेटिंग कॉस्ट सस्ता पड़ती है। भारत के हेवी-ड्यूटी ट्रक हर सौ किलोमीटर के लिए औसत 39 लीटर डीजल की खपत करते हैं। रिपोर्ट्स कहती हैं कि मौजूदा तकनीकों के सही इस्तेमाल से ही डीजल खपत को 39 से घटाकर 22 लीटर पर लाया जा सकता है। एनेलिस्ट्स के अनुसार भारत की ट्रक फ्लीट पुरानी है और इसमें बड़ी तादाद पुराने इंजन और खराब माइलेज वाले ट्रक हैं। छोटे ट्रांसपोर्टर के पास ना तो टेक्नोलॉजी की सही जानकारी होती है और ना ही बजट। लेकिन ट्रक में एनर्जी एफीशिएंट ऑप्शन की भी बहुत कमी है। वर्ष 2030 तक डीजल कंजम्पशन और सीओ2 एमिशन में 10 परसेंट की बढ़ोतरी हो जाने की आशंका है। वर्ष 2070 तक नेटजीरो के टार्गेट को हासिल करने के लिए ट्रक फ्लीट में 2050 तक कम-से-कम एक-चौथाई ट्रक जीरो-एमिशन होने चाहिएं। साथ ही फ्यूल एफीशिएंसी में भी 2021 के लेवल से 35 परसेंट सुधार करना होगा। भारत में इलेक्ट्रिक ट्रकों को लेकर अधिकांश चर्चा सब्सिडी और इंसेंटिव के इर्द-गिर्द घूमती है। एनेलिस्ट्स के अनुसार जब तक डीजल ट्रक ज्यादा तेल खाने के बावजूद सस्ते हैं तब तक इलेक्ट्रिक ट्रक का बिजनस केस नहीं बन सकता। इसलिए ट्रक्स को कैफे नॉम्र्स के दायरे में लाना जरूरी है। सामान्य स्थिति में बैटरी इलेक्ट्रिक ट्रक से 2030 तक टीसीओ यानी टोटल ऑपरेटिंग कॉस्ट में लगभग 7-12 परसेंट तक बचत हो सकती है। लेकिन कैफे नॉम्स कड़े करने पर यह सेविंग 20-26 परसेंट तक हो सकती है। वित्त वर्ष 2023 में भारत का ऑइल इंपोर्ट बिल 119.2 बिलियन डॉलर था, जो वित्त वर्ष 22 की तुलना में लगभग दोगुना था। ईरान वॉर के कारण पिछले तीन महीने में क्रूड ऑइल 70 से 120 डॉलर तक पहुंच गया था। अब इसमें गिरावट आ रही है और 95 डॉलर के करीब है। क्रूड ऑइल 10 डॉलर महंगा होने पर भारत का इंपोर्ट बिल 14-16 बिलियन डॉलर बढ़ जाता है। लगभग 90 परसेंट गुड्स ट्रांसपोर्ट डीजल पर निर्भर है ऐसे में भारत के सालाना ऑइल इंपोर्ट का 25 परसेंट से अधिक ट्रक जलाते हैं। एनेलिस्ट कहते हैं कि वर्ष 2017 में अधिसूचित हेवी-ड्यूटी वेहीकल्स के लिए कॉन्स्टेंट स्पीड फ्यूल कंजम्प्शन (सीएसएफसी) मानक यादि लागू होते तो 2018 से 2023 के बीच केवल पांच साल में ही करीब 1.27 मिलियन टन यानी 7564.82 करोड़ रुपये के डीजल की बचत हो सकती थी। रोड ट्रांसपोर्ट से होने वाले पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) एमिशन में डीजल ट्रक्स योगदान 53 परसेंट है। डीजल हेवी-ड्यूटी ट्रकों की कुल ओनरशिप कॉस्ट का लगभग 70 परसेंट हिस्सा फ्यूल पर खर्च होता है। जीरो-एमिशन ट्रक जीवनकाल में फ्यूल कॉस्ट को 46 परसेंट तक कम कर सकते हैं। 2050 तक ट्रकिंग क्षेत्र से लगभग 3 करोड़ नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है, जिनमें जीरो एमिशन ट्रक का शेयर 21 परसेंट होगा। 28 जुलाई 2025 को जारी मसौदा अधिसूचना में मीडियम एंड हेवी-ड्यूटी ट्रक (एमएचडीटी) फ्यूल एफीशिएंसी नियमों को फेज-2 में ले जाने का प्रस्ताव रखा गया है, जिसमें मॉडल-विशिष्ट मानकों की जगह कैफे मानक लागू किए जाएंगे।